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भारतीय उद्योग : मुद्दे, चुनौतियाँ एवं अवसर

(प्रारंभिक परीक्षा: आर्थिक और सामाजिक विकास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय, औद्योगिक विकास)

भूमिका

भारतीय उद्योग ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ घरेलू संरचनात्मक परिवर्तन और वैश्विक आर्थिक अस्थिरताएँ एक साथ प्रभाव डाल रही हैं। तकनीकी प्रगति, वैश्वीकरण के बदलते स्वरूप, जलवायु परिवर्तन से जुड़ी प्रतिबद्धताएँ और भू-राजनीतिक तनावों ने औद्योगिक विकास के समक्ष नई जटिलताएँ उत्पन्न की हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय उद्योगों के समक्ष मौजूद मुद्दों, चुनौतियों एवं अवसरों का समग्र विश्लेषण अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

भारतीय उद्योगों के समक्ष प्रमुख मुद्दे

  • भारतीय उद्योगों की एक मूलभूत समस्या उच्च उत्पादन लागत है। देश में लॉजिस्टिक लागत सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 13-14% है जो वैश्विक औसत से अधिक है। 
  • अपर्याप्त भौतिक अवसंरचना, बहु-स्तरीय परिवहन प्रणाली और प्रक्रियागत अक्षमताएँ इस लागत को बढ़ाती हैं। इसके अतिरिक्त, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और कच्चे माल के आयात पर निर्भरता भी लागत संरचना को प्रभावित करती हैं।
  • सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र भारतीय उद्योगों की रीढ़ है, किंतु यह अनेक संरचनात्मक समस्याओं से ग्रस्त है। सीमित पूंजी, औपचारिक ऋण तक कठिन पहुँच, तकनीकी पिछड़ापन, भुगतान में देरी और अनुपालन बोझ इस क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को सीमित करते हैं।

उभरती चुनौतियाँ

  • भारतीय उद्योगों के सामने एक गंभीर चुनौती कौशल-अंतर (Skill Gap) की है। चौथी औद्योगिक क्रांति के संदर्भ में ऑटोमेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीकों का उपयोग बढ़ता जा रहा है, जबकि कार्यबल का बड़ा हिस्सा इन नई आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षित नहीं है। इससे उत्पादकता एवं रोजगार दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, संरक्षणवाद एवं सप्लाई-चेन में व्यवधान भी भारतीय उद्योगों के लिए अनिश्चितता बढ़ाते हैं। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में बढ़ते पर्यावरण, सामाजिक एवं शासन (ESG) मानक उद्योगों पर हरित प्रौद्योगिकी अपनाने का दबाव बनाते हैं जिसके लिए दीर्घकालिक निवेश आवश्यक है।

भारतीय उद्योगों के लिए अवसर

  • इन चुनौतियों के बावजूद भारतीय उद्योगों के लिए अनेक अवसर भी हैं। भारत का विशाल घरेलू बाजार, बढ़ती मध्यम वर्गीय जनसंख्या और युवा कार्यबल उद्योगों को स्थिर मांग व जनसांख्यिकीय लाभांश प्रदान करते हैं।
  • सरकार द्वारा आरंभ की गई मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ विनिर्माण क्षेत्र को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जोड़ने में सहायक हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, रक्षा, सेमीकंडक्टर एवं नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में निवेश के नए अवसर उभर रहे हैं।

नीतिगत पहल और आगे की राह

लॉजिस्टिक सुधार, कौशल विकास, MSME सशक्तिकरण और तकनीकी नवाचार को नीति-निर्माण के केंद्र में रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही, हरित और सतत औद्योगिक विकास को बढ़ावा देकर भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।

निष्कर्ष

समग्र रूप से, भारतीय उद्योगों के सामने मौजूद मुद्दे और चुनौतियाँ गंभीर हैं, परंतु उपलब्ध अवसर उनसे कहीं अधिक व्यापक हैं। उपयुक्त नीतिगत समर्थन, तकनीकी उन्नयन और मानव संसाधन विकास के माध्यम से भारत एक प्रतिस्पर्धी, आत्मनिर्भर व सतत औद्योगिक अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सकता है।

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