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भारत में जिप्सम खनन

(प्रारंभिक परीक्षा : भारत एवं विश्व का प्राकृतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल )
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1 : विश्व भर के मुख्य प्राकृतिक संसाधनों का वितरण (दक्षिण एशिया एवं भारतीय उपमहाद्वीप को शामिल करते हुए), विश्व (भारत सहित) के विभिन्न भागों में प्राथमिक, द्वितीयक व तृतीयक क्षेत्र के उद्योगों को स्थापित करने के लिये ज़िम्मेदार कारक)

संदर्भ

राजस्थान के कई गाँव जिप्सम खनन से प्रभावित रहे हैं। वहाँ के निवासियों ने जिप्सम खनन के कारण प्रभावित हुई भूमि को पुनर्जीवित किया है जिससे वहाँ स्थानीय वनस्पति एवं जानवरों को पुन: देखा जा सकता है। 

भारत में जिप्सम भंडार एवं खनन की स्थिति 

  • अनुमानित रूप से भारत का कुल जिप्सम भंडार लगभग 1,286 मिलियन टन है जिसमें से 80% से अधिक हिस्सा राजस्थान में पाया जाता है।
  • जिप्सम के भंडार वाले अन्य राज्यों में गुजरात, जम्मू एवं कश्मीर और तमिलनाडु शामिल हैं।
  • इस खनिज का निष्कर्षण खुले गड्ढे (Openpit) एवं भूमिगत खनन दोनों तरीकों से किया जाता है जो निक्षेप (भंडार) की गहराई व गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
  • जिप्सम का खनन मुख्यत: सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों, जैसे- एफसीआई अरावली जिप्सम एंड मिनरल्स इंडिया लिमिटेड (FAGMIL) द्वारा किया जाता है। 
    • FAGMIL का संचालन रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के तहत होता है।

जिप्सम का आर्थिक महत्व

  • निर्माण उद्योग के लिए जिप्सम एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है जिसका उपयोग सीमेंट, प्लास्टर एवं ड्राईवॉल के उत्पादन में किया जाता है।
  • यह कृषि के लिए आवश्यक खनिज है जहाँ यह मृदा कंडीशनर के रूप में कार्य करता है और फसलों के लिए कैल्शियम व सल्फर का स्रोत है।
  • भारत के तीव्र शहरीकरण और कृषि क्षेत्र के विस्तार के कारण जिप्सम की माँग में निरंतर वृद्धि हो रही है।

पर्यावरण संबंधी चुनौतियाँ

  • आवास व्यवधान : खनन गतिविधियों से प्राकृतिक आवासों का विनाश हो सकता है जिससे स्थानीय जैव विविधता प्रभावित हो सकती है।
  • मृदा अपरदन : खनन कार्यों के दौरान ऊपरी मृदा को हटाने से मृदा अपरदन हो सकता है जिससे भूमि की उर्वरता कम हो सकती है।
  • जल प्रदूषण : खनन प्रक्रियाएँ गाद एवं रसायनों के साथ आस-पास के जल स्रोतों को दूषित कर सकती हैं जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र व स्थानीय समुदाय प्रभावित हो सकते हैं।
  • वायु प्रदूषण : खनन एवं प्रसंस्करण के दौरान उत्पन्न धूल वायु प्रदूषण में वृद्धि कर सकती है जिससे श्रमिकों व निवासियों के लिए स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न हो सकता है।

संधारणीय खनन प्रथाएँ

  • खनन क्षेत्रों का पुनर्वास : वनस्पतियों के पुनर्विकास एवं वन्यजीवों के लिए आवास निर्माण के माध्यम से खनन क्षेत्रों को बहाल करके पर्यावरणीय क्षति को कम किया जा सकता है।
  • विनियामक अनुपालन : खनन गतिविधियों में पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित करने के लिए विनियमन एवं निगरानी तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है।
  • संसाधनों का कुशलतम उपयोग : संसाधन निष्कर्षण को अधिकतम करने और अपशिष्ट को न्यूनतम करने के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों का प्रयोग करने से खनन कार्यों की दक्षता में वृद्धि हो सकती है।
  • सामुदायिक सहभागिता : निर्णयन प्रक्रियाओं में स्थानीय समुदायों को शामिल करने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खनन गतिविधियों से उन्हें आर्थिक एवं सामाजिक रूप से लाभ हो।
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