संदर्भ
- हाल ही में विदेश मंत्रालय (MEA) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता प्रमाणपत्र के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज़ है। उनके अनुसार, पासपोर्ट का उद्देश्य भारतीय नागरिकों को विदेशों में यात्रा और आवागमन की सुविधा प्रदान करना है। इसलिए इसकी तुलना उन दस्तावेज़ों से नहीं की जानी चाहिए जिनका उपयोग नागरिकता संबंधी अधिकारों की पुष्टि के लिए किया जाता है।
- 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अधिकारी ने बताया कि वर्तमान में 27 देश भारतीय पासपोर्ट धारकों को वीज़ा-मुक्त प्रवेश की सुविधा देते हैं। इसके अतिरिक्त, 47 देशों में भारतीय नागरिकों को आगमन पर वीज़ा (Visa on Arrival) प्राप्त हो सकता है, जबकि 66 देश भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए ई-वीज़ा की व्यवस्था उपलब्ध कराते हैं।
पासपोर्ट और नागरिकता: कानूनी स्थिति और अंतर
विदेश मंत्रालय के अनुसार पासपोर्ट नागरिकता का निर्णायक प्रमाण क्यों नहीं है?
- पासपोर्ट अधिनियम की धारा 5 के तहत, गहन जाँच के बाद ही पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज़ जारी किए जाते हैं, जिनका प्राथमिक उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय यात्रा को वैध बनाना है। कानूनन, वैध पासपोर्ट के बिना कोई भी व्यक्ति भारत से बाहर नहीं जा सकता।
- सरकार की पासपोर्ट नियमावली मानती है कि पासपोर्ट धारक की राष्ट्रीयता का एक साक्ष्य है, लेकिन इसे नागरिकता के अन्य दस्तावेजी सबूतों के समकक्ष ही दर्जा प्राप्त है।
- कानूनी दृष्टिकोण : पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम या अकाट्य (Conclusive) प्रमाण नहीं माना जाता। यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर कानूनी सवाल उठता है, तो अदालतें पासपोर्ट के अलावा अन्य संबंधित साक्ष्यों की भी जांच करती हैं।
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) : इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पासपोर्ट इस भरोसे पर जारी होता है कि धारक भारतीय नागरिक है। इसी आधार पर वह विदेशों में भारतीय गणराज्य की सुरक्षा और राजनयिक मदद का हकदार बनता है।
- अपवाद (धारा 20) : जहाँ धारा 6(2)(क) के तहत गैर-नागरिकों को पासपोर्ट देने से मना किया जा सकता है, वहीं धारा 20 केंद्र सरकार को यह विशेष शक्ति देती है कि वह जनहित में किसी गैर-नागरिक को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज़ जारी कर सकती है।
- उदाहरण : वर्ष 2023 में हरिणा बनाम क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी मामले में, मद्रास उच्च न्यायालय ने श्रीलंका की एक राज्यविहीन (Stateless) शरणार्थी लड़की को धारा 20 के तहत पासपोर्ट आवेदन करने की अनुमति दी और सरकार को इस पर विचार करने का आदेश दिया।
अतः, विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम से होता है, जबकि पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम के तहत बनता है। इसलिए किसी कानूनी विवाद में केवल पासपोर्ट होना नागरिकता का अचूक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
क्या भारत में नागरिकता का कोई एकल (Universal) दस्तावेज़ है ?
- भारत में नागरिकता प्रमाणित करने के लिए कोई एक सार्वभौमिक दस्तावेज़ तय नहीं है। नागरिकता का दावा इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस माध्यम (जन्म, वंश, पंजीकरण या प्राकृतिककरण) से प्राप्त की गई है।
- जिन लोगों ने पंजीकरण या प्राकृतिककरण (Naturalisation) के ज़रिए नागरिकता ली है, उन्हें नागरिकता प्रमाण पत्र मिलता है।
- इसके विपरीत, जन्म या वंश के आधार पर नागरिक देश में रहने वाले अधिकांश भारतीयों के पास ऐसा कोई एकल प्रमाण पत्र नहीं होता। उनकी नागरिकता समय, स्थान, माता-पिता की राष्ट्रीयता से जुड़े विभिन्न दस्तावेज़ों की कड़ियों (Chain of documents) से सिद्ध होती है।
भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के चार मुख्य तरीके
- नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार नागरिकता मुख्य रूप से चार तरीकों से मिलती है (ध्यान दें कि भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है):
- जन्म से (By Birth) : समय के साथ इसमें बदलाव आए हैं :
- 26 जनवरी 1950 से 1 जुलाई 1987 के मध्य भारत में जन्मा हर व्यक्ति स्वतः भारतीय है, चाहे माता-पिता किसी भी देश के हों।
- 1 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के मध्य जन्म के समय माता या पिता में से किसी एक का भारतीय नागरिक होना ज़रूरी है।
- 3 दिसंबर 2004 के बाद माता या पिता में से एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा अवैध प्रवासी (Illegal Migrant) न हो।
- वंश द्वारा (By Descent) : भारत से बाहर जन्मे व्यक्ति को नागरिकता मिल सकती है यदि उसके माता-पिता में से कोई भारतीय हो। 3 दिसंबर 2004 के बाद विदेश में जन्मे बच्चों के लिए जन्म के एक वर्ष के भीतर भारतीय वाणिज्य दूतावास (Consulate) में पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
- पंजीकरण द्वारा (By Registration) : भारतीय मूल के लोग, भारतीय नागरिकों के जीवनसाथी (Spouse) या उनके नाबालिग बच्चे, अधिनियम की निर्धारित शर्तों और निवास अवधि को पूरा करके इसके लिए आवेदन कर सकते हैं।
- प्राकृतिककरण द्वारा (By Naturalisation) : कोई भी विदेशी नागरिक, जो आमतौर पर 12 वर्षों से भारत में रह रहा हो और तीसरी अनुसूची की योग्यताओं को पूरा करता हो, इस माध्यम से नागरिकता ले सकता है।
नागरिकता कानून में आए ऐतिहासिक बदलाव (संशोधन)
नागरिकता अधिनियम में 1986, 2003, 2005, 2015 और 2019 में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए, जिससे जन्म के आधार पर नागरिकता मिलने का दायरा लगातार सीमित (Restrictive) होता गया:
- 1986 का संशोधन : इसने केवल भारत की धरती पर जन्म लेने मात्र से मिलने वाली स्वतः नागरिकता को समाप्त कर दिया और माता-पिता में से कम से कम एक के भारतीय होने की शर्त जोड़ी।
- 2003 का संशोधन : इसने नियमों को और शख्त किया। अब जन्म से नागरिकता तभी मिल सकती है जब माता-पिता दोनों भारतीय हों या एक भारतीय हो और दूसरा अवैध प्रवासी न हो। वस्तुतः इस संशोधन ने अवैध प्रवासियों के लिए पंजीकरण या प्राकृतिककरण के रास्ते भी बंद कर दिए।
- 2019 का संशोधन (CAA) : इस नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले भारत आए छह धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) के प्रवासियों के लिए नागरिकता का विशेष रास्ता बनाया गया और उनके लिए प्राकृतिककरण की समयावधि को कम किया गया।