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कोंडा रेड्डी जनजाति

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में आंध्र प्रदेश के काकीनाडा जिले के प्रथिपाडु मंडल स्थित सरलंका गाँव में शॉर्ट सर्किट से लगी भीषण आग में कोंडा रेड्डी जनजाति के कम से कम 38 फूस के मकान जलकर नष्ट हो गए। 
  • इस घटना ने एक बार फिर विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) की सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलता को उजागर किया है।

कोंडा रेड्डी जनजाति का परिचय:

  • कोंडा रेड्डी जनजाति भारत के विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) में शामिल है। 
  • यह समुदाय मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी तथा खम्मम जिलों के पहाड़ी और वन क्षेत्रों में, गोदावरी नदी के दोनों किनारों पर निवास करता है।

भाषा और धर्म:

  • कोंडा रेड्डी जनजाति की मातृभाषा तेलुगु है, जो अपने शुद्ध रूप और विशिष्ट उच्चारण के लिए जानी जाती है। 
  • धार्मिक रूप से यह समुदाय लोक हिंदू धर्म का पालन करता है, जिसमें स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा प्रमुख है। इनके मुख्य त्योहार उगादि, अक्षदे और दशहरा हैं।

परिवार और विवाह व्यवस्था:

  • इनका सामाजिक ढाँचा पितृसत्तात्मक और पितृस्थानिक है। सामान्यतः एकविवाह प्रचलित है, हालांकि कुछ स्थानों पर बहुविवाह भी देखने को मिलता है। 
  • विवाह के सामाजिक रूप से स्वीकृत तरीकों में बातचीत, प्रेम, भागकर विवाह, सेवा विवाह, अपहरण और अदला-बदली विवाह शामिल हैं।

राजनीतिक और सामाजिक संगठन:

  • कोंडा रेड्डी समाज में ‘कुल पंचायत’ नामक पारंपरिक संस्था सामाजिक नियंत्रण का कार्य करती है। 
  • प्रत्येक गाँव का एक मुखिया होता है जिसे ‘पेड्डा कापू’ कहा जाता है। 
  • यह पद वंशानुगत होता है और वही ग्राम देवताओं का पुजारी भी होता है।

आजीविका के साधन:

  • यह जनजाति मुख्य रूप से स्थानांतरित (पोडु) खेती पर निर्भर है और जंगल से प्राप्त संसाधनों पर इनकी आजीविका टिकी होती है। 
  • वे कंद-मूल, जड़ें, पत्तियाँ और जंगली फल खाते हैं। साथ ही इमली, अड्डा पत्ते, मायरोबोलन, झाड़ू जैसे गैर-लकड़ी वन उत्पाद एकत्र कर बेचते हैं।
  • इनकी प्रमुख फसल ज्वार है, जो इनका मुख्य भोजन भी है। इसके अतिरिक्त काजू, नाइजर, मिर्च और कपास जैसी व्यावसायिक फसलों की खेती भी करते हैं। 
  • गाय इनके जीवन और अर्थव्यवस्था का केंद्र है।

आवास शैली

  • कोंडा रेड्डी जनजाति की आवासीय संरचना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 
  • ये लोग गोलाकार मिट्टी की दीवारों और फूस की छतों वाले घर बनाते हैं, जो गुजरात के कच्छ क्षेत्र की ‘भुंगा’ वास्तुकला से मिलती-जुलती है।
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