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यूएपीए (UAPA) क़ानून और सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

संदर्भ 

  • हाल ही में देश की शीर्ष अदालत ने कथित तौर पर नार्को-टेरर से जुड़े एक मामले में कश्मीरी मूल के आरोपी को जमानत देते हुए एक युगांतरकारी निर्णय दिया है। देश की सर्वोच्च अदालत (SC) ने स्पष्ट रूप से यह बात फिर कही है कि कड़े सुरक्षा कानून गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के कठोर प्रावधान, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) द्वारा प्रदत्त नागरिकों के जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को दबा नहीं सकते। 
  • इस निर्णय में वर्ष 2021 के ऐतिहासिक के.ए. नजीब (K.A. Najeeb) मामले के निर्णय को सर्वोपरि माना गया है। इस आदेश ने आतंकवाद-विरोधी कानूनों के अंतर्गत जमानत के मसलों पर सुप्रीम कोर्ट के भीतर ही समय-समय पर उभरने वाले विरोधाभासी और भिन्न न्यायिक दृष्टिकोणों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। 

यूएपीए (UAPA) की कानूनी रूपरेखा 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 

  • इस कानून को मूल रूप से वर्ष 1967 में देश की अखंडता और संप्रभुता के समक्ष उत्पन्न होने वाले खतरों और गैर-कानूनी गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए अधिनियमित किया गया था। आगे चलकर, विशेष रूप से वर्ष 2004, 2008 और 2019 के नीतिगत संशोधनों के माध्यम से इसने भारत के सबसे प्रमुख आतंकवाद-रोधी कानून का स्वरूप ले लिया।

कानून के मुख्य प्रावधान 

  • केंद्रीय एजेंसियों को किसी भी संगठन अथवा व्यक्तिगत रूप से किसी नागरिक को आतंकवादी घोषित करने का अधिकार।
  • राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) को असीमित और विशेष शक्तियां प्रदान करना।
  • बिना चार्जशीट के आरोपी की न्यायिक हिरासत की अवधि को विस्तारित करने का विकल्प। 
  • सामान्य कानूनी प्रक्रियाओं की तुलना में जमानत की शर्तों को अत्यधिक कठोर बनाना।
  • आतंकी कृत्यों से अर्जित या उसमें प्रयुक्त संपत्तियों को कुर्क/जब्त करने की अनुमति। 

जमानत से जुड़ी कानूनी जटिलता (धारा 43(D)(5)

  • यूएपीए की धारा 43(D)(5) आरोपी के लिए जमानत की संभावनाओं को नगण्य जैसी बना देती है। इसके तहत यदि सरकारी अभियोजक कोर्ट के सामने आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्ट्या (Prima Facie) साक्ष्य प्रस्तुत कर देता है, तो न्यायालय चाहकर भी जमानत मंजूर नहीं कर सकता। 
  • यह व्यवस्था सामान्य फौजदारी कानून के दोषी साबित होने तक निर्दोष के सिद्धांत को उलट देती है और खुद को बेगुनाह साबित करने की जिम्मेदारी (Reverse Burden) काफी हद तक आरोपी पर डाल देती है।

व्यावहारिक चुनौतियाँ 

  • जमानत की अर्जी पर विचार करते समय कोर्ट पूरी तरह से जांच एजेंसी द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों पर ही निर्भर रहने को विवश होते हैं।
  • इस चरण में बचाव पक्ष के साक्ष्यों के सूक्ष्म मूल्यांकन की गुंजाइश नहीं के बराबर होती है।
  • परिणामतः, दोषसिद्धि तय होने से पहले ही विचाराधीन कैदी (Undertrials) कई वर्षों तक बंदीगृहों में पड़े रहते हैं। 

जमानत के प्रश्नों पर सुप्रीम कोर्ट की परस्पर विरोधी नजीरें  

वताली वाद (2019) – राज्य एवं जांच एजेंसियों का सुदृढ़ीकरण 

  • न्यायिक रुख : शीर्ष अदालत ने इस मामले में व्यवस्था दी थी कि जमानत की सुनवाई के दौरान अदालतों को अभियोजन पक्ष की दलीलों और दस्तावेजों को व्यापक तौर पर सही मानकर चलना चाहिए। इस स्तर पर साक्ष्यों की गहरी न्यायिक पड़ताल की आवश्यकता नहीं है, केवल एक सतही प्रथम दृष्ट्या आकलन ही पर्याप्त है। 
  • परिणाम : इस निर्णय के बाद यूएपीए के मुकदमों में जमानत मिलना लगभग असंभव हो गया, विचाराधीन कैदियों की जेल अवधि अत्यधिक बढ़ गई और जांच एजेंसियों के दावों पर न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित हो गई।  

के.ए. नजीब वाद (2021) – मौलिक अधिकारों की पुनर्स्थापना 

इस ऐतिहासिक निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से राज्य की शक्तियों को संवैधानिक सीमाओं के भीतर बांधते हुए कहा कि -

  • यदि किसी कानून में विशेष प्रतिबंध भी हों, तो भी संवैधानिक अदालतें (हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट) नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हेतु जमानत दे सकती हैं। 
  • मुकदमों की सुनवाई में अत्यधिक और अकारण विलंब होना सीधे तौर पर अनुच्छेद 21 का हनन है।
  • महज किसी मामले में यूएपीए की धाराएं जुड़ जाने से किसी व्यक्ति की नागरिक स्वतंत्रता को असीमित काल के लिए बंधक नहीं बनाया जा सकता। 

वस्तुतः इस फैसले ने देश की सुरक्षा और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित किया। वर्तमान आदेश ने पुनः स्पष्ट किया है कि नजीब मामला आज भी एक वैध और बाध्यकारी कानून (Good Law) के रूप में कायम है।  

नजीब मामले के निर्णय के सिद्धांतों से अलग राय रखने वाले फैसले

  • गुरविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (2024) : इस मामले में अदालत ने  कहा कि केवल मुकदमे में हो रही देरी को आधार बनाकर यांत्रिक तरीके (Mechanical manner) से जमानत नहीं मांगी जा सकती। कोर्ट के अनुसार, जमानत के लिए यूएपीए की धारा 43(D)(5) के कड़े मानकों की कसौटी पर खरा उतरना अनिवार्य है। 
  • जनवरी 2026 का उदाहरण : इसी वर्ष जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा से जुड़े एक मामले में कहा था कि आरोपियों को मुकदमे की कछुआ चाल के आधार पर सिर्फ इसलिए राहत नहीं दी जा सकती क्योंकि उन्होंने देरी की उस संवैधानिक सीमा को पार नहीं किया है जो जमानत का अधिकार देती हो। 

हालिया न्यायिक आदेश की दूरगामी प्रासंगिकता 

  • यह निर्णय एक बार फिर भारतीय न्यायशास्त्र के सबसे संवेदनशील प्रश्न को उठाता है कि क्या राज्य की सुरक्षा के लिए बनाए गए कड़े कानून, अनुच्छेद 21 द्वारा दिए गए जीने के अधिकार और गरिमा पर हमेशा के लिए भारी पड़ सकते हैं? 
  • उच्चतम न्यायालय ने साफ किया है कि बिना किसी अदालती फैसले के नागरिकों को अंतहीन समय तक जेल में रखना, एक तरह से प्रच्छन्न दंड (Punishment in disguise) का रूप ले लेता है, जिसकी लोकतंत्र में अनुमति नहीं दी जा सकती। धारा 43-D(5) के कानूनी प्रावधान हमेशा अनुच्छेद 21 के संवैधानिक अधिदेश के अधीन ही रहेंगे। 
  • यद्यपि उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय निम्न महत्वपूर्ण बिंदुओं की ओर भी ध्यान खींचता है - 
    • आतंकवाद से जुड़े कानूनों में जमानत को लेकर अदालतों के फैसलों में एकरूपता का अभाव (न्यायिक अस्थिरता)।
    • राष्ट्रीय संप्रभुता के संरक्षण और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के बीच का द्वंद्व। 
    • इस विषय पर किसी वृहद संवैधानिक पीठ (Constitution Bench) द्वारा एक सुसंगत और स्पष्ट सिद्धांत (Doctrinal Clarity) प्रतिपादित करने की तत्काल आवश्यकता।  
  • न्यायालय की विशेष टिप्पणी : देश की शीर्ष अदालत ने दिल्ली दंगा मामले में जेएनयू के पूर्व छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद को राहत देने से इनकार करने वाले अपने ही जनवरी 2026 के पूर्ववर्ती फैसले के कई कानूनी पहलुओं पर गंभीर असहमति और आपत्तियां (Serious Reservations) प्रकट की हैं, जिसमें लगभग एक वर्ष तक उनके जमानत याचिका दायर करने के अधिकार को भी सीमित कर दिया गया था। 

न्यायिक विरोधाभासों को दूर करने के लिए सुधारात्मक कदम (Way Ahead) 

  • संवैधानिक पीठ का हस्तक्षेप : एक बड़ी न्यायिक पीठ को बिना किसी संशय के यह स्पष्ट करना चाहिए कि अनुच्छेद 21 और धारा 43(D)(5) के बीच कानूनी प्राथमिकता किसकी होगी और जमानत के वक्त अदालतें साक्ष्यों की किस हद तक जांच कर सकती हैं। 
  • सुनवाई की समय-सीमा का निर्धारण : यूएपीए के मामलों की सुनवाई करने वाली विशेष अदालतों की जवाबदेही तय हो, ताकि मुकदमों का स्पीडी ट्रायल सुनिश्चित हो सके और लोगों को अनिश्चितकाल तक विचाराधीन कैदी के रूप में न रहना पड़े। 
  • एकरूप मार्गदर्शिका का निर्माण : सर्वोच्च न्यायालय को देश की सभी अदालतों के लिए समान दिशानिर्देश जारी करने चाहिए, जिसमें जेल की अवधि, साक्ष्यों की विश्वसनीयता का पैमाना और संवैधानिक गारंटियों का संतुलन तय हो।
  • न्यायिक अनुशासन का अनुपालन : कानून की स्थिरता के लिए आवश्यक है कि जब तक किसी पुराने निर्णय को पुनर्विचार के लिए बड़ी पीठ को न भेजा जाए, तब तक छोटी पीठें पूर्व में स्थापित वरिष्ठ पीठों की मिसालों (Precedents) का अनिवार्य रूप से अक्षरशः पालन करें। 
  • विधायिका द्वारा समीक्षा : देश की संसद को समय-समय पर यूएपीए जैसे कानूनों की समीक्षा करनी चाहिए, ताकि इसके राजनीतिक या प्रशासनिक दुरुपयोग को रोका जा सके, हिरासत के प्रावधानों को तार्किक (Proportional) बनाया जाए और जांच एजेंसियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो। 

निष्कर्ष (Conclusion) 

वर्तमान विधिक बहस हमारे संवैधानिक ताने-बाने के मूलभूत प्रश्नों को स्पर्श करती है :

  • क्या देश की सुरक्षा के विशेष कानूनों के लागू होने के बाद भी जमानत एक सामान्य नियम है और जेल अपवाद का शाश्वत सिद्धांत प्रासंगिक रहता है?
  • क्या एक परिपक्व संवैधानिक लोकतंत्र में बिना दोषसिद्धि के किसी नागरिक को वर्षों सलाखों के पीछे रखने को न्यायसंगत माना जा सकता है?
  • देश की न्यायपालिका को सामूहिक सुरक्षा के व्यापक हितों और व्यक्ति की मूलभूत स्वतंत्रता के बीच की महीन लकीर को कैसे खींचना चाहिए? 

यद्यपि इन अनुत्तरित प्रश्नों के तार्किक समाधान पर ही भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली और हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों का भविष्य निर्भर करता है। एक लोकतांत्रिक गणराज्य में विधि के शासन (Rule of Law) की आत्मा को जीवित रखने के लिए एक ऐसे संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जहां राष्ट्र की सुरक्षा भी अक्षुण्ण रहे और नागरिकों के संवैधानिक अधिकार भी सुरक्षित रहें।

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