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गगनयान क्रू मॉड्यूल

संदर्भ 

  • गगनयान भारत का प्रथम स्वदेशी मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन है, जिसका उद्देश्य भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों (गगनयात्रियों) को पृथ्वी की निम्न कक्षा (Low Earth Orbit) में भेजकर सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है। यह मिशन भारत की अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता तथा आत्मनिर्भर अंतरिक्ष कार्यक्रम की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। 
  • इस मिशन के लिए ह्यूमन-रेटेड लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (HLVM-3) का उपयोग किया जाएगा, जो ऑर्बिटल मॉड्यूल (Orbital Module-OM) को निर्धारित कक्षा में स्थापित करेगा। वस्तुतः मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्री इसी ऑर्बिटल मॉड्यूल में निवास करेंगे।  

ऑर्बिटल मॉड्यूल की संरचना 

  • ऑर्बिटल मॉड्यूल दो प्रमुख भागों से मिलकर निर्मित है -
    • क्रू मॉड्यूल (Crew Module)
    • सर्विस मॉड्यूल (Service Module)
  • दोनों मॉड्यूल एक यांत्रिक संयोजन (Mechanical Joint) द्वारा परस्पर जुड़े रहते हैं। 
  • क्रू मॉड्यूल अंतरिक्ष यात्रियों के निवास, कार्य निष्पादन तथा पृथ्वी पर सुरक्षित पुनःप्रवेश के लिए अभिकल्पित है। इसके विपरीत सर्विस मॉड्यूल मिशन के दौरान प्रणोदन (Propulsion), विद्युत आपूर्ति, कक्षीय नियंत्रण तथा अन्य आवश्यक प्रणालियों का संचालन सुनिश्चित करता है।
  • कक्षीय मिशन पूर्ण होने के उपरांत सर्विस मॉड्यूल का प्रणोदन तंत्र अपने थ्रस्टरों की सहायता से ऑर्बिटल मॉड्यूल को पृथ्वी की ओर वापस लाता है (De-orbit)। तत्पश्चात एक बहु-सुरक्षित (Redundant) पृथक्करण प्रणाली के माध्यम से सर्विस मॉड्यूल, क्रू मॉड्यूल से अलग हो जाता है।
  • पृथ्वी के वायुमंडल में पुनःप्रवेश के दौरान केवल क्रू मॉड्यूल ही अत्यधिक तापीय एवं संरचनात्मक भार (Thermo-Structural Loads) का सामना करने में सक्षम होता है। यह वायुगतिकीय अवरोध (Aero-braking) के माध्यम से अपनी गति क्रमशः कम करता है तथा अंततः पैराशूट प्रणाली की सहायता से समुद्र में सुरक्षित अवतरण (Splashdown) करता है। इसके विपरीत सर्विस मॉड्यूल वायुमंडल में प्रवेश के दौरान घर्षणजनित ऊष्मा के कारण पूर्णतः नष्ट हो जाता है। 

अन्य मानवयुक्त अंतरिक्ष यानों की संरचना  

  • विश्व के अनेक मानवयुक्त अंतरिक्ष यानों, जैसे रूस के सोयुज (Soyuz) तथा चीन के शेनझोउ (Shenzhou), में तीन-मॉड्यूलीय (Three-module Configuration) संरचना अपनाई गई है। 
  • इनमें तीसरा मॉड्यूल अंतरिक्ष यात्रियों के लिए अतिरिक्त कार्य एवं निवास क्षेत्र उपलब्ध कराता है। इसी भाग में डॉकिंग प्रणाली, माल भंडारण (Cargo) तथा जीवन-समर्थन (Life Support) की आधारभूत सुविधाएँ, जैसे शौचालय, स्थापित होती हैं। पुनःप्रवेश के समय यह मॉड्यूल भी सर्विस मॉड्यूल की भाँति पृथ्वी के वायुमंडल में जलकर नष्ट हो जाता है।

पुनःप्रवेश हेतु उपयुक्त संरचना का चयन 

  • क्रू मॉड्यूल की अभिकल्पना अंतरिक्ष अभियंत्रण (Space Engineering) की सबसे जटिल चुनौतियों में से एक है। इसके निर्माण में अनेक परस्पर प्रतिस्पर्धी उद्देश्यों के मध्य संतुलन स्थापित करना आवश्यक होता है, जिनमें प्रमुख हैं - 
    • अधिकतम उपयोगी आंतरिक आयतन सुनिश्चित करना।
    • वायुमंडलीय पुनःप्रवेश के दौरान उत्पन्न उत्थान (Lift) एवं प्रतिरोध (Drag) का प्रभावी नियंत्रण।
    • संरचना का सरल एवं विश्वसनीय निर्माण।
    • वायुगतिकीय तथा जलगतिकीय स्थिरता बनाए रखना।
    • निम्न वेग पर गतिशील स्थिरता (Dynamic Stability) सुनिश्चित करना। 
  • चूँकि कोई एकल संरचना इन सभी आवश्यकताओं को पूर्णतः संतुष्ट नहीं कर सकती, इसलिए अंतिम अभिकल्पना मिशन की प्राथमिक आवश्यकताओं के अनुरूप निर्धारित की जाती है। 
  • इसके अतिरिक्त, प्रक्षेपण तथा पुनःप्रवेश के दौरान कुल द्रव्यमान को न्यूनतम बनाए रखने के लिए केवल आवश्यक अवतरण प्रणालियों को ही क्रू मॉड्यूल में सम्मिलित किया जाता है। इससे हीट शील्ड तथा पैराशूट प्रणाली का आकार एवं भार भी कम किया जा सकता है।  

गोलाकार संरचना: लाभ एवं सीमाएँ 

  • सैद्धांतिक रूप से पूर्णतः गोलाकार (Spherical) संरचना सर्वाधिक आंतरिक आयतन तथा न्यूनतम संरचनात्मक भार प्रदान करती है, क्योंकि किसी निश्चित आयतन को घेरने के लिए गोले का पृष्ठीय क्षेत्रफल सबसे कम होता है।
  • इस अवधारणा का सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण सोवियत संघ का वोस्तोक (Vostok) अंतरिक्ष यान था, जिसके माध्यम से यूरी गागरिन ने मानव इतिहास की पहली अंतरिक्ष यात्रा की। 
  • हालाँकि पूर्णतः गोलाकार संरचना कोई वायुगतिकीय उत्थान उत्पन्न नहीं करती। परिणामस्वरूप पुनःप्रवेश के दौरान यह लगभग सीधे नीचे गिरती है, जिससे अंतरिक्ष यात्रियों पर अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण बल कार्य करता है। इसलिए यह संरचना आधुनिक मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशनों के लिए आदर्श नहीं मानी जाती। 

मोनो-स्टेबिलिटी का महत्त्व 

पुनःप्रवेश करने वाले किसी भी मॉड्यूल के लिए वायुगतिकीय (Aerodynamic) तथा जलगतिकीय (Hydrodynamic) मोनो-स्टेबिलिटी अत्यंत वांछनीय गुण माने जाते हैं।

  • वायुगतिकीय मोनो-स्टेबिलिटी का आशय है कि वायुमंडल में प्रवेश के दौरान मॉड्यूल केवल एक ही स्थिर अभिविन्यास (Stable Attitude) बनाए रखे। इसी प्रकार जलगतिकीय मोनो-स्टेबिलिटी यह सुनिश्चित करती है कि समुद्र में अवतरण के पश्चात मॉड्यूल स्वतः सीधा होकर स्थिर अवस्था में तैरता रहे।
  • यह स्थिरता मुख्यतः मॉड्यूल की बाह्य संरचना तथा उसके गुरुत्व केंद्र (Centre of Gravity) की स्थिति पर निर्भर करती है। किन्तु व्यवहारिक स्तर पर गुरुत्व केंद्र का निर्धारण मॉड्यूल के भीतर स्थापित विभिन्न प्रणालियों की संरचना एवं स्थान पर निर्भर करता है। परिणामस्वरूप अभियंताओं के लिए आदर्श गुरुत्व केंद्र प्राप्त करना सदैव संभव नहीं होता।
  • इसी कारण अधिकांश पुनःप्रवेश मॉड्यूलों में एक से अधिक स्थिर अवस्थाएँ विद्यमान रहती हैं। उदाहरणस्वरूप गगनयान के क्रू मॉड्यूल में दो वायुगतिकीय तथा दो जलगतिकीय स्थिर अवस्थाएँ पाई जाती हैं। वस्तुतः अनचाही स्थिति को नियंत्रित करने के लिए वायुमंडलीय उड़ान के दौरान नियंत्रण थ्रस्टरों का प्रयोग किया जाता है, जबकि समुद्र में अवतरण के पश्चात गैस-आधारित अप-राइटिंग प्रणाली (Up-righting System) मॉड्यूल को स्वतः सही स्थिति में स्थापित कर देती है।

पुनःप्रवेश के दौरान गतिशील अस्थिरता  

  • गतिशील अस्थिरता (Dynamic Instability) पुनःप्रवेश के दौरान उत्पन्न होने वाली वह अवस्था है, जिसमें मॉड्यूल में तीव्र एवं क्रमशः बढ़ते हुए अनियंत्रित दोलन (Oscillations) विकसित होने लगते हैं।
  • इसे बिना पूँछ वाली पतंग के उदाहरण से समझा जा सकता है, जो स्थिरता के अभाव में अनियंत्रित रूप से डगमगाने लगती है। इसी प्रकार यदि पुनःप्रवेश कर रहा मॉड्यूल पर्याप्त रूप से नियंत्रित न हो, तो वह झूलने, घूमने अथवा पलटने लग सकता है।
  • मॉड्यूल की पुनःप्रवेश स्थिरता उसकी आकृति, द्रव्यमान तथा उसके चारों ओर प्रवाहित वायु की प्रकृति पर निर्भर करती है। विशेष रूप से ध्वनि की गति (Transonic Region) के समीप पहुँचने पर तरंगों के झटकों एवं अशांत वायु प्रवाह (Turbulent Flow) के कारण यह अस्थिरता सर्वाधिक बढ़ जाती है।
  • ऐसी स्थिति में नियंत्रण थ्रस्टरों द्वारा मॉड्यूल की दिशा एवं अभिविन्यास को नियंत्रित किया जाता है। यदि आवश्यक हो, तो समय रहते पैराशूट प्रणाली सक्रिय कर दी जाती है, जिससे मॉड्यूल अनियंत्रित घूर्णन से बच सके। 

वस्तुतः गगनयान के क्रू मॉड्यूल का डिजाइन अनेक जटिल इंजीनियरिंग चुनौतियों के बीच संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी कुंद वायुगतिकीय संरचना, उपयुक्त द्रव्यमान, ऊष्मा से सुरक्षा, स्थिरता तथा गतिशील अस्थिरता पर प्रभावी नियंत्रण इत्यादि सभी मिलकर इसे ऐसा सुरक्षित अंतरिक्ष यान बनाते हैं, जो भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष से सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाने में सक्षम होगा।

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