भारतीय वैज्ञानिकों ने हाल ही में महाराष्ट्र के उत्तरी पश्चिमी घाट क्षेत्र में एक अत्यंत दुर्लभ और भूमिगत जीवन वाली उभयचर प्रजाति की पहचान की है।
इस नई प्रजाति को गेगेनोफिस वाल्मीकि(Gegeneophis valmiki) नाम दिया गया है। इसका नामकरण खोज स्थल के समीप स्थित ऐतिहासिक महर्षि वाल्मीकि मंदिर के सम्मान में किया गया है।
प्रजाति की प्रमुख विशेषताएँ
गेगेनोफिस वाल्मीकि ‘गेगेनोफिस वंश’ से संबंधित है जिसे आम भाषा में ब्लाइंड सीसिलियन कहा जाता है।
सीसिलियन उभयचर जीवों का एक ऐसा समूह है जो सामान्यतः लोगों की नज़र से दूर भूमि के भीतर निवास करता है। इसी कारण इन्हें प्राय: ‘छिपे हुए उभयचर’ कहा जाता है।
ये जीव बिना अंगों के लंबे एवं पतले शरीर वाले होते हैं तथा देखने व गति करने में केंचुए जैसे प्रतीत होते हैं। मेंढकों के विपरीत ये कोई आवाज़ नहीं करते हैं और इनकी आँखें त्वचा तथा हड्डियों की परतों के नीचे छिपी होती हैं जिससे इन्हें पहचानना अत्यंत कठिन हो जाता है।
पारिस्थितिकी में भूमिका
इनके द्वारा बनाए गए बिल मृदा वातन (Soil Aeration) और उसकी संरचना को बेहतर बनाते हैं।
ये मृदा में पाए जाने वाले अकशेरुकी जीवों की संख्या को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं और साथ ही पक्षियों, सरीसृपों व छोटे स्तनधारियों के लिए भोजन श्रृंखला का हिस्सा भी बनते हैं।
विकास की दृष्टि से भी सीसिलियन महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे जलीय व स्थलीय कशेरुकी जीवों के बीच एक अहम विकासवादी कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वैश्विक एवं भारतीय परिप्रेक्ष्य
विश्व स्तर पर ज्ञात 8,983 उभयचर प्रजातियों में से केवल 231 प्रजातियाँ सीसिलियन वर्ग से संबंधित हैं। भारत में उपलब्ध 457 उभयचर प्रजातियों में से 42 सीसिलियन हैं।
विशेष रूप से पश्चिमी घाट क्षेत्र जैव विविधता के लिए अत्यंत समृद्ध है जहाँ 26 स्थानिक सीसिलियन प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से 11 प्रजातियाँ गेगेनोफिस वंश से जुड़ी हुई हैं।