Prelims: DPCO 2013, NPPA, NLEM, अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाएँ, सीलिंग मूल्य, Price to Retailer (PTR), 16% खुदरा विक्रेता मार्जिन, आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 और अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य का अधिकार। Mains: GS Paper II: स्वास्थ्य सेवा की वहनीयता, सरकारी नीतियाँ, औषधि मूल्य विनियमन, स्वास्थ्य का अधिकार। GS Paper III: औषधि क्षेत्र, दवा मूल्य निर्धारण, उपभोक्ता संरक्षण, जेब से होने वाला स्वास्थ्य व्यय। Keywords: दवा मूल्य निर्धारण, DPCO 2013, NPPA, NLEM, सीलिंग मूल्य, Price to Retailer, MRP, दवा मूल्य नियंत्रण, आवश्यक दवाएँ, स्वास्थ्य का अधिकार, जेनेरिक दवाएँ, स्वास्थ्य सेवा की वहनीयता |
चर्चा में क्यों?
- सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं के Price to Retailer (PTR) और MRP के बीच मौजूद बड़े अंतर को लेकर चिंता जताई है।
- न्यायालय ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण दिया, जिसकी खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति लगभग ₹2,700 में की जाती है, लेकिन उसका MRP लगभग ₹27,000 है। न्यायालय ने सवाल उठाया कि क्या मौजूदा 16% खुदरा विक्रेता मार्जिन व्यवस्था को व्यापक रूप से लागू किया जाना चाहिए।

भारत में दवाओं की कीमतों का विनियमन कैसे होता है?
- भारत में दवाओं की कीमतों का विनियमन मुख्य रूप से Drugs (Prices Control) Order, 2013 (DPCO) के माध्यम से किया जाता है, जिसे Essential Commodities Act, 1955 के तहत प्राप्त शक्तियों के अंतर्गत जारी किया गया है।
- National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) की स्थापना 1997 में Department of Pharmaceuticals के अंतर्गत की गई थी। यह दवा मूल्य विनियमन के विभिन्न पहलुओं को लागू और मॉनिटर करता है।
- यह अनुसूचित फॉर्मुलेशन के लिए सीलिंग मूल्य निर्धारित या संशोधित करता है, कुछ नई दवाओं के खुदरा मूल्य तय करता है और DPCO के प्रावधानों के अनुपालन की निगरानी करता है।
DPCO, 2013 क्या है?
Drugs (Prices Control) Order, 2013 भारत में निर्दिष्ट दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रमुख ढाँचा है।
यह सरकार को आवश्यक दवाओं की कीमतों को विनियमित करने का अधिकार देता है और NPPA को निम्नलिखित कार्य करने में सक्षम बनाता है:
- अनुसूचित फॉर्मुलेशन के लिए सीलिंग मूल्य निर्धारित करना।
- कुछ नई दवाओं के खुदरा मूल्य निर्धारित या संशोधित करना।
- दवाओं की कीमतों और अधिक शुल्क वसूली की निगरानी करना।
- अनुमत कीमत से अधिक वसूली गई राशि की वसूली करना।
- जनहित में असाधारण परिस्थितियों में कीमतों को विनियमित करने के लिए कार्रवाई करना।
अनुसूचित फॉर्मुलेशन (Scheduled Formulations)
ये वे फॉर्मुलेशन हैं जो DPCO की Schedule I में शामिल हैं और National List of Essential Medicines (NLEM) पर आधारित हैं। इनकी कीमतें सीलिंग-प्राइस व्यवस्था के माध्यम से सरकारी विनियमन के अधीन होती हैं।
गैर-अनुसूचित फॉर्मुलेशन (Non-Scheduled Formulations)
ये वे दवाएँ हैं जो अनुसूचित सूची के बाहर होती हैं और समान प्रत्यक्ष सीलिंग-प्राइस व्यवस्था के अधीन नहीं होतीं। हालाँकि, DPCO के अनुसार इनके MRP में पिछले 12 महीनों के दौरान 10% से अधिक वृद्धि नहीं की जा सकती। NPPA ऐसी दवाओं की निगरानी भी कर सकता है और आवश्यकता होने पर सुधारात्मक कदम उठा सकता है।
सीलिंग मूल्य की गणना कैसे की जाती है?
अनुसूचित दवाओं के लिए NPPA बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण पद्धति (Market-Based Pricing Methodology) का उपयोग करता है।
इस प्रक्रिया में व्यापक रूप से निम्नलिखित चरण शामिल हैं:
- किसी विशेष फॉर्मुलेशन के ब्रांड और जेनेरिक संस्करणों की पहचान करना।
- कम से कम 1% बाजार हिस्सेदारी वाले उत्पादों को ध्यान में रखना।
- उनका Price to Retailer (PTR) लेना।
- औसत मूल्य की गणना करना।
- सीलिंग मूल्य निर्धारित करने के लिए 16% खुदरा विक्रेता मार्जिन जोड़ना।
16% खुदरा विक्रेता मार्जिन क्या है?
- 16% मार्जिन अनुसूचित फॉर्मुलेशन की मूल्य निर्धारण व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक है।
- इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में वर्तमान में प्रत्येक दवा पर कानूनी रूप से कुल 16% लाभ मार्जिन निर्धारित है।
- बल्कि, यह अनुसूचित फॉर्मुलेशन के सीलिंग मूल्य को निर्धारित करने की पद्धति का हिस्सा है।
- यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि गैर-अनुसूचित दवाएँ अलग मूल्य निर्धारण व्यवस्था के अंतर्गत आती हैं। NPPA स्वयं बताता है कि गैर-अनुसूचित दवाओं के निर्माताओं को उसी प्रकार मूल्य स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती, हालांकि NPPA के पास निगरानी और सुधारात्मक शक्तियाँ हैं।
गैर-अनुसूचित दवाओं के मूल्य निर्धारण का मुद्दा
- सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठाई गई प्रमुख चिंता गैर-अनुसूचित दवाओं के प्रारंभिक मूल्य निर्धारण से संबंधित है।
- यदि कोई दवा प्रत्यक्ष सीलिंग-प्राइस नियंत्रण के बाहर है, तो उसका निर्माता प्रारंभ में उसका MRP निर्धारित कर सकता है। इसके बाद 10% की सीमा मौजूदा कीमत पर होने वाली वृद्धि को सीमित करती है।
यह महत्वपूर्ण क्यों है?
- मान लीजिए कि कोई दवा असामान्य रूप से अधिक MRP के साथ बाजार में लॉन्च की जाती है।
- भले ही भविष्य में कीमतों में वृद्धि सीमित कर दी जाए, 10% का नियम पहले से मौजूद ऊँची आधार कीमत पर लागू होता है।
- इसलिए, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बाद में होने वाली वार्षिक कीमत वृद्धि को नियंत्रित करना, लॉन्च के समय निर्धारित अत्यधिक ऊँची कीमत की समस्या को आवश्यक रूप से हल नहीं करता।
- यह मुद्दा इस चल रही बहस का केंद्र है कि क्या मौजूदा व्यवस्था मरीजों को अनुपातहीन दवा कीमतों से पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करती है।
संवैधानिक आयाम: अनुच्छेद 21 और स्वास्थ्य का अधिकार
- याचिकाओं में इस मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 21 के दृष्टिकोण से भी उठाया गया है, जो जीवन के अधिकार की गारंटी देता है।
- सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या की है, जिसमें स्वास्थ्य के अधिकार के आयाम को भी जीवन के संवैधानिक संरक्षण में शामिल किया गया है।
- न्यायालय के समक्ष तर्क यह है कि दवाएँ स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच के लिए आवश्यक हैं और अत्यधिक या मनमानी कीमतें उपचार प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।
- इसलिए, यह बहस केवल औषधि मूल्य निर्धारण तक सीमित नहीं है; इसमें सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवा का व्यापक प्रश्न भी शामिल है।
NPPA की भूमिका
National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) भारत की दवा मूल्य निर्धारण प्रणाली में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
इसके कार्यों में शामिल हैं:
- सीलिंग कीमतें निर्धारित और संशोधित करना।
- कुछ नई दवाओं की कीमतें निर्धारित करना।
- दवाओं की कीमतों की निगरानी करना।
- DPCO के अनुपालन की निगरानी करना।
- अधिक शुल्क वसूली के विरुद्ध सुधारात्मक कदम उठाना।
- जनहित में आवश्यकता होने पर असाधारण परिस्थितियों में कीमतों को विनियमित करना।
23 जून 2026 तक, NPPA ने संबंधित DPCO व्यवस्था के अंतर्गत 935 फॉर्मुलेशन के लिए सीलिंग कीमतें और 3,805 नई दवाओं के लिए खुदरा कीमतें निर्धारित किए जाने की जानकारी दी थी।
सीलिंग कीमतों का वार्षिक संशोधन
अनुसूचित फॉर्मुलेशन की सीलिंग कीमतों को सामान्यतः Wholesale Price Index (WPI) के आधार पर वार्षिक रूप से संशोधित किया जाता है। इसका उद्देश्य इनपुट और थोक कीमतों में होने वाले बदलावों के अनुरूप विनियमित कीमतों को समायोजित करना है, जबकि मूल्य-नियंत्रण व्यवस्था को बनाए रखना है।
प्रमुख चुनौतियाँ
प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण का सीमित दायरा
वर्तमान व्यवस्था प्रत्येक दवा पर समान सीलिंग-प्राइस व्यवस्था लागू नहीं करती। इससे अनुसूचित सूची के बाहर आने वाली दवाओं के संबंध में एक महत्वपूर्ण नीतिगत बहस उत्पन्न होती है।
उच्च कीमतें
बाद में कीमतों में वृद्धि पर प्रतिबंध, लॉन्च के समय निर्धारित असामान्य रूप से अधिक कीमत को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता।
अस्पताल की फार्मेसी में अधिक मार्जिन
खरीद कीमतों और मरीजों से ली जाने वाली कीमतों के बीच बड़े अंतर से स्वास्थ्य व्यय बढ़ सकता है, विशेष रूप से तब जब मरीजों के पास फार्मेसी का सीमित विकल्प हो।
सूचना विषमता
मरीज सामान्यतः दवाओं और उनकी कीमतों के संबंध में जानकारी के लिए डॉक्टरों, अस्पतालों और फार्मासिस्टों पर निर्भर रहते हैं।
नवाचार और वहनीयता के बीच संतुलन
अत्यधिक मूल्य नियंत्रण अनुसंधान, विकास और नई दवाओं की शुरुआत के लिए प्रोत्साहन को प्रभावित कर सकता है, जबकि अपर्याप्त विनियमन मरीजों की लागत को बढ़ा सकता है।
निष्कर्ष
- भारत में Essential Commodities Act, DPCO 2013 और NPPA के माध्यम से दवा मूल्य विनियमन का एक स्थापित संस्थागत ढाँचा मौजूद है। हालांकि, अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाओं के बीच अंतर के कारण अलग-अलग नियामक दृष्टिकोण अपनाए जाते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने खुदरा विक्रेता मार्जिन, अस्पताल की फार्मेसी में मूल्य निर्धारण, ऊँची लॉन्च कीमतों और आवश्यक दवाओं की वहनीयता पर नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया है।
- नीति निर्माताओं के सामने प्रमुख चुनौती ऐसी व्यवस्था विकसित करना है जो सस्ती दवाओं और पारदर्शी मूल्य निर्धारण को सुनिश्चित करे तथा साथ ही औषधि उत्पादन और नवाचार के लिए प्रोत्साहन बनाए रखे।
Prelims Practice MCQ
प्रश्न: भारत में दवा मूल्य विनियमन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- National Pharmaceutical Pricing Authority, DPCO के अंतर्गत दवा मूल्य विनियमन से संबंधित विभिन्न प्रावधानों को लागू करने के लिए जिम्मेदार है।
- अनुसूचित फॉर्मुलेशन की सीलिंग कीमतों की गणना Price to Retailer (PTR) से संबंधित बाजार-आधारित पद्धति का उपयोग करके की जाती है।
- भारत में सभी दवाएँ समान सीलिंग-प्राइस व्यवस्था के अधीन हैं।
- DPCO गैर-अनुसूचित फॉर्मुलेशन के लिए वार्षिक 10% मूल्य वृद्धि की सीमा निर्धारित करता है।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. 1 और 2 केवल
B. 1, 2 और 4 केवल
C. 2 और 3 केवल
D. 1, 2, 3 और 4
Mains Practice Question
भारत में दवा मूल्य नियंत्रण की एक व्यवस्था मौजूद है, फिर भी दवाओं की वहनीयता एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता बनी हुई है। मौजूदा दवा मूल्य निर्धारण व्यवस्था की सीमाओं पर चर्चा कीजिए तथा ऐसी पारदर्शिता और वहनीयता सुधारने के उपाय सुझाइए, जो औषधि नवाचार को प्रभावित न करें।
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FAQs
1. DPCO 2013 क्या है?
Drugs (Prices Control) Order, 2013 भारत में निर्दिष्ट दवाओं की कीमतों को विनियमित करने का प्रमुख ढाँचा है।
2. NPPA क्या है?
National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) एक सरकारी प्राधिकरण है, जो दवा मूल्य विनियमन के महत्वपूर्ण पहलुओं को लागू करने और उनकी निगरानी के लिए जिम्मेदार है।
3. सीलिंग मूल्य क्या है?
सीलिंग मूल्य वह अधिकतम अनुमत मूल्य है, जिस पर सामान्यतः किसी अनुसूचित फॉर्मुलेशन को बेचा जा सकता है, जो लागू करों और नियामक प्रावधानों के अधीन होता है।
4. 16% खुदरा विक्रेता मार्जिन क्या है?
यह अनुसूचित फॉर्मुलेशन के सीलिंग मूल्य की गणना में उपयोग किया जाने वाला 16% खुदरा विक्रेता मार्जिन है। इसे वर्तमान में भारत में बेची जाने वाली प्रत्येक दवा पर सार्वभौमिक 16% लाभ सीमा के रूप में नहीं समझना चाहिए।
5. वर्तमान बहस में गैर-अनुसूचित दवाएँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?
गैर-अनुसूचित दवाएँ अनुसूचित फॉर्मुलेशन की तरह प्रत्यक्ष सीलिंग-प्राइस व्यवस्था के अधीन नहीं होती हैं। इसलिए उनका प्रारंभिक मूल्य निर्धारण और उसके बाद होने वाली 10% वार्षिक वृद्धि की सीमा दवाओं की वहनीयता को लेकर चल रही बहस के प्रमुख विषय हैं।
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