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बीमा वितरण पर आईआरडीएआई का नया प्रस्ताव

संदर्भ  

भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण यानी आईआरडीएआई ने बीमा वितरण व्यवस्था में बदलाव के लिए ‘रीकैलिब्रेटिंग इकोनॉमिक्स ऑफ इंश्योरेंस डिस्ट्रीब्यूशन’ नाम से परामर्श पत्र जारी किया है। इसमें बीमा कंपनियों के वितरण ढांचे, खर्च, कमीशन और ग्राहकों की सुरक्षा से जुड़े कई प्रस्ताव रखे गए हैं। नियामक का उद्देश्य गलत तरीके से पॉलिसी बेचने यानी मिस-सेलिंग को कम करना और ग्राहकों को प्रभावित करने वाले डार्क पैटर्न पर रोक लगाना है। प्रस्ताव पर 25 अक्टूबर तक सुझाव मांगे गए हैं।

प्रस्ताव के बाद बीमा शेयरों में गिरावट 

  • आईआरडीएआई के प्रस्ताव का असर शेयर बाजार में भी दिखाई दिया। विश्लेषकों के अनुसार, प्रस्ताव ग्राहकों के हित में हो सकता है, लेकिन बीमा वितरकों के मुनाफे पर दबाव डाल सकता है। 
  • पीबी फिनटेक, जो पॉलिसीबाजार की मूल कंपनी है, के शेयर में 24 सितंबर को करीब 36 प्रतिशत की गिरावट आई और अगले दिन इसमें लगभग 3 प्रतिशत की और गिरावट दर्ज की गई। टर्टलमिंट के शेयर में लगातार दो दिनों में करीब 20-20 प्रतिशत की गिरावट आई। कई बैंकों के शेयर भी दबाव में रहे।  

कमीशन पर लगेगी सीमा 

  • आईआरडीएआई ने जीवन बीमा में पहले साल मिलने वाले कमीशन को सीमित करने का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत वितरकों के लिए कमीशन की सीमा प्रीमियम की 20 प्रतिशत और एजेंटों के लिए 25 प्रतिशत रखने का प्रस्ताव है। यह मौजूदा कमीशन की तुलना में काफी कम है। गौरतलब है कि आईआरडीएआई ने 2023 में ऐसी कमीशन सीमाओं को समाप्त कर दिया था।

आईआरडीएआई (IRDAI) के बारे में  

  • भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) एक सरकारी संस्था है जिसे भारत में बीमा उद्योग को नियमित करने और इसका विकास करने के लिए बनाया गया है।
  • आईआरडीएआई (IRDAI) की स्थापना 1999 में एक संसदीय अधिनियम के तहत हुई थी। 
  • आईआरडीएआई (IRDAI) का मुख्य लक्ष्य बीमाधारकों के हितों की रक्षा करना और बीमा उद्योग को मजबूत बनाना है. 

प्रमुख उद्देश्य: 

  • बीमा उद्योग का तेज़ी से विकास करना
  • बीमा बाज़ार की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करना
  • वास्तविक दावों का जल्द से जल्द निपटान करना
  • प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र बनाना  
  • नियामक का उद्देश्य बीमा कंपनियों और वितरकों के आर्थिक प्रोत्साहनों को इस तरह व्यवस्थित करना है कि केवल नई पॉलिसी बेचने के बजाय ग्राहक के दीर्घकालिक हित को भी महत्व मिले।  

बीमा कंपनियों के खर्च पर भी नियंत्रण 

  • प्रस्ताव में एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट यानी ईओएम को भी कम करने की बात कही गई है। इसमें बीमा कंपनियों के प्रशासनिक और वितरण संबंधी खर्च शामिल होते हैं।
  • प्रस्ताव के अनुसार, पांच वर्षों में जीवन बीमा कंपनियों के ईओएम को सकल प्रत्यक्ष प्रीमियम के 12.5 प्रतिशत और सामान्य बीमा कंपनियों के लिए 20 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य है। 
  • केयरएज रेटिंग्स के अनुसार, फिलहाल 22 में से 20 जीवन बीमा कंपनियां और 31 में से 28 सामान्य बीमा कंपनियां प्रस्तावित सीमा से अधिक खर्च कर रही हैं। 

कमीशन पर आईआरडीएआई की चिंता क्यों? 

  • आईआरडीएआई का कहना है कि बीमा बिक्री में कीमत और उत्पाद की गुणवत्ता के साथ कमीशन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। 
  • वर्ष 2022-23 से 2024-25 के बीच सामान्य बीमा में ब्रोकरों के माध्यम से जुटाए गए प्रीमियम में 37 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि कमीशन 173 प्रतिशत बढ़ गया। इसी अवधि में जीवन बीमा में कॉरपोरेट एजेंटों के माध्यम से प्राप्त प्रीमियम 28 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन कमीशन में 125 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
  • नियामक के अनुसार, कमीशन पर अत्यधिक निर्भरता और पारदर्शिता की कमी से प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है और ग्राहकों को मिलने वाला मूल्य कम हो सकता है। 

पॉलिसीबाजार और बैंकों पर असर 

  • प्रस्तावित बदलाव का असर ऑनलाइन बीमा एग्रीगेटर कंपनियों पर भी पड़ सकता है। पॉलिसीबाजार और टर्टलमिंट जैसी कंपनियां नए ग्राहकों को जोड़ने के लिए काफी खर्च करती हैं और शुरुआती कमीशन पर निर्भर रहती हैं। इनके पास एलआईसी जैसी व्यापक एजेंट नेटवर्क व्यवस्था भी नहीं है। 
  • बैंकों पर भी असर पड़ सकता है। बीमा वितरण से बैंकों की आय 2022-23 में उनके कर-पूर्व लाभ की 3.5 प्रतिशत थी, जो 2025-26 में बढ़कर 5.1 प्रतिशत हो गई। कई बीमा कंपनियों के साथ समझौते रखने वाले बैंक अधिक प्रभावित हो सकते हैं। 
  • हालांकि, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एसबीआई और कोटक महिंद्रा बैंक जैसे बैंक, जिनकी अपनी बीमा सहायक कंपनियां हैं, कुछ हद तक सुरक्षित रह सकते हैं।

क्या सिर्फ कमीशन घटाना पर्याप्त है? 

  • विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल कमीशन की नहीं है। पर्सिस्टेंसी, यानी पॉलिसीधारक द्वारा लंबे समय तक प्रीमियम का भुगतान जारी रखना, भी महत्वपूर्ण है। 
  • विशेषज्ञों के अनुसार, नई पॉलिसी बेचने पर वितरक को मिलने वाला कमीशन पुरानी पॉलिसी बनाए रखने की तुलना में कई गुना अधिक हो सकता है। इसलिए पहले साल के कमीशन का कुछ हिस्सा बाद के वर्षों के लिए टालने, उसे 13वें और 25वें महीने तक पॉलिसी जारी रहने से जोड़ने तथा शुरुआती अवधि में पॉलिसी बंद होने पर क्लॉबैक की व्यवस्था करने जैसे सुझाव दिए जा रहे हैं।  
  • आईआरडीएआई के आंकड़ों के मुताबिक, ऑनलाइन बेची गई करीब 71 प्रतिशत पॉलिसियां पांच साल बाद भी सक्रिय रहती हैं, जबकि कॉरपोरेट एजेंटों के माध्यम से बेची गई पॉलिसियों में यह आंकड़ा करीब 43 प्रतिशत है। 

छोटे शहरों में बीमा का विस्तार  

  • कमीशन सीमा का एक संभावित असर छोटे शहरों और कम आय वाले ग्राहकों पर भी पड़ सकता है। यदि कम प्रीमियम वाली पॉलिसियां वितरकों के लिए कम आकर्षक हो जाती हैं, तो इनके वितरण में कमी आ सकती है। 
  • भारत दुनिया का 10वां सबसे बड़ा बीमा बाजार है, लेकिन 2024-25 में देश की बीमा पैठ केवल 3.7 प्रतिशत थी। ऐसे में नियामक के सामने ग्राहक सुरक्षा के साथ-साथ बीमा की पहुंच बढ़ाने की चुनौती भी है। 

निष्कर्ष 

  • आईआरडीएआई का प्रस्ताव बीमा क्षेत्र में ग्राहक हित और वितरकों के आर्थिक प्रोत्साहनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है। कमीशन पर नियंत्रण से मिस-सेलिंग कम करने में मदद मिल सकती है, लेकिन केवल कमीशन घटाना पर्याप्त नहीं होगा।
  • पॉलिसी की पर्सिस्टेंसी, कम प्रीमियम वाले उत्पादों की उपलब्धता, छोटे शहरों में बीमा की पहुंच और वितरकों के प्रोत्साहन जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देना जरूरी होगा। अंतिम नियम बनाते समय चुनौती यह होगी कि ग्राहक संरक्षण मजबूत हो, लेकिन बीमा की पहुंच और वितरण नेटवर्क कमजोर न पड़े।  
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