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अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और भारत

संदर्भ 

पेरिस में आयोजित हालिया अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत की पूर्ण सदस्यता के अनुरोध पर हुई प्रगति को वैश्विक ऊर्जा कूटनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। वर्तमान में भारत एक 'एसोसिएट सदस्य' है, लेकिन पूर्ण सदस्यता की राह में कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ और ऐतिहासिक अवसर दोनों मौजूद हैं। 

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का उद्भव और विकास 

  • 1974 के अरब तेल प्रतिबंध (योम किप्पुर युद्ध के दौरान) से उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा संकट की प्रतिक्रिया के रूप में आईईए की स्थापना की गई थी। इसका प्राथमिक उद्देश्य औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं के लिए तेल आपूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। 
  • संस्थापक आधार: इसकी स्थापना OECD के 17 सदस्य देशों द्वारा की गई थी।
  • आपातकालीन तंत्र: सदस्य देशों के लिए रणनीतिक तेल भंडार बनाए रखना अनिवार्य है। 1991 के खाड़ी युद्ध और 2022 के यूक्रेन संकट के समय इस तंत्र ने वैश्विक बाजार को स्थिरता प्रदान की। 

सदस्यता का ढांचा और 'ओईसीडी' (OECD) की बाधा 

IEA की पूर्ण सदस्यता प्राप्त करने के लिए वर्तमान में OECD (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) का सदस्य होना एक अनिवार्य कानूनी शर्त है। 

  • वर्तमान स्थिति: एजेंसी के 32 पूर्ण सदस्य हैं (हाल ही में कोलंबिया 33वाँ सदस्य बनने की प्रक्रिया में है)।
  • एसोसिएट सदस्य: 2015 में गैर-OECD देशों को जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। भारत 2017 में इसका हिस्सा बना। वर्तमान में भारत सहित 13 देश इस श्रेणी में हैं, जो नीतिगत चर्चाओं में तो शामिल होते हैं, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं है। 

बदलती वैश्विक ऊर्जा गतिशीलता 

  • वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की भूमिका और प्रभाव समय के साथ काफी बदला है। सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो 1974 में अपनी स्थापना के समय IEA के पूर्ण सदस्य देश दुनिया की 60% से अधिक ऊर्जा मांग का प्रतिनिधित्व करते थे। हालाँकि, जैसे-जैसे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का प्रभाव बढ़ा, एक दशक पहले तक पूर्ण सदस्यों की यह हिस्सेदारी घटकर लगभग 40% रह गई थी।
  • लेकिन वर्तमान में, भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे एसोसिएट सदस्यों को शामिल करने के बाद, पूरा IEA परिवार अब लगभग 80% वैश्विक ऊर्जा मांग का प्रतिनिधित्व करता है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वैश्विक ऊर्जा मांग का केंद्र अब पश्चिम से पूर्व की ओर स्थानांतरित हो चुका है और भारत जैसे देशों के बिना इस संस्था की वैश्विक प्रासंगिकता अधूरी है। 

भारत के लिए पूर्ण सदस्यता का महत्व 

भारत ने अक्टूबर 2023 में आधिकारिक तौर पर पूर्ण सदस्यता के लिए आवेदन किया। इसके पीछे के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी: मतदान अधिकार मिलने से भारत वैश्विक ऊर्जा नीतियों और मानकों के निर्धारण में सक्रिय भूमिका निभा सकेगा।
  • डेटा और ज्ञान का भंडार: IEA के व्यापक ऊर्जा डेटाबेस और तकनीकी विशेषज्ञता तक सीधी पहुँच भारत के ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) को गति देगी।
  • ऊर्जा सुरक्षा: संकट के समय सामूहिक आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र का हिस्सा बनना। 

कानूनी चुनौतियाँ और समाधान 

चूंकि भारत OECD में शामिल होने का इच्छुक नहीं है, इसलिए उसकी सदस्यता के लिए दो रास्ते संभव हैं:

  • IEA चार्टर में संशोधन: संस्थापक कानूनी ढांचे को बदलना।
  • विशेष अपवाद: भारत जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा उपभोक्ता के लिए नियमों में ढील देना। वस्तुतः संकेत मिल रहे हैं कि ब्राज़ील की समान इच्छा के कारण IEA अब कानूनी संशोधनों पर गंभीरता से विचार कर रहा है।

भारत-IEA सहयोग के नए आयाम 

  • IEA ने भारत की LiFE (Lifestyle for Environment) पहल की सराहना की है। एजेंसी की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय जीवनशैली से प्रेरित बदलावों को वैश्विक स्तर पर अपनाकर 2030 तक 2 अरब टन कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। 

निष्कर्ष 

अगले तीन दशकों में ऊर्जा मांग में सर्वाधिक वृद्धि भारत में होने वाली है। ऐसे में, भारत के बिना IEA की वैश्विक प्रासंगिकता अधूरी है। यह सदस्यता न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत के नेतृत्व को भी प्रमाणित करेगी। 

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