(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, भारत एवं विश्व का प्राकृतिक भूगोल) (मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान- अति महत्त्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं (जल-स्रोत और हिमावरण सहित) के प्रभाव) |
संदर्भ
हाल ही में, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री श्री सी.आर. पाटिल ने वर्ष 2024 के लिए पूरे देश की गतिशील भूजल संसाधन आकलन रिपोर्ट जारी की।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
भूजल में सुधार के संकेत
- रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण 446.90 BCM तक पहुँच गया है। यह वृद्धि मुख्यतः वर्षा जल संचयन, तालाब और टैंक जैसी जल संरक्षण संरचनाओं के कारण संभव हुई है।
- वर्ष 2017 के आकलन से 2024 में कुल वार्षिक भूजल रिचार्ज में काफी वृद्धि (15 BCM) हुई है और दोहन में कमी (3 BCM) आई है। पिछले वर्ष की तुलना में वर्तमान आकलन वर्ष में रिचार्ज में थोड़ी कमी एवं दोहन में वृद्धि हुई है।
- टैंकों, तालाबों एवं जल संरक्षण संरचनाओं से रिचार्ज में विगत पांच आकलनों में लगातार वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2024 में यह 2023 के मुकाबले 0.39 BCM बढ़ा है।
- वर्ष 2017 के संबंध में टैंकों, तालाबों एवं जल संरक्षण संरचनाओं से रिचार्ज में 11.36 बी.सी.एम. की वृद्धि हुई है (2017 में 13.98 बी.सी.एम. से 2024 में 25.34 बी.सी.एम. तक)
- सुरक्षित श्रेणी के तहत आकलन इकाइयों का प्रतिशत 2017 में 62.6% से बढ़कर 2024 में 73.4% हो गया है (सुरक्षित आकलन इकाइयों का प्रतिशत 2023 में 73.14% था)।
- अति-शोषित आकलन इकाइयों का प्रतिशत 2017 में 17.24% से घटकर 2024 में 11.13% हो गया है (अति-शोषित आकलन इकाइयों का प्रतिशत 2023 में 11.23% था)।
क्षेत्रीय असंतुलन
- हालाँकि, सुधार के बाद भी क्षेत्रीय असंतुलन बना हुआ है। अत्यधिक दोहन वाली इकाइयाँ मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना एवं गुजरात में केंद्रित हैं।
- इसके अलावा भूजल पुनर्भरण का लगभग 61% हिस्सा वर्षा पर निर्भर है जो इसे मानसून की अनिश्चितता एवं जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील बनाता है।
भूजल स्तर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण
- कृषि-प्रेरित अत्यधिक दोहन: सिंचाई के लिए 62% भूजल उपयोग होता है। जल-गहन फसलें जैसे चावल एवं गन्ना उत्तर-पश्चिमी व प्रायद्वीपीय भारत में भूजल दबाव बढ़ाती हैं।
- मौसमी वर्षा पर निर्भरता: कुल वर्षा का लगभग 75% केवल चार महीनों में होता है जिससे वर्ष भर भूजल संतुलन बिगड़ता है।
- कठोर भूवैज्ञानिक संरचनाएँ: भारत के दो-तिहाई हिस्से में कठोर चट्टानी भूभाग है जहाँ पानी सीमित क्षेत्रों में ही जमा होता है।
- ऊर्जा सब्सिडी का प्रभाव: सस्ती या मुफ्त बिजली से अंधाधुंध पंपिंग में वृद्धि हुई है जिससे कुछ राज्यों में 25% से अधिक इकाइयाँ गंभीर/अति-शोषित हैं।
- शहरीकरण एवं औद्योगिकीकरण: गैर-कृषि क्षेत्रों में भूजल निकासी बढ़ती जा रही है।
समाधान की दिशा में कदम
- राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम (NAQUIM और NAQUIM 2.0): वैज्ञानिक आधार पर जलभृत स्तर पर योजना
- अटल भूजल योजना (ATAL JAL): समुदाय आधारित मांग-पक्ष प्रबंधन
- कृत्रिम पुनर्भरण मास्टर प्लान (2020): मानसून अपवाह का संरक्षण और पुनर्भरण
- जल शक्ति अभियान: वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण पर ध्यान
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना– भूजल घटक: सुरक्षित सिंचाई एवं संयुक्त जल उपयोग को बढ़ावा
भविष्य की राह
- जलभंडार आधारित योजना: ग्राम स्तर पर NAQUIM का विस्तार, विशेष रूप से अति-शोषित एवं महत्वपूर्ण इकाइयों में।
- मांग-पक्षीय सुधार: फसल पैटर्न में बदलाव, बिजली सब्सिडी का युक्तिसंगत प्रबंधन और सूक्ष्म-सिंचाई का विस्तार
- कृत्रिम पुनर्भरण: 1.42 करोड़ संरचनाओं के निर्माण से मानसून अपवाह का दोहन
- सामुदायिक भागीदारी: 8,220 जल-संकटग्रस्त ग्राम पंचायतों में व्यवहारिक एवं मांग-पक्षीय हस्तक्षेप
- डेटा-आधारित प्रशासन: IN-GRES जैसे GIS प्लेटफॉर्म का प्रयोग करके वास्तविक समय में नीतिगत सुधार
निष्कर्ष
वर्ष 2024 का भूजल आकलन सावधानीपूर्ण आशावाद दिखाता है। भूजल पुनर्भरण बेहतर हुआ और अत्यधिक दोहन घटा, लेकिन क्षेत्रीय दबाव, जलवायु जोखिम और शासन संबंधी कमियाँ अब भी खतरा बनी हुई हैं। यद्यपि दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए सामुदायिक भागीदारी, जलभंडार आधारित योजना और जलवायु-अनुकूल प्रबंधन जरूरी हैं।