संदर्भ
- भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य विमर्श में दशकों से RMNCH+A (प्रजनन, मातृ, नवजात, बाल और किशोर स्वास्थ्य) रणनीति की धुरी माता रही है। हालांकि, हालिया वैज्ञानिक शोधों और 2026 के आंकड़ों ने एक चौंकाने वाले सच को उजागर किया है। हमने प्रजनन स्वास्थ्य की पूरी प्रक्रिया से पिताओं को लगभग पूरी तरह बाहर कर दिया है। यह चूक न केवल पुरुषों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जैविक मजबूती के लिए भी एक बड़ा खतरा है।
बदलती वास्तविकता: संकट में पुरुष प्रजनन क्षमता
प्रजनन स्वास्थ्य का अर्थ केवल संतानोत्पत्ति नहीं, बल्कि एक सुरक्षित यौन जीवन और यह तय करने की स्वतंत्रता है कि परिवार कब और कैसे बढ़ाना है। लेकिन वर्तमान आंकड़े एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं:
- शुक्राणु गुणवत्ता में तीव्र गिरावट : पिछले 30 वर्षों में औसत शुक्राणु संख्या 60 मिलियन/मिलीलीटर से घटकर मात्र 20 मिलियन/मिलीलीटर रह गई है। आज केवल 25% भारतीय पुरुष ही सामान्य वीर्य मानकों पर खरे उतरते हैं।
- शहरों में बढ़ता बांझपन : पुणे और कोलकाता जैसे महानगरों में बांझपन के लगभग 30%–40% मामलों के पीछे पुरुष कारक जिम्मेदार हैं। इसके मुख्य कारण आधुनिक जीवनशैली, मेटाबॉलिक सिंड्रोम और अत्यधिक मानसिक तनाव हैं।
पिताओं की अनदेखी के पीछे के मुख्य कारण
वैज्ञानिक और सामाजिक दोनों ही स्तरों पर पुरुषों को इस विमर्श से दूर रखने के कई कारण रहे हैं :
- आनुवंशिक निष्क्रियता का भ्रम (Genetic Passivity Myth) : लंबे समय तक विज्ञान यह मानता रहा कि पिता केवल डीएनए का एक निष्क्रिय वाहक है। वीज़मैन बैरियर सिद्धांत के कारण यह माना गया कि पिता की जीवनशैली का भ्रूण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हालांकि, अब एपिजेनेटिक्स (Epigenetic) ने इसे गलत साबित कर दिया है।
- मातृ-केंद्रित नीतिगत ढांचा : गर्भावस्था महिला के शरीर में होती है, इसलिए पूरी नीति केवल महिलाओं के इर्द-गिर्द बुनी गई। पुरुष केवल अस्पताल के बाहर बिल भरने वाले या वित्तीय प्रदाता तक सीमित रह गए।
- एपिजेनेटिक अज्ञानता और जागरूकता की कमी : 2026 के शोध बताते हैं कि शुक्राणु में मौजूद microRNAs पिता के पर्यावरण के संदेश वाहक होते हैं। पिता का व्यायाम या धूम्रपान सीधे भ्रूण के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है, लेकिन क्लीनिकल गाइडलाइंस में अभी भी इसे जगह नहीं मिली है।
- सामाजिक कलंक : संतान न होने का पूरा सामाजिक बोझ आज भी महिलाओं पर है। इसके कारण पुरुष न तो जांच कराते हैं और न ही समय पर मदद मांगते हैं।
चुनौतियां और बाधाएं
- सिर्फ नीतियों का अभाव ही समस्या नहीं है, बल्कि व्यावहारिक चुनौतियाँ भी बड़ी हैं। पुरुष बांझपन सार्वजनिक स्वास्थ्य चर्चाओं में अदृश्य है। अस्पताल और क्लिनिक अक्सर केवल महिलाओं के लिए अनुकूल बनाए गए हैं, जहाँ पुरुष खुद को अप्रासंगिक महसूस करते हैं। इसके अलावा, जीवनशैली में बदलाव (जैसे धूम्रपान छोड़ना या वजन घटाना) के लिए 3-6 महीने का धैर्य चाहिए, जबकि पुरुष अक्सर क्विक-फिक्स दवाओं की तलाश में रहते हैं।
आगे की राह
भारत को अब अपनी स्वास्थ्य रणनीति को मातृ-केंद्रित से बदलकर समावेशी बनाना होगा। इसके लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं :
- पितृ प्री-कन्सेप्शन पैकेज : RMNCH+A में पुरुषों की जीवनशैली, आहार और तनाव के लिए विशेष प्रावधान जोड़ने चाहिए।
- अनिवार्य स्क्रीनिंग : विवाह या प्रजनन परामर्श के समय पुरुषों का जीवनशैली जोखिम मूल्यांकन अनिवार्य हो।
- डिजिटल और एआई का उपयोग : एआई-पावर्ड वीर्य विश्लेषण और घरेलू परीक्षण किट को बढ़ावा दिया जाए ताकि गोपनीयता बनी रहे और पुरुष जांच के लिए आगे आएं।
- जमीनी स्तर पर बदलाव : आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जाए कि वे केवल महिलाओं को ही नहीं, बल्कि पिताओं को भी परामर्श दें।
निष्कर्ष
- दशकों से भारतीय पिताओं को प्रजनन स्वास्थ्य की कहानी में केवल एक अदृश्य कड़ी माना गया है। लेकिन विज्ञान कहता है कि पिता का स्वास्थ्य अगली पीढ़ी की मजबूती के लिए एक लो-कॉस्ट, हाई-इम्पैक्ट निवेश है। यदि भारत को अपनी भावी पीढ़ी की जैविक गुणवत्ता सुनिश्चित करनी है, तो उसे पिताओं को केवल प्रदाता के बजाय एक सक्रिय जैविक भागीदार के रूप में स्वीकार करना होगा।