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भारत की पहली जीन-संपादित भेड़

(प्रारंभिक परीक्षा : विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नप्रत्र- 3: प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास, जैव विविधता, पर्यावरण, सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन, सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता)

संदर्भ

शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST), कश्मीर ने CRISPR-Cas9 तकनीक का उपयोग करके भारत की पहली जीन-संपादित भेड़ विकसित की है। यह उपलब्धि पशु जैव प्रौद्योगिकी में भारत को वैश्विक जीन-संपादन अनुसंधान के नक्शे पर स्थापित करती है।

क्या है जीन-संपादन (Gene Editing) 

  • जीन-संपादन एक आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी तकनीक है जिसकी सहायता से वैज्ञानिक किसी जीव के DNA (अनुवांशिक पदार्थ) में सटीक, लक्षित एवं नियंत्रित बदलाव कर सकते हैं। 
  • CRISPR-Cas9 इस क्षेत्र में सबसे उन्नत एवं सटीक तकनीक है जो आनुवंशिक सामग्री को जोड़ने, हटाने या बदलने में सक्षम है। भेंड को विकसित करने में इसी तकनीक का प्रयोग किया गया है।  

जीन संपादित भेंड : तकनीकी विशेषताएँ 

  • लक्षित जीन : शोधकर्ताओं के अनुसार जीन-संपादित भेंड को ‘मायोस्टैटिन’ जीन के लिए संशोधित किया गया है जो मांसपेशियों की वृद्धि का नियामक है। इससे जानवर में मांसपेशियों का द्रव्यमान लगभग 30% तक बढ़ जाता है। यह एक ऐसा गुण है जो भारतीय भेड़ की नस्लों में स्वाभाविक रूप से अनुपस्थित होता है। 
    • शोधकर्ताओं की टीम ने मेमने के मायोस्टेटिन जीन को संपादित किया जो भेड़ में मांसपेशियों की वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार है।
  • CRISPR-Cas9 का उपयोग: इस तकनीक का उपयोग करके शोधकर्ताओं ने अंतर्राष्ट्रीय जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि यह प्रक्रिया सुरक्षित एवं नैतिक है।
  • विदेशी डी.एन.ए. की अनुपस्थिति: पारंपरिक ट्रांसजेनिक जीवों के विपरीत इस भेड़ में कोई विदेशी डी.एन.ए. नहीं जोड़ा गया है जिससे इसे नियामक अनुमोदन प्राप्त करने में आसानी होगी। यह भारत की जैव प्रौद्योगिकी नीति के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।

महत्त्व 

  • आर्थिक प्रभाव : किसानों को अधिक उपज एवं बेहतर नस्लों से आर्थिक रूप से लाभ मिलेगा जिससे पशुपालकों की आय और खाद्य सुरक्षा में सुधार होगा। यह विशेष रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी हो सकता है।
  • रोग प्रतिरोधकता और प्रजनन: जीन-संपादन तकनीक का उपयोग रोग प्रतिरोधी पशुओं को विकसित करने और जन्म के समय जुड़वां बच्चों की संभावना बढ़ाने में भी किया जा सकता है जो पशुपालन उद्योग के लिए क्रांतिकारी सिद्ध हो सकता है
  • मांस उत्पादन में वृद्धि : Myostatin जीन को निष्क्रिय करने से भेड़ की मांसपेशियों की वृद्धि 30% अधिक होगी जिससे मांस उत्पादन बढ़ेगा। 
  • विदेशी नस्लों पर निर्भरता में कमी : देशी नस्लों में ही सुधार कर यूरोपीय नस्लों जैसी विशेषताएँ लाई जा सकती हैं।

आगे की राह 

  • नियामक ढांचे का विकास : भारत को स्पष्ट एवं पारदर्शी नियामक दिशानिर्देश चाहिए जो CRISPR आधारित संपादन को वैज्ञानिकों और किसानों दोनों के लिए स्वीकार्य बनाए।
  • प्रायोगिक से व्यावसायिक उपयोग तक : अनुसंधान स्तर से इसे फील्ड ट्रायल एवं अंततः व्यावसायिक उत्पादन तक लाने की जरूरत है।
  • अन्य पशुओं एवं फसलों में उपयोग : इस तकनीक का उपयोग गाय, बकरी, सूअर एवं मुर्गी जैसे पशुओं व फसलों में भी किया जा सकता है।
  • किसानों को जागरूक करना : तकनीक के लाभ, सुरक्षा एवं व्यावहारिक उपयोग के बारे में किसानों को प्रशिक्षित करना आवश्यक है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग : जीन-संपादन पर वैश्विक अनुसंधान प्रयोगशालाओं और नीति संस्थाओं से सहयोग बढ़ाना चाहिए।
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