New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 14th Oct. 2026, 06:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 22nd Sept. 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 26th Sept. 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 14th Oct. 2026, 06:00 PM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 22nd Sept. 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 26th Sept. 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM

जल्लीकट्टू पर मद्रास उच्च न्यायालय का निर्देश

(प्रारंभिक परीक्षा : राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाओं से संबंधित प्रश्न)
(मुख्य परीक्षा : सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 - भारतीय कला एवं संस्कृति पर आधारित; सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 - संवैधानिक प्रावधान से संबंधित प्रश्न)

संदर्भ 

हाल ही में, मद्रास उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि जल्लीकट्टू में केवल देशी नस्ल के बैलों को भाग लेने की अनुमति दी जाए।

न्यायालय का निर्देश 

  • उच्च न्यायालय ने यह आदेश, एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा दायर रिट याचिका के संदर्भ में दिया।
  • याचिका में जल्लीकट्टू, मंजुविराट्टू, ऊरमाडु, वडामडु, वदमंजीविराट्टू और एरुदुथु विदुथल जैसे आयोजनों में केवल देशी सांडों की भागीदारी पर ज़ोर दिया था।
  • याचिकाकर्ताओं द्वारा, देशी प्रजातियों के नुकसान पर व्यक्त की गई चिंता से सहमत होते हुए, न्यायाधीशों ने सरकार को किसानों या बैल मालिकों को सब्सिडी या प्रोत्साहन प्रदान करके, देशी नस्लों को तैयार करने के लिये प्रोत्साहित करने का निर्देश दिया।  
  • न्यायालय ने आदेश दिया कि जल्लीकट्टू में भाग लेने से पहले पशु चिकित्सकों को बैलों को प्रमाणित करना होगा।
  • न्यायालय ने विदेशी नस्लों जैसे बी.ओ.एस. वृषभ या क्रॉस / हाइब्रिड नस्ल के बैल (Bos वृषभ x Bos Indicus) के प्रयोग पर प्रतिबंध का निर्देश दिया।
  • इसके अलावा, न्यायालय ने पशु चिकित्सकों को न्यायालय की अवमानना की करने पर भी चेतावनी दी।
  • इसके तहत कहा गया कि यदि किसी ‘आयातित या क्रॉस या हाइब्रिड नस्ल’ को ‘मूल नस्ल’ के रूप में प्रमाणित किया जाता है और यदि ऐसी अवैधता न्यायालय के संज्ञान में लाई जाती है तो पशु चिकित्सकों पर विभागीय कार्यवाही की जाएगी।
    • पीठ ने यह भी आदेश दिया कि सरकार को जहाँ तक संभव हो, जानवरों के कृत्रिम गर्भाधान से बचना चाहिये, क्योंकि यह जानवरों को उनके संभोग के अधिकारों से वंचित करेगा।
    • पीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने जल्लीकट्टू के आयोजन के लिये वर्ष 2017 में एक कानून बनाया था।
    • इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य ‘पुलिकुलम, उम्बालाचेरी, नट्टूमाडु, मलाइमाडु और कांगेयम’ जैसी देशी नस्लों को संरक्षित करना था।
    • मवेशियों की पश्चिमी नस्लों (बॉस टॉरस) और क्रॉस नस्लों के मवेशियों में या तो कूबड़ नहीं होते हैं या छोटे होते हैं, जो शुद्ध देशी नस्ल के बैल की तुलना में उनके सामने के पैरों से जुड़े नहीं होते हैं।
    • बड़े कूबड़ की अनुपस्थिति में जल्लीकट्टू का खेल खेलना असंभव हो जाता है।
    • जिसमें पुरुषों से अपेक्षा की जाती है कि वे कूबड़ को पकड़कर बैलों को पकड़ें/आलिंगन करें और कम से कम 15 मीटर की दूरी या 30 सेकंड दौड़ें या बैलों की तीन छलांगें लगाएं।

    जल्लीकट्टू 

    • ‘जल्लीकट्टू बेल्ट’ के नाम से मशहूर ‘मदुरै, तिरुचिरापल्ली, थेनी, पुदुक्कोट्टई और डिंडीगुल ज़िलों’ में सांडों को वश में करने का खेल लोकप्रिय है।
    • इसे जनवरी के दूसरे सप्ताह में ‘तमिल फसल उत्सव पोंगल’ के दौरान मनाया जाता है।
    • जल्लीकट्टू, तमिल शब्द ‘सल्ली कासु’ (सिक्के और कट्टू) से आया है, जिसका अर्थ है- पुरस्कार राशि के रूप में बैल के सींगों से बंधा कपड़ा।
    • जल्लीकट्टू एक पुरानी परंपरा है। मोहनजोदड़ो में खोजी गई मुहर में बैल को वश में करने का एक प्राचीन संदर्भ मिलता है, जो 2,500 ईसा पूर्व और 1,800 ईसा पूर्व के बीच की है।
    • इस खेल को ‘एरुथज़ुवल’ या ‘बैल को गले लगाना’ भी कहा जाता था।

    तमिल संस्कृति में जल्लीकट्टू का महत्त्व 

    • ऐसे समय में जब ‘पशु प्रजनन’ अक्सर एक कृत्रिम प्रक्रिया होती है, जल्लीकट्टू को किसान समुदाय द्वारा अपने शुद्ध नस्ल के देशी बैलों को संरक्षित करने का एक पारंपरिक तरीका माना जाता है।
    • संरक्षणवादियों और किसानों का तर्क है कि जल्लीकट्टू उन नर जानवरों की रक्षा करने का एक तरीका है, जिनका उपयोग जुताई में न होने पर केवल माँग के लिये किया जाता है।
    • जल्लीकट्टू के लिये उपयोग की जाने वाली लोकप्रिय देशी मवेशियों की नस्लों में ‘कंगयम, पुलिकुलम, उम्बालाचेरी, बरुगुर और मलाइमाडू’ शामिल हैं।

    जल्लीकट्टू की क़ानूनी लड़ाई

    • भारत में 1990 के दशक की शुरुआत में पशु अधिकारों के मुद्दों को लेकर कानूनी लड़ाई प्रारंभ हुई।
    • वर्ष 1991 में पर्यावरण मंत्रालय की एक अधिसूचना द्वारा भालू, बंदर, बाघ, तेंदुआ और कुत्तों के प्रशिक्षण और प्रदर्शनी पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
    • इसे भारतीय सर्कस संगठन ने दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
    • वर्ष 1998 में, कुत्तों को इस अधिसूचना से बाहर रखा गया था।
      • जल्लीकट्टू सर्वप्रथम वर्ष 2007 में कानूनी जाँच के दायरे में आया, जब ‘भारतीय पशु कल्याण बोर्ड’ और ‘पशु अधिकार समूह’ (पेटा) ने जल्लीकट्टू के साथ-साथ बैलगाड़ी दौड़ के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की।
      • हालाँकि, तमिलनाडु सरकार ने वर्ष 2009 में एक कानून पारित करके इस प्रतिबंध को हटा दिया।
      • वर्ष 2014 में उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2011 की अधिसूचना का हवाला देते हुए बैलों को वश में करने के खेल पर प्रतिबंध लगा दिया।
      • वर्ष 2018 में, उच्चतम न्यायालय ने जल्लीकट्टू मामले को एक संविधान पीठ के पास भेज दिया, जहाँ यह मामला अभी लंबित है।

      निष्कर्ष 

      गौरतलब है कि एक ओर जल्लीकट्टू तमिलनाडु की संस्कृति का प्रतीक होने के साथ-साथ वहाँ के लोगों का सांस्कृतिक अधिकार भी है। यद्यपि  न्यायालय एवं सरकारों द्वारा पशुओं के अधिकारों को भी ध्यान में रखा जाना आवश्यक है।

      « »
      • SUN
      • MON
      • TUE
      • WED
      • THU
      • FRI
      • SAT
      Have any Query?

      Our support team will be happy to assist you!

      OR