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अमेरिका पर बढ़ती एलपीजी निर्भरता: भारत की ऊर्जा सुरक्षा के सामने नई चुनौती

संदर्भ 

  • भारत की ऊर्जा सुरक्षा में एलपीजी की भूमिका आर्थिक के साथ सामाजिक और राजनीतिक भी है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, भारत की 67% एलपीजी आपूर्ति अब अमेरिका से हो रही है, जो पहले के लगभग 10% लक्ष्य से बड़ा बदलाव है। 2026 के लिए सरकारी तेल कंपनियों ने अमेरिका से 22 लाख टन एलपीजी खरीदने का दीर्घकालिक समझौता किया है।
  • भारत अपनी एलपीजी खपत का करीब 60% आयात करता है, जिसमें लगभग 90% आपूर्ति होरमुज़ जलडमरूमध्य से आती है। 2026 के पश्चिम एशियाई संकट के दौरान फरवरी-जून में वहां से आयात 85% घटा, जबकि अमेरिका से जून में आयात बढ़कर 0.77 मिलियन टन हो गया। इससे भारत की बढ़ती अमेरिकी निर्भरता और आपूर्ति-विविधीकरण दोनों स्पष्ट होते हैं। 

अमेरिका: समाधान या नई निर्भरता?  

  • अमेरिका से एलपीजी आयात बढ़ाना तत्काल संकट के संदर्भ में व्यावहारिक निर्णय है। जब होरमुज़ मार्ग बाधित हो और खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति अनिश्चित हो, तब वैकल्पिक स्रोतों से एलपीजी लेना आवश्यक है। लेकिन ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ केवल एक जोखिमपूर्ण स्रोत को दूसरे स्रोत से बदल देना नहीं है। 
  • अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता अपने साथ अलग तरह के रणनीतिक जोखिम ला सकती है। अमेरिका ने वित्तीय प्रतिबंधों, निर्यात नियंत्रणों और तकनीकी प्रतिबंधों को विदेश नीति के प्रभावी औजार के रूप में इस्तेमाल किया है। ईरान, रूस, वेनेज़ुएला, सीरिया और अन्य देशों के मामले इसके उदाहरण हैं। यहां तक कि तीसरे देशों के साथ होने वाले लेन-देन को भी अमेरिकी प्रतिबंध प्रभावित कर सकते हैं। 
  • रूस और ईरान से संबंधित 2026 के प्रस्तावित लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट में रूस के तेल और गैस के शीर्ष पांच खरीदारों पर 100% तक शुल्क लगाने का प्रावधान इसी व्यापक रणनीतिक जोखिम को दर्शाता है।
  • इसलिए भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अमेरिकी आपूर्ति को अवसर के रूप में इस्तेमाल करे, लेकिन उसे अपनी एलपीजी व्यवस्था का नया एकाधारी आधार न बनने दे।

कीमत बनाम आपूर्ति सुरक्षा 

  • अमेरिकी एलपीजी का आकर्षण केवल उपलब्धता तक सीमित नहीं है। उत्पादन स्थल पर मोंट बेलव्यू आधारित अमेरिकी प्रोपेन अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी हो सकता है। लेकिन भारत तक पहुंचने के बाद तस्वीर बदल जाती है। अमेरिका से एलपीजी की समुद्री यात्रा में लगभग 25–35 दिन लगते हैं, जबकि खाड़ी क्षेत्र से केवल 5–10 दिन। यही भौगोलिक निकटता पश्चिम एशियाई एलपीजी को सामान्य परिस्थितियों में लागत के लिहाज से अधिक आकर्षक बनाती है। 
  • सऊदी अरामको सीपी आधारित एलपीजी आम तौर पर भारत के लिए बंदरगाह तक पहुंचने की कुल लागत में अमेरिकी आपूर्ति से प्रतिस्पर्धी रहती है। हालांकि होरमुज़ संकट ने इस समीकरण को अस्थायी रूप से बदल दिया। सऊदी सीपी की कीमत फरवरी में लगभग 543 डॉलर प्रति टन से बढ़कर जून में करीब 790 डॉलर प्रति टन हो गई, यानी लगभग 46% की वृद्धि। इसके साथ माल ढुलाई और भू-राजनीतिक जोखिम की लागत भी बढ़ी। ऐसी परिस्थिति में लंबी दूरी के बावजूद अमेरिकी एलपीजी भारत के लिए आकर्षक विकल्प बन गई।
  • इससे स्पष्ट है कि ऊर्जा सुरक्षा में केवल उत्पादन मूल्य नहीं, बल्कि परिवहन, बीमा, जोखिम प्रीमियम और आपूर्ति की विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण हैं। 

एलपीजी की कीमत का व्यापक आर्थिक प्रभाव 

  • भारत में एलपीजी राजनीतिक रूप से संवेदनशील ईंधन है। घरेलू रसोई गैस की कमी या कीमत में तेज वृद्धि का सीधा असर परिवारों पर पड़ता है और इसके राजनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं। इसलिए सरकार के लिए कई बार लागत से अधिक महत्वपूर्ण निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना होता है। 
  • लेकिन आयातित एलपीजी की कीमत बढ़ने और रुपये के कमजोर होने का असर तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर पड़ता है। यदि सरकार घरेलू एलपीजी की कीमतें नियंत्रित रखती है, तो अंतरराष्ट्रीय कीमत और घरेलू बिक्री मूल्य के बीच का अंतर ओएमसी यानी तेल विपणन कंपनियों की अंडर-रिकवरी बढ़ाता है। 31 जुलाई 2026 तक सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की संचित अंडर-रिकवरी 59,000 करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी थी। 
  • अमेरिका में ऊंची महंगाई की स्थिति में यदि फेडरल रिजर्व ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रखता है और डॉलर मजबूत होता है, तो भारत के लिए एलपीजी आयात और महंगा हो सकता है। इस प्रकार एलपीजी निर्भरता का संबंध केवल ऊर्जा नीति से नहीं, बल्कि रुपये, मुद्रास्फीति, राजकोषीय स्थिति और मौद्रिक नीति से भी जुड़ जाता है।

घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी 

  • भारत की दीर्घकालिक कमजोरी घरेलू एलपीजी उत्पादन और खपत के बीच बढ़ता अंतर है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में एलपीजी उत्पादन लगभग 4.26–4.3 मिलियन टन रहा, जबकि खपत 6.5 मिलियन टन तक पहुंच गई। 
  • हालांकि संकट के दौरान रिफाइनरियों को प्रोपेन, ब्यूटेन और अन्य धाराओं को एलपीजी पूल में डालने तथा उत्पादन अधिकतम करने के निर्देश दिए गए। परिणामस्वरूप एलपीजी उत्पादन में साल-दर-साल 35.73% की वृद्धि हुई और ओएमसी ने दैनिक उत्पादन को लगभग 34,000 टन से बढ़ाकर 55,000 टन कर दिया। 
  • फिर भी यह संकट-कालीन उपाय स्थायी समाधान नहीं है। 1 जुलाई 2026 तक इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के पास संयुक्त रूप से 33.14 करोड़ सक्रिय घरेलू एलपीजी ग्राहक थे, जिनकी संख्या 2015–2026 के दौरान 7.6% सीएजीआर यानी चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ी। बढ़ती खपत के सामने घरेलू उत्पादन बढ़ाना इसलिए अनिवार्य है।

आगे की रणनीति 

  • भारत को एलपीजी आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लानी होगी। ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, नाइजीरिया और अंगोला वैकल्पिक स्रोत हो सकते हैं, हालांकि वे खाड़ी की बड़ी आपूर्ति की पूरी भरपाई नहीं कर सकते। रणनीति का लक्ष्य एक स्रोत से दूसरे पर निर्भरता नहीं, बल्कि कई स्रोतों का संतुलित नेटवर्क होना चाहिए। इसके लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने, दीर्घकालिक अनुबंधों में विविधता लाने, रणनीतिक एलपीजी भंडार बनाने और ओएमसी के लिए बेहतर विदेशी मुद्रा जोखिम-प्रबंधन जरूरी है।
  • अमेरिका से एलपीजी आयात बढ़ाना मौजूदा संकट में उपयोगी है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान नहीं। वास्तविक ऊर्जा सुरक्षा तभी होगी, जब किसी एक देश या समुद्री मार्ग का भारत की आपूर्ति पर निर्णायक नियंत्रण न हो। इसलिए भारत को सस्ती एलपीजी के साथ-साथ विश्वसनीय, विविधीकृत और रणनीतिक रूप से सुरक्षित ऊर्जा व्यवस्था विकसित करनी होगी।
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