चर्चा में क्यों ?
- तमिलनाडु के राज्यपाल (राजेंद्र अर्लेकर) द्वारा तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) नेता को मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण में देरी किए जाने से भारत में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल का विवेकाधिकार कितना व्यापक होना चाहिए और लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान किस प्रकार किया जाना चाहिए।
- राज्यपाल ने कथित रूप से टीवीके से 234 सदस्यीय विधानसभा में 118 विधायकों के समर्थन का स्पष्ट प्रमाण मांगा है,
- जबकि परंपरागत रूप से सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को पहले सरकार बनाने का अवसर देकर बाद में सदन में बहुमत परीक्षण कराया जाता रहा है।
- इससे यह प्रश्न खड़ा हुआ है कि क्या राज्यपाल संवैधानिक परंपराओं से आगे जाकर राजनीतिक स्थिरता के नाम पर अतिरिक्त शर्तें लगा सकते हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि
- हाल ही में संपन्न तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में तमिलगा वेट्री कज़गम (TVK) 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। कांग्रेस के समर्थन से यह संख्या 113 तक पहुंचती है, लेकिन यह बहुमत के आंकड़े 118 से कम है।
- भारतीय संसदीय लोकतंत्र में लंबे समय से यह परंपरा रही है कि यदि किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिले तो राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने का अवसर देते हैं और उसे विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के माध्यम से बहुमत सिद्ध करने का मौका प्रदान करते हैं।
- लेकिन तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा पहले से स्पष्ट बहुमत का प्रमाण मांगने को कई विपक्षी दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनावश्यक हस्तक्षेप बताया है।
- आलोचकों का कहना है कि इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका कमजोर होती है और राज्यपाल का पद राजनीतिक विवादों के केंद्र में आ जाता है।
राज्यपाल की शक्तियों पर संवैधानिक स्थिति
अनुच्छेद 164 का प्रावधान
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार :
- मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
- अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर होती है।
- मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
- मंत्री राज्यपाल के “प्रसादपर्यंत” पद पर बने रहते हैं।
संवैधानिक व्याख्या
- संविधान में “राज्यपाल के प्रसाद” का उल्लेख है, लेकिन संसदीय लोकतंत्र में इसका अर्थ व्यक्तिगत या मनमाना विवेकाधिकार नहीं होता।
- राज्यपाल को संवैधानिक परंपराओं, लोकतांत्रिक नैतिकता और निर्वाचित प्रतिनिधियों की इच्छा के अनुसार कार्य करना होता है।
- व्यवहार में राज्यपाल की भूमिका मुख्यतः औपचारिक और संवैधानिक मानी जाती है।
- विशेषकर सरकार गठन के मामलों में उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे बहुमत की अंतिम परीक्षा विधानसभा के फ्लोर पर होने दें।
सरकार गठन की पारंपरिक प्रक्रिया
भारतीय राज्यों में सरकार गठन की एक स्थापित संवैधानिक परंपरा विकसित हो चुकी है। सामान्यतः राज्यपाल :
- सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं।
- मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाते हैं।
- प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं।
- विधानसभा में निर्धारित समय के भीतर फ्लोर टेस्ट कराने का निर्देश देते हैं।
फ्लोर टेस्ट का महत्व
संसदीय लोकतंत्र में सदन का पटल ही बहुमत परीक्षण का वैध और अंतिम मंच माना जाता है।
किसी सरकार के पास वास्तविक बहुमत है या नहीं, इसका निर्णय :
- राजभवन, मीडिया, ज्ञापन, या व्यक्तिगत दावों से नहीं बल्कि विधानसभा में खुले मतदान द्वारा होता है।
- इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने अनेक मामलों में फ्लोर टेस्ट को लोकतांत्रिक वैधता का सबसे विश्वसनीय संवैधानिक माध्यम माना है।
फ्लोर टेस्ट पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख
उत्तराखंड संकट, 2016
- 2016 Uttarakhand Constitutional Crisis के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फ्लोर टेस्ट ही बहुमत निर्धारित करने का “अंतिम संवैधानिक माध्यम” है।
- कोर्ट ने तत्कालीन मुख्यमंत्री Harish Rawat को विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दिया और संवैधानिक प्रक्रिया को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
कर्नाटक संकट, 2018
- वर्ष -2018 Karnataka Government Formation Crisis में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि कांग्रेस और जेडी(एस) ने चुनाव बाद गठबंधन किया।
- तत्कालीन राज्यपाल Vajubhai Vala ने B. S. Yediyurappa को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया और बहुमत सिद्ध करने के लिए 15 दिन का समय दिया।
- कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
- तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश Dipak Misra की अध्यक्षता वाली पीठ ने शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन संभावित खरीद-फरोख्त की आशंका को देखते हुए फ्लोर टेस्ट 36 घंटे के भीतर कराने का आदेश दिया।
- अंततः भाजपा बहुमत सिद्ध नहीं कर सकी और कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन ने सरकार बनाई। इस प्रकरण ने यह सिद्ध किया कि अंतिम निर्णय सदन के पटल पर ही होना चाहिए।
मुख्य संवैधानिक बहस : राज्यपाल का विवेकाधिकार बनाम लोकतांत्रिक जनादेश
राज्यपाल के पक्ष में तर्क
- राज्यपाल का दायित्व केवल औपचारिक नहीं बल्कि संवैधानिक स्थिरता सुनिश्चित करना भी है।
- यदि स्पष्ट बहुमत के बिना सरकार बनाई जाती है तो:
- राजनीतिक अस्थिरता, दलबदल, खरीद-फरोख्त, और प्रशासनिक संकट उत्पन्न हो सकते हैं।
- ऐसी स्थिति में राज्यपाल द्वारा पहले से समर्थन का प्रमाण मांगना एक एहतियाती कदम माना जा सकता है ताकि राज्य में स्थिर सरकार सुनिश्चित हो सके।
राज्यपाल के विरोध में तर्क
- आलोचकों का कहना है कि राज्यपाल संवैधानिक परंपराओं से ऊपर नहीं हो सकते।
- लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की इच्छा सर्वोपरि होती है।
- यदि सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का अवसर ही न दिया जाए या शपथ ग्रहण में अनावश्यक देरी की जाए, तो यह लोकतांत्रिक जनादेश को कमजोर करने जैसा माना जा सकता है।
- आलोचकों के अनुसार राज्यपाल की भूमिका एक निष्पक्ष संवैधानिक प्रमुख की होनी चाहिए, न कि सक्रिय राजनीतिक निर्णायक की।
प्रमुख संवैधानिक और शासन संबंधी मुद्दे
1. विवेकाधिकार की अस्पष्टता
- संविधान में यह स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं किया गया है कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल किस क्रम में दलों को आमंत्रित करेंगे। यही अस्पष्टता विवादों का कारण बनती है।
2. राजनीतिक पक्षपात के आरोप
- भारत में कई बार राज्यपालों पर केंद्र सरकार या किसी विशेष दल के हित में कार्य करने के आरोप लगे हैं। इससे राज्यपाल के पद की निष्पक्षता और गरिमा पर प्रश्न उठते हैं।
3. सरकार गठन में देरी
शपथ ग्रहण और बहुमत परीक्षण में अनावश्यक देरी :
- राजनीतिक अस्थिरता बढ़ा सकती है,
- प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित कर सकती है,
- तथा विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंकाओं को जन्म दे सकती है।
4. संघीय ढांचे पर प्रभाव
- राज्यपाल से जुड़े विवाद अक्सर सहकारी संघवाद और राज्यों की स्वायत्तता को प्रभावित करते हैं।
- यदि राज्यपाल केंद्र सरकार के राजनीतिक विस्तार के रूप में दिखाई देते हैं, तो इससे संघीय संतुलन कमजोर पड़ सकता है।
सरकारिया एवं पुंछी आयोग की सिफारिशें
सरकारिया आयोग -1983(Sarkaria Commission-1983 )
सरकारिया आयोग ने सरकार गठन के लिए निम्न प्राथमिकता क्रम सुझाया था :
- पूर्व-निर्वाचन गठबंधन
- सबसे बड़ी पार्टी जिसके पास समर्थन हो
- चुनाव बाद गठबंधन
- बाहरी समर्थन प्राप्त अल्पमत सरकार
इसका उद्देश्य राज्यपाल के विवेकाधिकार को सीमित करना और पारदर्शिता बढ़ाना था।
पुंछी आयोग (Punchhi Commission) Punchhi Commission(गठन 2007)
पुंछी आयोग ने सुझाव दिया कि :
- राज्यपालों की नियुक्ति निष्पक्ष तरीके से हो,
- उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर रखा जाए,
- और विवेकाधीन शक्तियों की स्पष्ट सीमाएं तय की जाएं।
आगे बढ़ने का रास्ता
स्पष्ट संवैधानिक परंपराओं का विकास
- सरकार गठन के लिए दलों को आमंत्रित करने की प्रक्रिया को लिखित रूप में मानकीकृत किया जाना चाहिए ताकि अस्पष्टता कम हो।
समयबद्ध फ्लोर टेस्ट
- सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर 24–48 घंटे के भीतर फ्लोर टेस्ट अनिवार्य बनाया जा सकता है ताकि राजनीतिक खरीद-फरोख्त की संभावना कम हो।
राज्यपाल की राजनीतिक तटस्थता
न्यायिक निगरानी
- न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर राजनीतिक हित हावी न हों।