(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।) |
संदर्भ
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने व्यय पैटर्न में अनियमितताएँ पाए जाने के बाद, राज्यों को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत "उच्च लागत" वाले कार्यों की जाँच करने का निर्देश दिया है।
मनरेगा संबंधित हालिया मुद्दे
- ग्रामीण विकास मंत्रालय ने कई परियोजनाओं की पहचान की है जिनकी लागत स्वीकृत मानदंडों की तुलना में आनुपातिक रूप से अधिक थी।
- भूमि विकास, जल संरक्षण और बुनियादी ढाँचे से संबंधित कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है जहाँ लागत में वृद्धि की सूचना मिली थी।
- राज्यों को पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए रिपोर्ट प्रस्तुत करने और सुधारात्मक उपाय करने के निर्देश दिए गए हैं।
- यह निर्देश CAG की टिप्पणियों और कुछ जिलों में धन के दुरुपयोग की शिकायतों के बाद जारी किया गया है।
- अधिकांश राज्यों ने अभी तक इस योजना पर अपने निष्कर्ष साझा नहीं किए हैं।
- त्रिपुरा, झारखंड, मिज़ोरम और छत्तीसगढ़ सहित कुछ राज्यों ने "आंशिक" रिपोर्ट साझा की हैं।
- यद्यपि केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर के निरीक्षकों द्वारा आंतरिक ऑडिट और क्षेत्रीय निरीक्षण कराती है, लेकिन यह पहली बार है जब उसने राज्यों से विशेष रूप से उच्च लागत वाले कार्यों की जांच करने को कहा है।
निर्देशों का महत्त्व
- सार्वजनिक व्यय में जवाबदेही: मनरेगा दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजना है, जो 100 दिनों के वेतनभोगी रोजगार की गारंटी देती है। धन का दुरुपयोग इसकी विश्वसनीयता को कम करता है।
- केंद्र-राज्य संबंध: मनरेगा एक केंद्र प्रायोजित योजना है; इसलिए, राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने के लिए धन की निगरानी महत्त्वपूर्ण है।
मनरेगा योजना के बारे में
- वर्ष 2005 में संसद द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) पारित किए जाने के बाद, वर्ष 2006 में इस योजना की शुरुआत की गई थी।
- इसे सबसे पहले देश के 200 सबसे पिछड़े ग्रामीण जिलों में शुरू किया गया था और वित्त वर्ष 2007-08 में 130 और जिलों तक और वर्ष 2008-09 से पूरे देश में लागू किया गया था।
वित्तीय आवंटन एवं विस्तार
- केंद्र ने हाल के वर्षों में मनरेगा पर सालाना लगभग 1 लाख करोड़ रुपये खर्च किए हैं।
- चालू वित्त वर्ष (2025-26) के लिए, केंद्र ने इस योजना के लिए 86,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।
- वर्ष 2020-21 के दौरान इस योजना में काम की मांग में तेजी देखी गई जब कोविड-19 के प्रकोप के मद्देनजर रिकॉर्ड 7.55 करोड़ ग्रामीण परिवारों ने इस योजना का लाभ उठाया।
- यह योजना वर्ष 2020 में कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान अपने गाँव लौटे प्रवासी कामगारों के लिए एक सुरक्षा कवच बन गई।
- पिछले तीन वित्तीय वर्षों (2022-23 से 2024-25) में पश्चिम बंगाल के लिए नरेगा लाभार्थियों के आंकड़े शामिल नहीं हैं, जहाँ मार्च 2022 से यह योजना निलंबित है।
- हाल ही में, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने मनरेगा को जारी रखने का एक प्रस्ताव व्यय वित्त समिति (Expenditure Finance Committee: EFC) के अनुमोदन हेतु भेजा है।
- जिसमें वर्ष 2029-30 तक पाँच वर्षों के लिए 5.23 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय की माँग की गई है।
- ई.एफ.सी. एक केंद्रीय निकाय है जो सरकारी योजनाओं और परियोजनाओं का मूल्यांकन करता है। यह वित्त मंत्रालय के अधीन आता है।
आगे की राह
- सामाजिक लेखा परीक्षा तंत्र को मज़बूत करना।
- बेहतर निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी (जीआईएस मैपिंग, डिजिटल मस्टर रोल, आधार-आधारित भुगतान) का उपयोग बढ़ाना।
- यह सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय क्षमता का निर्माण करना कि परियोजनाएँ आवश्यकता-आधारित और लागत-प्रभावी हों।