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सर्वोच्च न्यायालय का एआई मसौदा विनियम, 2026

संदर्भ 

  • भारतीय न्यायपालिका में आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के जिम्मेदार उपयोग को लेकर एक ऐतिहासिक शुरुआत हुई है। जून 2026 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायालयों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग हेतु विनियम, 2026 का एक विस्तृत मसौदा (Draft Regulations) पेश किया। इस नीतिगत पहल का मुख्य उद्देश्य न्यायिक प्रक्रियाओं में एआई को शामिल करने के लिए एक पारदर्शी, सुरक्षित और सुदृढ़ प्रशासनिक ढांचा (Governance Framework) तैयार करना है।

विनियमों की प्रकृति: क्या ये सभी पर अनिवार्य रूप से लागू होंगे ? 

यह मसौदा विनियम तात्कालिक रूप से या देश के सभी न्यायालयों में एक साथ लागू नहीं किया जा रहा है। इसकी प्रकृति चरणबद्ध और ऐच्छिक रखी गई है :  

  • शीर्ष अदालत में क्रियान्वयन : सर्वोच्च न्यायालय में इन नियमों को उस तारीख से प्रभावी माना जाएगा, जिसकी घोषणा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) आधिकारिक अधिसूचना के माध्यम से करेंगे।
  • राज्यों के न्यायालयों में नियंत्रण : देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों (High Courts), उनके अधीन आने वाली निचली अदालतों तथा अधिकरणों (Tribunals) में इसे लागू करने का अधिकार संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास सुरक्षित होगा।
  • लचीलापन : विभिन्न न्यायालयों की तकनीकी क्षमता और बुनियादी ढांचे को देखते हुए, इसके अलग-अलग प्रावधानों को अलग-अलग समय पर लागू करने की छूट दी गई है।  

न्यायपालिका में एआई की भूमिका और कार्यक्षेत्र 

मसौदे के अनुसार, अदालतों में एआई की भूमिका केवल एक सहायक के रूप में होगी। इसका मुख्य उद्देश्य न्याय की प्रक्रिया को सुलभ बनाना, मुकदमों के लंबित होने की अवधि को घटाना और प्रशासनिक उत्पादकता को बढ़ाना है।  

लिखित पूर्व-अनुमति (शीर्ष निकाय या एआई समिति द्वारा) और सख्त निगरानी के तहत एआई का उपयोग निम्नलिखित गैर-न्यायिक कार्यों में किया जा सकेगा: 

  • प्रशासनिक कार्य : वाद प्रबंधन (Case Management) और अदालती कामकाज का संचालन।
  • भाषा और दस्तावेजीकरण : अदालती कार्यवाही का प्रतिलेखन (Transcription), क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद और लंबे कानूनी दस्तावेजों का संक्षिप्त सार तैयार करना।
  • अनुसंधान और सुगमता : विधिक शोध (Legal Research) में सहायता करना और दिव्यांगजनों के लिए अदालती कार्यवाही को अधिक सुलभ (Accessible) बनाना। 

अंतिम निर्णय का अधिकार: क्या एआई फैसला सुना सकता है ? 

  • स्पष्ट निषेध : मसौदा इस बात को पूरी तरह रेखांकित करता है कि एआई कभी भी न्यायाधीश का स्थान नहीं ले सकता।  
  • अंतिम फैसला सुनाने की शक्ति केवल और केवल मानव न्यायाधीश के पास ही सुरक्षित रहेगी। एआई द्वारा तैयार की गई किसी भी सामग्री या एल्गोरिद्म को न्यायिक निर्णय का मुख्य आधार नहीं बनाया जा सकता। यदि कोई न्यायाधीश सहायता लेता भी है, तो एआई का सुझाव केवल परामर्शकारी (Advisory) माना जाएगा, जिसका स्वतंत्र मूल्यांकन न्यायाधीश को स्वयं करना होगा। 

संवेदनशील मामलों में एआई के उपयोग पर सख्त रोक 

न्यायिक निष्पक्षता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में एआई के उपयोग पर पूर्ण एवं अपरिवर्तनीय प्रतिबंध लगाया गया है। किसी भी परिस्थिति में एआई का उपयोग निम्नलिखित कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता: 

  • जोखिम और अपराध का आकलन : किसी आरोपी के भागने के जोखिम (Flight Risk) का मूल्यांकन करना या किसी अपराधी द्वारा दोबारा अपराध करने (Recidivism) की प्रवृत्ति का अनुमान लगाना।
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता के निर्णय : जमानत (Bail) की पात्रता तय करना।
  • प्रोफाइलिंग और व्यवहार का पूर्वानुमान : गवाहों की विश्वसनीयता आंकना, या वकीलों, गवाहों व आरोपियों के भविष्य के आचरण की प्रोफाइलिंग करना।
  • साक्ष्य के रूप में गोपनीयता : एआई द्वारा बनाई गई किसी सामग्री को बिना बताए स्वतंत्र सबूत के रूप में पेश करना।
  • ब्लैक-बॉक्स सिस्टम पर रोक : ऐसे एआई मॉडल का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित होगा जिनकी निर्णय प्रक्रिया (Decision-making process) को मानवीय स्तर पर समझाया या समझा न जा सके। 

पारदर्शिता और वादकारियों के अधिकार 

  • अदालती कार्यवाही में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि यदि किसी मामले के विश्लेषण या प्रबंधन में एआई का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, तो इसकी सूचना संबंधित पक्षकारों (Litigants) को स्पष्ट रूप से दी जाए। हालांकि, सामान्य या छोटे-मोटे तकनीकी उपयोगों के लिए ऐसी सूचना देना जरूरी नहीं होगा। 
  • यदि किसी प्रतिबंधित एआई उपयोग के कारण किसी नागरिक को नुकसान पहुंचता है, तो वह सीधे संबंधित अदालत में इसके खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। उच्च न्यायालयों को आम जनता के लिए इस प्रक्रिया को सरल बनाने के निर्देश दिए गए हैं।  

संस्थागत ढांचा और सुरक्षा ऑडिट 

एआई के सुरक्षित क्रियान्वयन के लिए एक बहु-स्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था का प्रस्ताव किया गया है:

नियामक संस्थाएं: 

  • एपेक्स बॉडी (Apex Body) : सर्वोच्च न्यायालय के अधीन गठित होने वाले इस शीर्ष निकाय में न्यायाधीशों के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) के प्रतिनिधि, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और वित्तीय सलाहकार शामिल होंगे। वस्तुतः यह निकाय न्यूनतम मानक और नीतियां तय करेगी।  
  • विशेषज्ञ समितियां और सचिवालय : इसके तहत पांच विशेषज्ञ समितियां और एक समर्पित एआई सचिवालय काम करेगा। प्रत्येक उच्च न्यायालय में भी अपनी स्वतंत्र एआई समितियां होंगी। 
  • कोर एआई (CoRE-AI) : तकनीकी मूल्यांकन और शोध के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान एवं उत्कृष्टता केंद्र नामक एक स्वतंत्र संस्थान की स्थापना की जाएगी।  

सुरक्षा एवं डेटा संप्रभुता (Data Sovereignty) 

  • निजी कंपनियों के लिए कड़े नियम : निजी वेंडर केवल न्यायालय की लिखित अनुमति से सेवाएं दे सकेंगे। वे अदालती डेटा का मालिकाना हक नहीं जता सकते, न ही इसका उपयोग अपने मॉडल को प्रशिक्षित (Fine-tune) करने के लिए कर सकते हैं। न्यायिक डेटा पर किसी भी कंपनी का विशेष बौद्धिक संपदा (Exclusive IP) अधिकार नहीं होगा।
  • लाइफसाइकिल ऑडिट : किसी भी एआई उपकरण को लाने से पहले और उसके उपयोग के दौरान तकनीकी व नैतिक प्रभाव मूल्यांकन (Ethical Impact Assessment) अनिवार्य होगा, ताकि पक्षपात (Bias) और हैलुसिनेशन (गलत तथ्य गढ़ना) को रोका जा सके। 
  • आपातकालीन प्रोटोकॉल : एआई प्रणाली के क्रैश या विफल होने की स्थिति में, 24 घंटे के भीतर इसकी रिपोर्ट करना अनिवार्य होगा। साथ ही, अदालती कामकाज बिना बाधा के चलता रहे, इसके लिए एक मैन्युअल फॉल-बैक प्रोटोकॉल तैयार रखा जाएगा। 

निष्कर्ष 

  • सर्वोच्च न्यायालय का यह एआई मसौदा विनियम, 2026 तकनीकी प्रगति और मानवीय विवेक के बीच एक बेहतरीन संतुलन साधता है। यह जहां एक ओर न्यायिक दक्षता को बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक उपकरणों का स्वागत करता है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी विधिक सिद्धांतों, मानवीय स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय की गरिमा को अक्षुण्ण रखता है। भारत का यह कदम वैश्विक स्तर पर उत्तरदायी एआई गवर्नेंस  (Responsible AI Governance) का एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है। 

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