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गिरीश भारद्वाज (ब्रिज मैन ऑफ इंडिया)

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में भारत के प्रसिद्ध अभियंता और ब्रिज मैन ऑफ इंडिया के नाम से विख्यात गिरीश भारद्वाज का कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के सुलिया स्थित एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे 76 वर्ष के थे। उनके परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री हैं, उनकी पत्नी का निधन पहले ही हो चुका था। 

गिरीश भारद्वाज (ब्रिज मैन ऑफ इंडिया) के बारे में 

  • गिरीश भारद्वाज ने देश के विभिन्न राज्यों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में आवागमन की सुविधा बढ़ाने के उद्देश्य से 140 से अधिक झूलते पैदल पुलों का निर्माण कराया। कम लागत और स्थानीय संसाधनों पर आधारित उनके अभिनव पुलों ने अनेक दुर्गम गांवों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
  • ग्रामीण संपर्क को सुदृढ़ बनाने में उनके उल्लेखनीय योगदान के कारण उन्हें भारत का पुल पुरुष (Bridge Man of India) के नाम से व्यापक पहचान मिली। 

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा:

  • 12 मई 1950 को जन्मे गिरीश भारद्वाज ने वर्ष 1973 में मैसूर विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे किसी सरकारी विभाग या निजी कंपनी में नौकरी करना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने उन्हें अपने तकनीकी ज्ञान का उपयोग किसानों और ग्रामीण समाज के हित में करने की प्रेरणा दी। भारद्वाज ने इस सलाह को जीवन का उद्देश्य बना लिया।

ग्रामीण विकास की दिशा में पहला कदम:

  • वर्ष 1973 में उन्होंने अपने एक मित्र के साथ मिलकर एक कृषि सेवा केंद्र की स्थापना की। 
  • इसके बाद 1975 में सुलिया में रैशनल इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज की शुरुआत की, जिसे वर्तमान में आयस शिल्पा के नाम से जाना जाता है। 
  • वस्तुतः प्रारंभिक दौर में उनका कार्य पंपसेटों की मरम्मत तथा बायोगैस (गोबर गैस) संयंत्रों के निर्माण और रखरखाव से जुड़ा रहा, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और आजीविका को प्रत्यक्ष लाभ मिला।  

झूलते पैदल पुलों के निर्माण की शुरुआत:

  • बाद में गिरीश भारद्वाज ने अपना पूरा ध्यान झूलते पैदल पुलों के निर्माण पर केंद्रित किया। उनका उद्देश्य ऐसे नदी तटीय और दुर्गम क्षेत्रों के लोगों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराना था, जो विशेषकर वर्षा ऋतु में संपर्क से कट जाते थे। 
  • इस दिशा में उनका पहला झूलता पैदल पुल वर्ष 1989 में उनके पैतृक गांव अंबूर में बनाया गया। 
  • इसके बाद उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग लंबाई और डिजाइन के 140 से अधिक झूलते पैदल पुलों का निर्माण किया। इन पुलों ने न केवल गांवों और बस्तियों को जोड़ा, बल्कि लोगों के बीच सामाजिक और आर्थिक दूरी भी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

सम्मान और पुरस्कार:

  • ग्रामीण विकास तथा अभिनव इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। इनमें उडुपी जिले के कोटा स्थित डॉ. शिवराम कारंत हुत्तूरा प्रशस्ति प्रतिष्ठान द्वारा प्रदान किया जाने वाला डॉ. कोटा शिवराम कारंथा हुत्तूरा प्रशस्ति सम्मान प्रमुख है।
  • वर्ष 2017 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया।    

युवाओं के लिए संदेश

दिसंबर 2024 में मंगलुरु प्रेस क्लब द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में पत्रकारों से बातचीत के दौरान गिरीश भारद्वाज ने कहा था कि आज बहुत कम इंजीनियरिंग स्नातक उनकी झूलते पुलों के निर्माण की तकनीक सीखने में रुचि दिखा रहे हैं। उन्होंने नई पीढ़ी के इंजीनियरों से ग्रामीण भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप नवाचार विकसित करने का आह्वान किया।   

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