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घेपन हिमनद झील: हिमाचल प्रदेश में बढ़ता GLOF खतरा

प्रारंभिक परीक्षा: भूगोल | पर्यावरण | हिमनद | आपदा प्रबंधन
मुख्य परीक्षा: GS-I – भौतिक भूगोल | GS-III – पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन

चर्चा में क्यों?

सितंबर 2026 में घेपन झील (Ghepan Lake) पर एक पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System-EWS) स्थापित की जानी है। इस प्रणाली का उद्देश्य झील और उसके आसपास की परिस्थितियों की लगातार निगरानी करना तथा संभावित हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (Glacial Lake Outburst Flood-GLOF) के संकेत मिलने पर समय रहते चेतावनी जारी करना है।

घेपन हिमनद झील के बारे में

  • घेपन हिमनद झील (Ghepan Glacial Lake), जिसे घेपांग घाट हिमनद झील (Ghepang Ghat Glacial Lake) भी कहा जाता है, हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले के लाहौल क्षेत्र में स्थित एक उच्च ऊँचाई वाली हिमनद झील है।
  • यह झील समुद्र तल से लगभग 4,068–4,070 मीटर की ऊँचाई पर सिंधु नदी तंत्र के चंद्रा उप-बेसिन के ऊपरी क्षेत्र में स्थित है।
  • यह सिस्सू गाँव के ऊपर स्थित है, जो लाहौल घाटी की प्रमुख बस्तियों में से एक है।
  • झील का संबंध घेपन या राजा घेपन से है, जिन्हें लाहौल घाटी का संरक्षक देवता माना जाता है। इसलिए इस झील का महत्त्व केवल भौगोलिक और पर्यावरणीय दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और आस्था की दृष्टि से भी है।
  • हिमनदों और ऊँचे हिमालयी भूभाग से घिरी यह फिरोजी रंग की झील एक लोकप्रिय ट्रेकिंग गंतव्य के रूप में भी उभरी है।

घेपन झील चिंता का कारण क्यों बन रही है?

  • सबसे बड़ी चिंता हिमनद के पीछे हटने के साथ झील के तेजी से विस्तार को लेकर है।
  • उपग्रह चित्रों पर आधारित हिमाचल प्रदेश के एक आधिकारिक आपदा-प्रबंधन आकलन के अनुसार, झील का जल-विस्तार क्षेत्र 1989 में लगभग 36.49 हेक्टेयर से बढ़कर 2022 में 101.30 हेक्टेयर हो गया।
  • अर्थात झील के क्षेत्रफल में लगभग 178% की वृद्धि हुई है।
  • यह तेजी से विस्तार इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी होती झील अपने प्राकृतिक मोरेन अवरोध के पीछे अधिक मात्रा में पानी जमा कर सकती है।
  • तापमान बढ़ने और हिमनदों के पीछे हटने के कारण पिघला हुआ पानी हिमनदों के आसपास बने अवसादों में जमा होकर हिमनद झीलों का निर्माण या विस्तार कर सकता है। इनमें से कई झीलें चट्टानों, तलछट और हिमनदीय मलबे के अपेक्षाकृत ढीले जमाव से बनी प्राकृतिक संरचनाओं द्वारा रोकी जाती हैं, जिन्हें मोरेन (Moraine) कहा जाता है।
  • इंजीनियरिंग द्वारा निर्मित बाँधों के विपरीत, ये मोरेन अवरोध अस्थिर हो सकते हैं और इनके अचानक टूटने का खतरा बना रहता है।

घेपन झील में GLOF कैसे उत्पन्न हो सकता है?

  • कई प्राकृतिक प्रक्रियाएँ उच्च हिमालयी हिमनद झील को अस्थिर कर सकती हैं।
  • झील में गिरने वाला हिमस्खलन, चट्टान का बड़ा हिस्सा या भूस्खलन पानी में एक बड़ी विस्थापन तरंग उत्पन्न कर सकता है। यह तरंग झील को रोकने वाले मोरेन अवरोध के ऊपर से पानी बहा सकती है और उसे अस्थिर कर सकती है।
  • लगातार हिमनद पिघलने से झील में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, जिससे उसके प्राकृतिक अवरोध पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
  • अत्यधिक वर्षा, ढलानों की अस्थिरता, भूकंप तथा मोरेन के भीतर मौजूद बर्फ का क्षरण भी अवरोध के विफल होने की आशंका बढ़ा सकते हैं।
  • घेपन झील के आसपास की ढलानें हिमस्खलन और बड़े पैमाने पर मलबा खिसकने जैसी घटनाओं के प्रति संवेदनशील हैं। इसलिए इसकी निरंतर निगरानी विशेष रूप से आवश्यक है।

घेपन GLOF खतरनाक क्यों हो सकता है?

  • घेपन झील के निचले क्षेत्र की भौगोलिक संरचना अचानक होने वाले GLOF के संभावित प्रभाव को और गंभीर बना सकती है।
  • सिस्सू गाँव झील से लगभग 11 किमी नीचे तथा करीब 1,000 मीटर कम ऊँचाई पर स्थित है।
  • सिस्सू नाला तीव्र ढाल वाले हिमालयी भूभाग से नीचे उतरते हुए चंद्रा नदी में मिलता है।
  • जोखिम आकलनों के अनुसार, तीव्र ढाल और संकरा जलमार्ग संभावित GLOF के दौरान पानी की गहराई और बाढ़ के वेग एवं ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं।
  • इसलिए चिंता केवल झील में मौजूद पानी की मात्रा को लेकर नहीं है। अधिक ऊँचाई, तीव्र ढाल, संकरी घाटियाँ और नीचे स्थित मानव बस्तियाँ मिलकर किसी संभावित GLOF की विनाशकारी क्षमता को कई गुना बढ़ा सकती हैं।

हाल की नेपाल हिमालयी आपदा से सबक

  • नेपाल-चीन हिमालयी क्षेत्र को प्रभावित करने वाली हाल की विनाशकारी हिमनद-संबंधी बाढ़ ने एक बार फिर दिखाया है कि किस प्रकार हिममंडल से जुड़ा कोई खतरा बहुत कम समय में बहुस्तरीय या श्रृंखलाबद्ध आपदा (Cascading Disaster) में बदल सकता है।
  • हिमनद या बर्फ-चट्टान के ढहने से मलबे का तीव्र प्रवाह उत्पन्न हो सकता है। यह नदियों को अस्थायी रूप से अवरुद्ध कर सकता है, अस्थिर झीलों का निर्माण कर सकता है और अंततः विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकता है।
  • ऐसी घटनाएँ सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं, विद्युत नेटवर्क और संचार अवसंरचना को एक साथ नुकसान पहुँचा सकती हैं। इसी समय बुनियादी ढाँचे के नष्ट होने के कारण बचाव एवं राहत अभियान भी कठिन हो जाते हैं।
  • भारत के लिए इसका प्रमुख सबक यह है कि आपदा प्रबंधन को केवल आपदा के बाद प्रतिक्रिया देने तक सीमित न रखकर आपदा-पूर्व जोखिम न्यूनीकरण पर केंद्रित किया जाए।
  • घेपन जैसी संवेदनशील हिमनद झीलों के लिए निरंतर निगरानी और समय पर चेतावनी अत्यंत आवश्यक है।

घेपन झील पर पूर्व चेतावनी प्रणाली

प्रस्तावित पूर्व चेतावनी प्रणाली (EWS) प्रौद्योगिकी आधारित आपदा तैयारी की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। केवल समय-समय पर किए जाने वाले क्षेत्रीय निरीक्षणों पर निर्भर रहने के बजाय EWS अधिकारियों को बदलती परिस्थितियों की लगातार निगरानी करने और पूर्व-निर्धारित खतरे के संकेत मिलने पर समय रहते चेतावनी जारी करने में सहायता कर सकती है।

संवेदनशील हिमनद झीलों की निगरानी में निम्न तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है:

  • उपग्रह सुदूर संवेदन (Satellite Remote Sensing): झील के क्षेत्रफल और आसपास के हिमनदों में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी के लिए।
  • स्वचालित मौसम स्टेशन (Automatic Weather Stations): तापमान, वर्षा और अन्य मौसम संबंधी कारकों की निगरानी के लिए।
  • जल-स्तर सेंसर (Water-Level Sensors): झील के जल-स्तर में होने वाले असामान्य बदलावों की पहचान के लिए।
  • कैमरे: झील तथा उसके आसपास की ढलानों की दृश्य निगरानी के लिए।
  • संचार प्रणाली: प्रशासनिक अधिकारियों और निचले क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों तक चेतावनी तेजी से पहुँचाने के लिए।
  • अंतिम उद्देश्य वैज्ञानिक निगरानी को प्रभावी अंतिम छोर तक चेतावनी (Last-Mile Warning) और निकासी व्यवस्था से जोड़ना होना चाहिए।

पश्चिमी हिमालय अधिक संवेदनशील क्यों है?

  • पश्चिमी हिमालय में कई भौतिक एवं मानवीय परिस्थितियाँ एक साथ मौजूद हैं, जो इसकी आपदा संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं।
  • हिमालय भूगर्भीय रूप से युवा और विवर्तनिक रूप से सक्रिय पर्वत प्रणाली है, जहाँ तीव्र ढाल और अपेक्षाकृत अस्थिर भूगर्भीय संरचनाएँ पाई जाती हैं।
  • जलवायु परिवर्तन हिमनदों, हिम आवरण, पर्माफ्रॉस्ट तथा चरम वर्षा की प्रकृति को प्रभावित करके जोखिम की एक अतिरिक्त परत जोड़ रहा है।
  • वहीं दूसरी ओर, सड़कें, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएँ, पर्यटन सुविधाएँ और मानव बस्तियाँ संकरी नदी घाटियों में तेजी से केंद्रित हो रही हैं।
  • इस कारण ऊँचाई वाले क्षेत्र में उत्पन्न अपेक्षाकृत स्थानीय प्राकृतिक खतरा भी नीचे की घाटियों में व्यापक प्रभाव पैदा कर सकता है।
  • इससे श्रृंखलाबद्ध हिमालयी आपदा (Cascading Himalayan Disaster) की संभावना उत्पन्न होती है, जिसमें एक प्राकृतिक घटना कई परस्पर जुड़ी विफलताओं और आपदाओं को जन्म देती है।

GLOF जोखिम प्रबंधन की चुनौतियाँ

  • पहली बड़ी चुनौती दुर्गमता है। कई संवेदनशील हिमनद झीलें समुद्र तल से हजारों मीटर की ऊँचाई पर दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित हैं। ऐसे स्थानों पर निगरानी उपकरण स्थापित करना और उनका रखरखाव करना कठिन है।
  • दूसरी चुनौती हिमनदीय क्षेत्रों की अत्यधिक गतिशील प्रकृति है। झील का आकार, हिमनद की गति, मोरेन की स्थिरता और आसपास की ढलानों की स्थिति अपेक्षाकृत कम समय में बदल सकती है।
  • तीसरी चुनौती यह है कि उपग्रह निगरानी हमेशा निरंतर रियल-टाइम जानकारी उपलब्ध नहीं करा सकती। बादल, उपग्रह की पुनरावृत्ति अवधि (revisit interval) और अन्य तकनीकी सीमाएँ इसमें बाधा बन सकती हैं।
  • चौथी चुनौती अंतिम छोर तक चेतावनी पहुँचाना है। अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली भी तब प्रभावी नहीं होगी, यदि चेतावनी समय पर नीचे स्थित गाँवों और निवासियों तक न पहुँच सके।
  • अंततः हिमालय की अनेक नदी प्रणालियाँ राजनीतिक सीमाओं को पार करती हैं। इसलिए सीमा-पार जलवैज्ञानिक और हिममंडलीय डेटा साझाकरण का महत्त्व लगातार बढ़ रहा है।

आगे की राह

  • भारत को अलग-अलग GLOF घटनाओं को पृथक आपदाओं के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक हिमालयी हिमनद जोखिम प्रबंधन ढाँचा (Himalayan Glacial Risk Management Framework) विकसित करना चाहिए।
  • उच्च जोखिम वाली हिमनद झीलों का उनकी विफलता की संभावना और निचले क्षेत्रों में संभावित जोखिम के आधार पर निरंतर वर्गीकरण एवं प्राथमिकता निर्धारण किया जाना चाहिए।
  • उपग्रह आधारित सुदूर संवेदन निगरानी को जहाँ संभव हो, मैदानी मापन और स्थल-आधारित निगरानी से पूरक किया जाना चाहिए।
  • इसके साथ ही EWS को स्थानीय प्रशासन, आपदा प्रतिक्रिया बलों और समुदायों से जोड़ना आवश्यक है, ताकि चेतावनी जारी होने के बाद त्वरित निकासी और प्रतिक्रिया संभव हो सके।

प्रारंभिक परीक्षा MCQ

प्रश्न. घेपन हिमनद झील के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. यह हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में स्थित है।
  2. इसका जल निकासी तंत्र अंततः सिंधु नदी प्रणाली का हिस्सा है।
  3. झील से निकलने वाला सिस्सू नाला चंद्रा नदी में मिलता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

मुख्य परीक्षा प्रश्न

“हिमनद झीलों का विस्तार जलवायु परिवर्तन को भारतीय हिमालयी क्षेत्र में एक गंभीर आपदा-प्रबंधन चुनौती में बदल रहा है।” घेपन हिमनद झील के विशेष संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

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