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झारखंड की पहली टाइगर सफारी

(प्रारंभिक परीक्षा : पर्यावरण एवं परिस्थितिकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ

झारखंड सरकार पलामू टाइगर रिजर्व (PTR) के बारवाडीह वेस्टर्न फॉरेस्ट रेंज के फ्रिंज क्षेत्र (सीमांत क्षेत्र) में राज्य की पहली टाइगर सफारी स्थापित करने की घोषणा की है। 

प्रस्तावित टाइगर सफारी के बारे में 

  • क्या हैं टाइगर सफारी : इसकी परिकल्पना सर्वप्रथम राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा वर्ष 2012 में जारी पर्यटन संबंधी दिशा-निर्देशों में की गई थी, जिसमें बाघ अभ्यारण्यों के बफर क्षेत्रों में ऐसे प्रतिष्ठानों के लिए प्रावधान किया गया था, जहाँ बाघों को देखने के लिए प्रमुख बाघ पर्यावास में पर्यटकों की भारी आमद होती है।
    • टाइगर सफारी को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत परिभाषित नहीं किया गया है। 
  • क्षेत्रफल : यह सफारी लगभग 150 हेक्टेयर वन भूमि पर बनाई जाएगी।
  • जानवरों का चयन : सफारी में जंगली बाघों को नहीं रखा जाएगा। इसमें केवल बचाए गए, घायल, संघर्ष-प्रवण (Conflict-prone) या अनाथ बाघ शामिल होंगे, जो भारत के टाइगर रिजर्व्स या चिड़ियाघरों से लाए जाएंगे।
    • यह सुनिश्चित किया जाएगा कि चिड़ियाघरों से लाए गए बाघों का चयन और उनका देखभाल केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) द्वारा तय मानकों के अनुसार हो।
  • उद्देश्य : 
    • पर्यटन को बढ़ावा : यह सफारी झारखंड में पर्यटन को बढ़ाने और प्रकृति-आधारित मनोरंजन प्रदान करने का एक माध्यम होगा।
    • संरक्षण एवं शिक्षा : यह एक संरक्षण एवं शिक्षा केंद्र के रूप में कार्य करेगा, जहाँ लोग वन्यजीवों के बारे में अनुभवात्मक शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे।
    • रोजगार सृजन : इस परियोजना से कम-से-कम 200 स्थानीय लोगों के लिए प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित होंगे, जैसे- गाइड, सहायक कर्मचारी एवं रखरखाव कर्मचारी।
    • वर्तमान स्थिति : परियोजना अभी वैचारिक चरण में है।
    • निर्माण अवधि : मंजूरी के बाद इस सफारी के निर्माण में लगभग 18 महीने का समय लगेगा।
  • टाइगर सफारी के संबंध में NTCA एवं CZA के दिशानिर्देश 
    • NTCA के 2016 के दिशानिर्देशों के अनुसार, टाइगर सफारी में केवल घायल, संघर्ष-प्रवण या अनाथ बाघों को रखा जा सकता है और चिड़ियाघरों से बाघ लाने की अनुमति नहीं थी।
    • हालांकि, वर्ष 2019 में NTCA के संशोधन के तहत चिड़ियाघरों से बाघ लाने की अनुमति दी गई, बशर्ते CZA उनकी पहचान व कल्याण सुनिश्चित करे।
    • सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2024 के निर्देश के अनुसार, सफारी को कोर एवं बफर क्षेत्रों से बाहर बनाया जाएगा और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि यह प्राकृतिक आवास को नुकसान न पहुंचाए।
  • चुनौतियाँ और चिंताएँ : 
    • स्थानीय समुदायों का विस्थापन : विशेषज्ञों ने इस परियोजना से स्थानीय समुदायों के विस्थापन की आशंका जताई है।
    • प्राकृतिक आवास पर प्रभाव : हालाँकि यह फ्रिंज क्षेत्र में बन रही है, फिर भी वन्यजीवों व उनके आवास पर संभावित प्रभाव को लेकर सावधानी बरतनी होगी।
    • रोग संचरण का जोखिम : चिड़ियाघरों से लाए गए बाघों से जंगली बाघों या अन्य वन्यजीवों में रोग संचरण का खतरा हो सकता है।

पलामू टाइगर रिजर्व के बारे में

  • परिचय : पलामू टाइगर रिजर्व देश के पहले उन 9 टाइगर रिज़र्व में से एक है जिसे प्रोजेक्ट टाइगर (1973) के प्रथम चरण में अधिसूचित किया गया था। 
    • यह झारखंड का एकमात्र बाघ अभयारण्य है तथा बेतला नेशनल पार्क का एक हिस्सा है। 
  • अवस्थिति एवं विस्तार : छोटानागपुर पठार पर लातेहार एवं गढ़वा ज़िलों में विस्तारित।
  • क्षेत्रफल : 1129.93 वर्ग किमी.
  • वन प्रकार : मुख्यत: साल वन, मिश्रित पर्णपाती वन एवं बांस 
  • प्रमुख नदियां : कोयल, बुरहा एवं औरंगा का जलग्रहण क्षेत्र 
  • वन्यजीव : मुख्य प्रजातियाँ में बाघ, हाथी, तेंदुआ, ग्रे वुल्फ, गौर, स्लॉथ बियर, चार सींग वाले मृग, भारतीय रतेल, भारतीय ऊदबिलाव एवं भारतीय पैंगोलिन शामिल 
  • वनस्पतियाँ : यहाँ पौधों की कुल 970 प्रजातियों, घास की 17 प्रजातियों और औषधीय पौधों की 56 प्रजातियों की पहचान

क्या आप जानते हैं?

पलामू टाइगर रिजर्व दुनिया का पहला अभयारण्य है जिसमें वर्ष 1932 में पलामू के तत्कालीन डी.एफ.ओ. जे.डब्ल्यू. निकोलसन की देखरेख में पगमार्क गणना के रूप में बाघों की गणना की गई थी।

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