प्रसंग:
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। बड़े शक्तिशाली देशों के बीच टकराव और पड़ोसी चुनौतियों के बीच, भारत के पास वैश्विक नेतृत्व और प्रभाव बढ़ाने के असाधारण अवसर हैं। 2026 के लिए, “छोटी मेजों” यानी छोटे, कारगर और विशिष्ट गठबंधनों में भागीदारी, बड़े मंचों की तुलना में अधिक लाभकारी साबित हो सकती है।
गणतंत्र दिवस और यूरोपीय संघ: प्रतीक से रणनीति तक
- 2026 के गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ के उर्सुला वॉन डेर लेयेन (यूरोपीय आयोग अध्यक्ष) और एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा (यूरोपीय परिषद अध्यक्ष) को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना प्रतिकात्मकता से आगे बढ़कर रणनीतिक जुड़ाव का संकेत है।
- मुख्य लक्ष्य: लंबित भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता को गति देना, जिसमें केवल शुल्क नहीं, बल्कि बाजार पहुंच, डेटा सुरक्षा, प्रतिस्पर्धा और स्थिरता के नियम शामिल हैं।
- लाभ:
- यूरोपीय बाजारों में बेहतर पहुंच
- वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में स्थान
- अमेरिकी व्यापार दबावों से आंशिक सुरक्षा
- चुनौतियाँ: भारतीय कंपनियों के लिए उच्च अनुपालन लागत, और समय सीमा का संकुचित होना।
- अवसर: यूरोप चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है और अमेरिका के साथ अनिश्चितता को नियंत्रित करना चाहता है।
ब्रिक्स: व्यावहारिक नेतृत्व की परीक्षा
- 2026 में ब्रिक्स का स्वरूप विस्तारित होगा, लेकिन लक्ष्य विभिन्न गति और प्राथमिकताओं वाले नए सदस्य देशों के कारण केंद्रित नहीं रहेगा।
- भारत का रोल:
- अध्यक्ष के रूप में भारत न्यू डेवलपमेंट बैंक और अन्य साधनों का उपयोग करके ब्रिक्स के उद्देश्यों को व्यावहारिक कार्यों में बदल सकता है।
- जोखिम प्रबंधन आवश्यक: अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ और पश्चिमी पूंजी पर प्रभाव।
- रणनीति:
- सुधार और कार्रवाई पर जोर
- पश्चिमी विरोध या डॉलर-विरोधी रुख से बचाव
क्वाड: क्षमता को सार्वजनिक हित में बदलना
- क्वाड के क्षेत्र में अभी तक विकास सीमित है।
- भारत का योगदान:
- शिखर सम्मेलन की मेजबानी: राजनीतिक महत्व और अपेक्षाएँ बढ़ाना
- साझा क्षमताएँ: समुद्री जागरूकता, लचीले बंदरगाह और आपातकालीन मदद (जैसे ऑपरेशन सागर बंधु)
- लाभ:
- हिंद महासागर के देशों के लिए निःस्वार्थ मदद
- अमेरिका के सहयोग और व्यापार विवादों का संतुलन
बड़े मंचों की सीमाएँ
- संयुक्त राष्ट्र और जी20:
- राजनीतिक मतभेद और एजेंडा का संकुचन वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकता है।
- प्रभावी परिणाम अब छोटे और विशिष्ट गठबंधनों से मिलने की संभावना अधिक है।
2026 के अवसरों का सार
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क्षेत्र
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भारत की भूमिका
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रणनीतिक लाभ
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यूरोप
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मानक निर्धारण, व्यापार समझौते
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वैश्विक मूल्य श्रृंखला में स्थान, अमेरिका से संतुलन
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ब्रिक्स
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व्यावहारिक कार्यान्वयन, विकास वित्त
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वैश्विक दक्षिण का विश्वास, बैंकिंग और निवेश साधन
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क्वाड
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साझा सार्वजनिक वस्तुएँ
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हिंद महासागर स्थिरता, आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता
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भारत का विकल्प: खंडित विश्व में रणनीति
- एआई इम्पैक्ट समिट 2026: सरकार, कंपनियाँ और शोधकर्ता एक मंच पर
- नई प्लेटफॉर्म्स: पैक्स सिलिका (AI और सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला)
- रणनीति:
- चुनिंदा मंचों पर ध्यान केंद्रित करना
- छोटे, कारगर गठबंधनों से वास्तविक प्रभाव प्राप्त करना
निष्कर्ष:
- 2026 का वैश्विक परिदृश्य भारत के लिए केवल भागीदारी का नहीं, बल्कि नेतृत्व के अवसरों का वर्ष है। आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़े मंच-जैसे संयुक्त राष्ट्र, जी-20 या अन्य बहुपक्षीय संस्थान-अब भी वैधता और संवाद के लिए आवश्यक हैं, लेकिन निर्णय लेने और ठोस परिणाम देने की उनकी क्षमता सीमित होती जा रही है।
- बड़े देशों के आपसी मतभेद, वीटो राजनीति और वैचारिक ध्रुवीकरण के कारण ये मंच अक्सर न्यूनतम सहमति तक ही सिमट जाते हैं। ऐसे में भारत के लिए वास्तविक शक्ति उन छोटे, लचीले और उद्देश्य-आधारित मंचों में निहित है, जहां कम सदस्य, स्पष्ट लक्ष्य और त्वरित कार्रवाई की क्षमता होती है।
- यूरोपीय संघ के साथ मानक-आधारित साझेदारी, ब्रिक्स के माध्यम से विकास वित्त और व्यावहारिक सहयोग, तथा क्वाड के तहत सार्वजनिक वस्तुओं (जैसे समुद्री सुरक्षा, आपदा राहत, तकनीकी सहयोग) का निर्माण-ये सभी भारत को नियम निर्माता (rule-shaper) बनने का अवसर प्रदान करते हैं, न कि केवल नियमों का पालन करने वाला देश।