वैश्विक संकट के दौर में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव
संदर्भ
सोने को पारंपरिक रूप से संकट का साथी और सुरक्षित निवेश (Safe Haven) माना जाता है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियाँ कुछ अलग संकेत दे रही हैं। आमतौर पर युद्ध या वैश्विक अस्थिरता के समय सोने की कीमतें बढ़ती हैं, परंतु 28 फरवरी को पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से इसमें अप्रत्याशित गिरावट देखी गई है। भारत में 24 कैरेट सोने की कीमत, जो जनवरी के अंत में लगभग ₹1.9 लाख प्रति 10 ग्राम थी, अब गिरकर ₹1.3 लाख के करीब आ गई है।
यह गिरावट इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि 2008 के वित्तीय संकट, 2020 की महामारी और 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान सोने की कीमतों में भारी उछाल आया था।
वर्तमान में समीकरण बदलने के कारण ?
सोने की कीमतों को समझने के लिए दो मुख्य कारकों को जानना आवश्यक है:
ब्याज दरें और बॉन्ड : सोना कोई नियमित ब्याज नहीं देता। जब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो निवेशक सोने के बजाय बॉन्ड में पैसा लगाना पसंद करते हैं।
डॉलर की मजबूती : वैश्विक बाजार में सोने का भाव डॉलर में तय होता है। यदि डॉलर मजबूत होता है, तो अन्य मुद्राओं (जैसे रुपया) में सोना खरीदना महंगा हो जाता है, जिससे इसकी मांग घटती है।
सोने की कीमतों गिरावट के प्रमुख कारण
महंगाई और ब्याज दरें :संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें $120 प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं। इससे वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है, जिसके जवाब में केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊँचा रखने की संभावना बढ़ गई है। ऊँची ब्याज दरें बॉन्ड को सोने के मुकाबले अधिक आकर्षक बनाती हैं।
मजबूत डॉलर : ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद ने डॉलर को मजबूती दी है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए सोना महंगा हो गया और इसकी वैश्विक मांग में कमी आई।
मुनाफावसूली (Profit Booking) : संघर्ष से ठीक पहले सोना अपने उच्चतम स्तर पर था। कीमतों में हल्की गिरावट आते ही ऑटोमैटिक सेल ऑर्डर सक्रिय हो गए, जिससे बाजार में सोने की आपूर्ति बढ़ गई और कीमतें और नीचे गिर गईं।
शेयर बाजार का प्रभाव : शेयर बाजार में हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए भी कई बड़े निवेशक अपना सोना बेच रहे हैं ताकि नकदी की कमी को पूरा किया जा सके।
क्या डॉलर ने सोने की जगह ले ली है ?
अल्पकाल के लिए डॉलर एक सुरक्षित विकल्प के रूप में उभरा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल की खरीद के लिए डॉलर की अनिवार्य जरूरत होती है। जब तेल महंगा होता है, तो देशों को अधिक डॉलर की आवश्यकता पड़ती है, जिससे इसकी मांग और कीमत दोनों बढ़ जाती हैं।
क्या सोने का महत्व कम हो गया है?
इतिहास गवाह है कि 2011 और 2020 के बाद भी सोने में ऐसी गिरावट आई थी, लेकिन उसने फिर से मजबूती से वापसी की।
केंद्रीय बैंकों की रणनीति :दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अभी भी बड़े पैमाने पर सोना खरीद रहे हैं।
सुरक्षित संपत्ति :रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कई देशों ने यह समझा है कि वित्तीय संपत्तियों (जैसे विदेशी मुद्रा भंडार) को फ्रीज किया जा सकता है, लेकिन भौतिक सोने को प्रतिबंधित करना कठिन है।
भारत में स्थिति : हालांकि आभूषणों की मांग में थोड़ी कमी आई है, लेकिन Gold ETF (डिजिटल गोल्ड) में निवेश का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है।
भविष्य की राह
सोने का भविष्य काफी हद तक पश्चिम एशिया के संघर्ष और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगा :
यदि तेल की कीमतें स्थिर होती हैं, तो निवेशक फिर से सोने की ओर रुख कर सकते हैं।
यदि स्थिति और बिगड़ती है और स्टैगफ्लेशन (महंगाई के साथ सुस्त विकास) के हालात बनते हैं, तो सोना एक बार फिर सबसे मजबूत निवेश विकल्प के रूप में उभरेगा।