जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषदों (District Development Councils-DDCs) की स्थापना के बाद से स्थानीय शासन व्यवस्था को लेकर व्यापक राजनीतिक, प्रशासनिक और संवैधानिक चर्चा होती रही है। इन परिषदों का गठन वर्ष 2021 में किया गया था और इनका कार्यकाल 24 फरवरी 2026 को समाप्त हो चुका है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद नए चुनाव न होने तथा अन्य स्थानीय निकायों की सीमित सक्रियता ने इस व्यवस्था की उपयोगिता और प्रभावशीलता पर नए सिरे से बहस को जन्म दिया है।
कुछ लोगों का मानना है कि डीडीसी स्थानीय स्तर पर जनता की भागीदारी बढ़ाने का माध्यम हैं, जबकि दूसरे पक्ष का तर्क है कि इस व्यवस्था ने संविधान द्वारा परिकल्पित विकेंद्रीकरण की भावना को अपेक्षित रूप से मजबूत नहीं किया है।
73वें और 74वें संविधान संशोधन का महत्व
अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधानों को पूर्ण रूप से लागू किया गया। इसी प्रक्रिया में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के तहत स्थापित स्थानीय स्वशासन व्यवस्था को भी लागू करने पर जोर दिया गया।
इन संशोधनों का उद्देश्य ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोकतांत्रिक संस्थाओं को संवैधानिक आधार देना, समयबद्ध चुनाव सुनिश्चित करना तथा विकास योजनाओं में स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाना है। वस्तुतः इन संशोधनों को भारत में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की आधारशिला माना जाता है।
स्थानीय शासन की संवैधानिक व्यवस्था
भारतीय संविधान स्थानीय प्रशासन के लिए बहु-स्तरीय ढांचा प्रदान करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायत, ब्लॉक विकास परिषद (BDC) और जिला परिषद तीन प्रमुख स्तर हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम स्थानीय प्रशासन का संचालन करते हैं।
इसी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक जिला योजना समिति (District Planning Committee-DPC) है, जिसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 243ZD में किया गया है। इसका कार्य पंचायतों और नगर निकायों द्वारा तैयार विकास योजनाओं का समन्वय कर जिले के लिए एक समग्र विकास योजना तैयार करना है।
डीपीसी स्वयं कोई स्वतंत्र प्रशासनिक संस्था नहीं होती, बल्कि यह स्थानीय निकायों से प्राप्त सुझावों और जन-प्राथमिकताओं को एकीकृत कर योजनाबद्ध विकास को दिशा देती है। इस प्रकार यह नीचे से ऊपर (Bottom-up) की योजना प्रक्रिया को बढ़ावा देती है और स्थानीय लोकतंत्र को सशक्त बनाने का माध्यम बनती है। हालांकि व्यवहार में अधिकांश राज्यों में इसकी भूमिका अपेक्षित स्तर तक प्रभावी नहीं रही है और केवल कुछ राज्यों, जैसे केरल, में यह अपेक्षाकृत सक्रिय दिखाई देती है।
जिला विकास परिषद और जिला योजना समिति में अंतर
जम्मू-कश्मीर में गठित जिला विकास परिषदों और संविधान में वर्णित जिला योजना समितियों के बीच मूलभूत अंतर है। डीडीसी का गठन विधायी प्रक्रिया के बजाय प्रशासनिक आदेश के माध्यम से किया गया था।
सरकार का दृष्टिकोण है कि डीडीसी प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से जनता को जिला स्तर पर प्रतिनिधित्व प्रदान करती हैं। वहीं आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था पहले से मौजूद जिला परिषदों और शहरी स्थानीय निकायों की भूमिका को सीमित करती है।
डीपीसी का कार्य स्थानीय निकायों की योजनाओं का समन्वय करना होता है, जबकि डीडीसी को विकास संबंधी निर्णयों और प्रशासनिक कार्यों में अपेक्षाकृत अधिक भूमिका दी गई है। इसी कारण कुछ विशेषज्ञ इसे संवैधानिक स्थानीय निकायों के समानांतर विकसित की गई व्यवस्था मानते हैं। उनके अनुसार इससे वास्तविक लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के बजाय प्रशासनिक केंद्रीकरण को बढ़ावा मिल सकता है।
प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दे
डीडीसी व्यवस्था पर प्रतिनिधित्व के संदर्भ में भी प्रश्न उठाए जाते हैं। विभिन्न जिलों में सदस्यों की संख्या समान होने के बावजूद उनकी जनसंख्या में बड़ा अंतर है। उदाहरण के लिए, श्रीनगर जैसे अधिक आबादी वाले जिले और अपेक्षाकृत कम जनसंख्या वाले किश्तवाड़ जिले को समान प्रतिनिधित्व मिलने से प्रति व्यक्ति राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित होने की बात कही जाती है।
इस आधार पर कुछ विशेषज्ञों का मत है कि सीटों का निर्धारण जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए, ताकि सभी नागरिकों के मत का राजनीतिक महत्व समान बना रहे।
स्मार्ट सिटी मॉडल से तुलना
कुछ विश्लेषक डीडीसी की तुलना स्मार्ट सिटी परियोजनाओं में प्रयुक्त स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) से करते हैं। उनका तर्क है कि ऐसी संस्थाएँ प्रशासनिक रूप से प्रभावी दिखाई देती हैं, लेकिन कई बार वे निर्वाचित स्थानीय निकायों की भूमिका को सीमित कर देती हैं।
आलोचकों के अनुसार यदि कोई संस्था स्थानीय स्तर पर स्वीकृत विकास योजनाओं को बदलने या निरस्त करने की स्थिति में हो, तो वह स्थानीय शासन की सहयोगी संस्था बनने के बजाय उसका विकल्प बन सकती है। हालांकि इस दृष्टिकोण से सभी विशेषज्ञ सहमत नहीं हैं और इस विषय पर मतभेद बने हुए हैं।
समानांतर प्रशासनिक ढांचे की बहस
जम्मू-कश्मीर में 280 डीडीसी सदस्यों के गठन के बाद कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे जिला स्तर पर समानांतर प्रतिनिधिक व्यवस्था के रूप में देखा है। उनका मानना है कि राज्य विधानसभा के लंबे समय तक प्रभावी रूप से कार्य नहीं करने की स्थिति में कई प्रशासनिक और वित्तीय निर्णय संघीय प्रशासन के नियंत्रण में केंद्रित रहे, जिससे स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं की भूमिका सीमित हुई।
हालांकि समर्थकों का तर्क है कि डीडीसी ने जिला स्तर पर विकास योजनाओं की निगरानी और स्थानीय भागीदारी को बढ़ाने का अवसर भी प्रदान किया है। इसलिए इस व्यवस्था का मूल्यांकन उसके व्यावहारिक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।
आगे की राह
जम्मू-कश्मीर में मजबूत स्थानीय लोकतंत्र के लिए केवल नई संस्थाओं का गठन पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि संविधान की भावना के अनुरूप स्थानीय निकायों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन, प्रशासनिक अधिकार और निर्णय लेने की वास्तविक क्षमता प्रदान की जाए। साथ ही जिला योजना समितियों जैसी संवैधानिक संस्थाओं को प्रभावी बनाकर पंचायतों और नगर निकायों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए।
यदि स्थानीय शासन व्यवस्था को पारदर्शी, उत्तरदायी और जनभागीदारी आधारित बनाया जाता है, तो लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की मूल भावना को अधिक मजबूती मिल सकती है। वस्तुतः भविष्य की नीति का उद्देश्य ऐसी व्यवस्था विकसित करना होना चाहिए जिसमें स्थानीय संस्थाएँ राज्य की जनता के प्रति जवाबदेह हों और विकास संबंधी निर्णय स्थानीय आवश्यकताओं एवं प्राथमिकताओं के अनुरूप लिए जाएँ।