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लेप्टोस्पाइरोसिस (Leptospirosis): केरल में बढ़ता जानलेवा संक्रमण

संदर्भ 

केरल में लेप्टोस्पायरोसिस रोग की पहली बार 1989 में पहचान की गई थी। पिछले तीन दशकों से अधिक समय से यह रोग राज्य में स्थानिक (Endemic) बना हुआ है और वर्तमान में यह केरल का सर्वाधिक मृत्यु दर वाला संक्रामक रोग बन चुका है। पिछले तीन वर्षों के दौरान केरल में प्रतिवर्ष लगभग 5,000 संक्रमण के मामले तथा करीब 400 मौतें (पुष्ट एवं संभावित मामलों सहित) दर्ज की गई हैं। इस वर्ष केवल जुलाई माह में ही 50 लोगों की मृत्यु होने से यह रोग एक बार फिर गंभीर चिंता और व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। 

केरल लेप्टोस्पायरोसिस का हॉटस्पॉट क्यों है? 

केरल की भौगोलिक स्थिति और जलवायु परिस्थितियाँ इस जीवाणु जनित रोग के प्रसार के लिए अत्यंत अनुकूल हैं। यहाँ के पर्यावरण में कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जो संक्रमण को बढ़ावा देती हैं: 

  • भारी मानसूनी वर्षा और बार-बार आने वाली बाढ़: राज्य में होने वाली मूसलाधार बारिश और बाढ़ के कारण जलभराव की समस्या आम है।
  • नमी और आर्द्रता: वर्षभर वातावरण में बनी रहने वाली नमी इस रोग के प्रसार में सहायक होती है।
  • प्रचुर जल स्रोत: झीलों, तालाबों, नदियों और नहरों की अधिकता यहाँ साफ-सफाई और जल प्रबंधन को प्रभावित करती है।
  • ये सभी परिस्थितियाँ लेप्टोस्पाइरा (Leptospira) बैक्टीरिया के लिए मिट्टी और पानी में लंबे समय तक जीवित रहने का आदर्श वातावरण तैयार करती हैं।
  • इसके अतिरिक्त, मानव बस्तियों के आसपास चूहों और अन्य पशुओं की भारी मौजूदगी (जो इस बैक्टीरिया के प्राकृतिक वाहक (Reservoir Host) हैं) खतरा और बढ़ा देती है। धान की खेती, अनानास के बागान, और नहरों की सफाई जैसे कार्यों में लगे श्रमिक लगातार दूषित पानी और मिट्टी के संपर्क में आते हैं। यह बैक्टीरिया त्वचा के कटने, घाव या श्लेष्मा झिल्ली (Mucosal Surface) के माध्यम से आसानी से मानव शरीर में प्रवेश कर जाता है।

लेप्टोस्पाइरोसिस (Leptospirosis) रोग 

  • लेप्टोस्पायरोसिस एक उष्णकटिबंधीय जूनोटिक (पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाला) जीवाणुजनित रोग है। 
  • यह रोगजनक लेप्टोस्पाइरा (Leptospira) बैक्टीरिया के कारण होने वाला एक प्रणालीगत (Systemic) संक्रमण है, जो ऐसे वातावरण में पनपता है जहाँ मनुष्य और पशु दोनों साथ रहते हैं।

किन लोगों को है सबसे अधिक खतरा ? 

  • पारंपरिक रूप से लेप्टोस्पायरोसिस को एक व्यावसायिक (Occupational) रोग माना जाता है। वर्तमान आँकड़ों के अनुसार सबसे अधिक जोखिम में निम्नलिखित वर्ग हैं:
    • किसान और खेतिहर मजदूर
    • डेयरी फार्म में काम करने वाले लोग
    • सफाई कर्मचारी तथा नहर एवं सीवर की सफाई करने वाले श्रमिक
  • यह बीमारी मुख्य रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को प्रभावित करती है, लेकिन अब शहरी क्षेत्रों में भी इसका दायरा बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, कई घरों में बिना दस्ताने के बागवानी (Gardening) करने वाली महिलाओं में भी संक्रमण के मामले पाए गए हैं।
  • इसके अलावा, राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण कार्यों में लगे प्रवासी निर्माण श्रमिक, जो लगातार मिट्टी के संपर्क में रहते हैं, अत्यधिक जोखिम में हैं। सड़क किनारे बढ़ते अनियंत्रित भोजनालय (Wayside Eateries) चूहों की संख्या को बढ़ावा देते हैं, जिससे आसपास की मिट्टी और अधिक दूषित हो जाती है।

मृत्यु के आँकड़े  

2025 में राज्य सरकार द्वारा जारी मृत्यु के आँकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि यह संकट कितना गंभीर है:

  • 36.75% मौतें मैनुअल श्रमिकों में हुईं।
  • 10.94% कृषि मजदूरों में।
  • 10.16% घरों में बागवानी करने वाली गृहिणियों में।

मृत्यु दर (Case Fatality Rate) क्यों बढ़ रही है? 

विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी से होने वाली मौतों के पीछे मुख्य कारण हैं - 

  • रोग की देर से पहचान होना, 
  • बीमारी का अत्यंत तेजी से गंभीर रूप लेना, 
  • फेफड़ों में रक्तस्राव (Pulmonary Haemorrhage) और 
  • कई अंगों का एक साथ काम करना बंद कर देना (Multi-organ Failure)। 

रोग के लक्षण और पहचान में चुनौतियाँ

लेप्टोस्पायरोसिस के शुरुआती लक्षण अन्य सामान्य बुखारों जैसे ही होते हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • तेज बुखार
  • मांसपेशियों में तेज दर्द (Myalgia)
  • आँखों का लाल होना (Conjunctival Suffusion)
  • पेट संबंधी समस्याएँ 

लगभग 90 से 95% मरीजों में यह बीमारी हल्की होती है, लेकिन 5 से 10% मामलों में यह अचानक गंभीर होकर जानलेवा बन जाती है। शुरुआती समानता (डेंगू, वायरल बुखार आदि) के कारण लोग अक्सर दर्द निवारक दवाएँ लेकर घर पर ही रहते हैं और तब अस्पताल पहुँचते हैं जब स्थिति हाथ से निकल चुकी होती है।

प्रयोगशाला जाँच की बाधाएँ:

  • लेप्टोस्पायरोसिस की प्रारंभिक जाँच करना अपने आप में एक चुनौती है। ELISA जैसी एंटीबॉडी जाँच शुरुआती चरण में रोग की पुष्टि करने में विफल रहती है। हालाँकि राज्य सरकार ने PCR (Polymerase Chain Reaction) आधारित आणविक परीक्षण शुरू किया है जिससे जल्दी पहचान संभव है, लेकिन यह अत्याधुनिक सुविधा अभी भी सभी जिलों में उपलब्ध नहीं है।
  • इसके अलावा, गंभीर रोगियों को आईसीयू, वेंटिलेटर और बहु-विषयक चिकित्सा (Multidisciplinary Care) की आवश्यकता होती है, जो अधिकांश जिला और उप-जिला अस्पतालों में नाकाफी साबित होती है।

मृत्यु दर को कम करने के लिए केरल की रणनीति और सुधार 

  • इस चुनौती से निपटने के लिए केरल सरकार लंबे समय से डॉक्सीसाइक्लिन (Doxycycline) द्वारा रासायनिक रोकथाम (Chemoprophylaxis) की रणनीति अपनाती रही है। उच्च जोखिम वाले लोगों को सप्ताह में दो बार 200 मिलीग्राम डॉक्सीसाइक्लिन लेने की सलाह दी जाती है। 
  • यदि संक्रमण की आशंका हो भी, तो यह दवा बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकने में कारगार साबित होती है। हालांकि, लोगों द्वारा दवा की नियमितता न बरतने और स्वास्थ्य विभाग की चेतावनियों को नजरअंदाज करने के कारण इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। 

विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए प्रमुख सुधार

  • उच्च जोखिम वाले व्यवसायों के लिए एक विशेष रोग-निवारण (Prevention) रणनीति तैयार की जाए।
  • किसानों, मजदूरों और सफाई कर्मचारियों के बीच व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
  • खेतिहर और मैनुअल श्रमिकों को सुरक्षा की दृष्टि से गमबूट (Gum Boots) तथा मजबूत, भारी-ड्यूट्री दस्ताने (Heavy-duty Gloves) उपलब्ध कराए जाएँ।
  • दूषित मिट्टी और पानी के सीधे संपर्क को कम करने के उपाय किए जाएँ।
  • रोग की शीघ्र पहचान और त्वरित उपचार के लिए सभी जिलों में आधुनिक जाँच सुविधाओं का विस्तार किया जाए। 
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