जनसांख्यिकीय संक्रमण : सिद्धांत एवं भारत पर प्रभाव
चर्चा में क्यों ?
हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने राज्य में घटती जनसंख्या वृद्धि दर और भविष्य में संभावित वृद्धावस्था संकट को देखते हुए जन्म दर बढ़ाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहनों की घोषणा की है।
इसके अंतर्गत तीसरे बच्चे के जन्म पर ₹30,000 तथा चौथे बच्चे के जन्म पर ₹40,000 की सहायता राशि देने का प्रस्ताव रखा गया है।
इससे पहले दूसरे बच्चे के जन्म पर ₹25,000 प्रोत्साहन देने का सुझाव भी सामने आया था। यह निर्णय दक्षिण भारतीय राज्यों में घटती प्रजनन दर और जनसंख्या संरचना में हो रहे परिवर्तनों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत (Demographic Transition Theory - DTT)
जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत (DTT) यह बताता है कि किसी देश की जनसंख्या संरचना समय के साथ किस प्रकार बदलती है। यह सिद्धांत दर्शाता है कि आर्थिक विकास, औद्योगीकरण, शहरीकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और जीवन स्तर में सुधार के साथ कोई समाज उच्च जन्म दर एवं उच्च मृत्यु दर की अवस्था से निम्न जन्म दर एवं निम्न मृत्यु दर की अवस्था की ओर बढ़ता है।
यह सिद्धांत मूल रूप से जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विकास के बीच संबंध को स्पष्ट करता है तथा यह समझने में सहायता करता है कि विकासशील और विकसित देशों की जनसंख्या संरचना में अंतर क्यों होता है।
सिद्धांत के प्रवर्तक
इस सिद्धांत को सर्वप्रथम वॉरेन एस. थॉम्पसन ने वर्ष 1929 में प्रस्तुत किया था, जिसमें विभिन्न देशों की जनसंख्या वृद्धि के पैटर्न का अध्ययन किया गया।बाद में फ्रैंक डब्ल्यू. नोटेस्टीन ने वर्ष 1945 में इस सिद्धांत को अधिक व्यवस्थित रूप प्रदान किया तथा आर्थिक विकास और जनसंख्या परिवर्तन के बीच संबंध को स्पष्ट किया।
जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत की अवस्थाएँ
1. उच्च स्थिर अवस्था (High Stationary Stage)
इस अवस्था में जन्म दर और मृत्यु दर दोनों अत्यधिक उच्च होती हैं, जिसके कारण कुल जनसंख्या वृद्धि बहुत कम या लगभग स्थिर रहती है।
स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव, कुपोषण, महामारी, अकाल, युद्ध तथा स्वच्छता की कमी के कारण मृत्यु दर अधिक बनी रहती है।
समाज मुख्यतः कृषि आधारित होता है और बच्चों को आर्थिक संसाधन तथा श्रम शक्ति के रूप में देखा जाता है, इसलिए जन्म दर भी अधिक रहती है।
यह अवस्था सामान्यतः आदिम अथवा पूर्व-औद्योगिक समाजों की विशेषता मानी जाती है।
2. प्रारंभिक विस्तार अवस्था (Early Expanding Stage)
इस अवस्था में चिकित्सा सुविधाओं, स्वच्छता, पोषण और खाद्य सुरक्षा में सुधार होने लगता है, जिससे मृत्यु दर में तेजी से गिरावट आती है।
जन्म दर अभी भी उच्च बनी रहती है क्योंकि सामाजिक परंपराएँ और परिवार संरचना में तत्काल परिवर्तन नहीं होता।
परिणामस्वरूप जनसंख्या वृद्धि दर अत्यधिक तेज हो जाती है और जनसंख्या विस्फोट जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
अनेक विकासशील देशों ने बीसवीं शताब्दी में इस अवस्था का अनुभव किया।
3. उत्तर विस्तार अवस्था (Late Expanding Stage)
इस चरण में शिक्षा, शहरीकरण, महिला सशक्तिकरण और परिवार नियोजन के विस्तार के कारण जन्म दर में गिरावट आने लगती है।
परिवार छोटे होने लगते हैं तथा बच्चों को आर्थिक संपत्ति के बजाय सामाजिक एवं आर्थिक उत्तरदायित्व के रूप में देखा जाने लगता है।
महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ती है और विवाह तथा मातृत्व की आयु में वृद्धि होती है।
इस अवस्था में जनसंख्या वृद्धि जारी रहती है, लेकिन उसकी गति पहले की तुलना में धीमी हो जाती है।
4. निम्न स्थिर अवस्था (Low Stationary Stage)
इस चरण में जन्म दर और मृत्यु दर दोनों निम्न स्तर पर पहुँच जाती हैं, जिसके कारण जनसंख्या वृद्धि लगभग स्थिर हो जाती है।
उच्च जीवन स्तर, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ, उन्नत शिक्षा व्यवस्था और विकसित अर्थव्यवस्था इसकी प्रमुख विशेषताएँ होती हैं।
इस अवस्था में जीवन प्रत्याशा बढ़ जाती है और वृद्ध जनसंख्या का अनुपात धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।
अधिकांश विकसित देश वर्तमान में इसी अवस्था में स्थित हैं।
5. घटती जनसंख्या अवस्था (Declining Population Stage)
इस अवस्था में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे चली जाती है, जिससे नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी का पूर्ण प्रतिस्थापन नहीं कर पाती।
वृद्ध जनसंख्या का अनुपात तेजी से बढ़ने लगता है तथा कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या घटने लगती है।
श्रमबल की कमी, सामाजिक सुरक्षा पर दबाव, पेंशन भार और आर्थिक विकास की गति में कमी जैसी चुनौतियाँ उत्पन्न होने लगती हैं।
दक्षिण भारत के कई राज्य निम्न प्रजनन दर के कारण इस स्थिति की ओर बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं।
प्रतिस्थापन प्रजनन दर (Replacement Fertility Rate)
प्रतिस्थापन प्रजनन दर से आशय उस औसत बच्चों की संख्या से है जिन्हें एक महिला को जन्म देना आवश्यक होता है ताकि वह स्वयं और अपने साथी का जनसंख्या में प्रतिस्थापन कर सके तथा कुल जनसंख्या स्थिर बनी रहे।
भारत की प्रतिस्थापन प्रजनन दर लगभग 2.1 मानी जाती है।
इसके विपरीत दक्षिण भारतीय राज्यों की प्रजनन दर लगभग 1.5 तक पहुँच चुकी है, जो प्रतिस्थापन स्तर से कम है।
लंबे समय तक निम्न प्रजनन दर रहने से भविष्य में जनसंख्या वृद्धावस्था, श्रमबल की कमी तथा आर्थिक चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
भारत पर जनसांख्यिकीय संक्रमण के प्रभाव
1. राज्यों के बीच जनसांख्यिकीय असमानता (Inter-State Divergence)
भारत के विभिन्न राज्यों में जनसांख्यिकीय संक्रमण की गति समान नहीं है, जिसके कारण क्षेत्रीय असमानताएँ बढ़ रही हैं।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में युवा आबादी का अनुपात अधिक है, जिससे इन राज्यों के पास जनसांख्यिकीय लाभांश प्राप्त करने का अधिक अवसर उपलब्ध है।
इसके विपरीत दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रजनन दर कम होने के कारण वृद्ध आबादी का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है।
यह असमानता भविष्य में श्रम बाजार, विकास और संसाधन वितरण को प्रभावित कर सकती है।