New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 14th Oct. 2026, 06:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 23rd Oct. 2026, 11:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 12th Oct. 2026, 5:30PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 14th Oct. 2026, 06:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 23rd Oct. 2026, 11:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 12th Oct. 2026, 5:30PM English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM

आदिवासी महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकार

संदर्भ 

आदिवासी महिलाओं के संपत्ति अधिकारों का मुद्दा आज संवैधानिक संरक्षण, लैंगिक समानता और स्वदेशी पहचान के त्रिकोण पर खड़ा है। जहाँ 'हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956' बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देता है, वहीं अनुसूचित जनजातियों (ST) को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है, जिससे एक गंभीर कानूनी विसंगति उत्पन्न होती है। 

ऐतिहासिक अपवर्जन: कानून की धारा 2(2) 

अधिनियम की धारा 2(2) स्पष्ट करती है कि यह कानून अनुसूचित जनजातियों पर तब तक लागू नहीं होगा, जब तक कि केंद्र सरकार विशेष अधिसूचना जारी न करे।

  • उद्देश्य: इस अपवर्जन का मूल लक्ष्य आदिवासियों की विशिष्ट सामाजिक परंपराओं और सामुदायिक विरासत प्रणालियों को बाहरी हस्तक्षेप से बचाना था।
  • परिणाम: इसके कारण आदिवासी महिलाएँ आज भी उन पारंपरिक 'प्रथागत कानूनों' (Customary Laws) पर निर्भर हैं, जो अक्सर पितृसत्तात्मक हैं और उन्हें संपत्ति के समान अधिकारों से वंचित करते हैं। 

न्यायिक दृष्टिकोण और हिंदूकरणका विवाद 

  • 2025 से पहले, कई न्यायालयों ने एक बीच का रास्ता निकालने का प्रयास किया। यदि कोई आदिवासी महिला हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करती पाई गई, तो उसे "हिंदू" मानकर उत्तराधिकार का लाभ दिया गया। 
  • चुनौती: इस दृष्टिकोण ने आदिवासी महिलाओं पर दोहरा दबाव बनाया। वस्तुतः या तो वे अपनी सांस्कृतिक पहचान छोड़ें ("हिंदूकरण") या अपने कानूनी अधिकारों से समझौता करें। यह दृष्टिकोण संवैधानिक सुरक्षा के उस विचार के विरुद्ध था जो स्वदेशी समुदायों को अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने की गारंटी देता है। 

नवांग बनाम बहादुर (2025): सर्वोच्च न्यायालय का निर्णायक मोड़ 

सर्वोच्च न्यायालय ने Nawang v. Bahadur मामले में ऐतिहासिक स्पष्टता प्रदान की। न्यायालय ने हिंदूकरण के आधार पर अधिकार देने के पिछले फैसलों को पलटते हुए दो मुख्य सिद्धांत तय किए: 

  • विधायी सर्वोच्चता: अनुसूचित जनजातियों पर कानून लागू करने का अधिकार केवल संसद के पास है, न्यायपालिका के पास नहीं।
  • प्रथागत कानून की प्रधानता: जब तक संसद संशोधन नहीं करती, आदिवासी समुदायों में उत्तराधिकार केवल उनके पारंपरिक नियमों से ही संचालित होगा। 

संवैधानिक दुविधा: समानता बनाम परंपरा 

  • अनुच्छेद 14 (समानता): क्या परंपरा के नाम पर महिलाओं को पैतृक संपत्ति से वंचित करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है?
  • सांस्कृतिक संरक्षण: क्या बाहरी कानून थोपना आदिवासियों की स्वायत्तता और उनकी विशिष्ट पहचान को नष्ट कर देगा? 

भविष्य की राह: विधायी सुधार की आवश्यकता 

न्यायालय के स्पष्ट रुख के बाद अब गेंद संसद के पाले में है। आदिवासी महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए निम्नलिखित विकल्प विचारणीय हैं:

  • पृथक संहिताकरण: आदिवासी उत्तराधिकार के लिए एक विशेष अधिनियम बनाया जाए जो उनकी संस्कृति का सम्मान करे लेकिन भेदभाव को समाप्त करे।
  • प्रथागत कानूनों में सुधार: जनजातीय परिषदों के साथ मिलकर पारंपरिक कानूनों को आधुनिक और लैंगिक रूप से न्यायसंगत बनाया जाए।
  • संवैधानिक संतुलन: एक ऐसा ढांचा तैयार करना जहाँ पहचान की रक्षा, बहिष्कार का माध्यम न बने। 

निष्कर्ष 

नवांग बनाम बहादुर का निर्णय कानूनी अस्पष्टता को तो समाप्त करता है, लेकिन सामाजिक न्याय का प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है। वास्तविक प्रगति तभी होगी जब संसद एक ऐसा हस्तक्षेप करे जो विविधता का सम्मान भी करे और समानता की गारंटी भी दे। आदिवासी महिलाओं को अपनी विरासत (Identity) और अपने अधिकार (Rights) के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। 

« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR