हाल ही में कार्यस्थल और पेशेवर जीवन में महिलाओं के मातृत्व अधिकारों को लेकर दो महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम सामने आए हैं। एक तरफ जहां दिल्ली उच्च न्यायालय ने निजी क्षेत्र की एक महिला कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मातृत्व अवकाश के बाद उसके मूल अधिकारों और पद की सुरक्षा को सुनिश्चित किया है, वहीं दूसरी तरफ प्रसिद्ध पहलवान विनेश फोगट की याचिका ने खेल जगत में महिला एथलीटों के लिए मातृत्व सुरक्षा और एक संरचित नीति की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
मातृत्व अवकाश के बाद पुनरुद्धार और अदालत का फैसला
पारंपरिक रूप से कार्यस्थल पर मातृत्व सुरक्षा को केवल इस रूप में समझा जाता रहा है कि महिला कर्मचारी मातृत्व अवकाश के दौरान अपनी नौकरी या वेतन गंवाए बिना अवकाश ले सकती है। लेकिन अवकाश के बाद जब वह काम पर लौटती है, तो उसके अधिकारों और पद की सुरक्षा को लेकर स्पष्टता का अभाव अक्सर भेदभाव का कारण बनता है।
इस मुद्दे से जुड़े एक मामले में, 14 वर्षों के अनुभव वाली एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (जो एक निजी कंपनी में लेखा प्रबंधक के रूप में कार्यरत थीं) ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। गर्भावस्था की सूचना देने के बाद उनका ट्रांसफर दूसरी टीम में कर दिया गया था और मातृत्व अवकाश (दिसंबर 2023 से जुलाई 2024) से लौटने पर उन्हें मूल पद देने के बजाय ट्रेजरी विभाग में भेज दिया गया, जिससे उनकी जिम्मेदारियां और करियर के अवसर प्रभावित हुए।
इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश से लौटने वाली प्रत्येक महिला कर्मचारी को आम तौर पर उसके पिछले पद या समान वेतन, पद, वरिष्ठता, जिम्मेदारियों, प्रबंधकीय अधिकारों और करियर उन्नति के अवसरों वाले समकक्ष पद पर बहाल किए जाने का अधिकार है।
अदालत ने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 12 का हवाला देते हुए कहा कि नियोक्ता संरक्षित अवधि के दौरान सेवा शर्तों में प्रतिकूल बदलाव नहीं कर सकता। ऐसा कोई भी बदलाव या पुनरावंटन (reassignment) यदि बिना किसी ठोस और वास्तविक संगठनात्मक कारण के किया जाता है, तो उसे भेदभावपूर्ण माना जाएगा।
न्यायालय ने उल्लंघन के दोषी पाए जाने पर नियोक्ता को ₹10 लाख का मुआवजा और ₹1.5 लाख लागत देने का निर्देश दिया। वस्तुतः न्यायालय का यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 (समानता), अनुच्छेद 21 (गरिमा और आजीविका) तथा अनुच्छेद 42 (मातृत्व संरक्षण) के अनुरूप है।
पेशेवर खेल और विनेश फोगट की याचिका
कॉर्पोरेट और निजी क्षेत्र के इस कानूनी दायरे से आगे बढ़कर, खेल जगत में भी मातृत्व सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। भारतीय पहलवान विनेश फोगट ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर महिला एथलीटों के लिए मातृत्व अवकाश के बाद प्रतिस्पर्धी खेलों में वापसी की सुविधा हेतु एक संरचित और निष्पक्ष ढांचे की मांग की है।
याचिका के अनुसार, मौजूदा चयन और पात्रता मानदंड अक्सर मातृत्व काल के दौरान आयोजित टूर्नामेंटों के प्रदर्शन पर आधारित होते हैं, जो प्रभावी रूप से महिला एथलीटों को उस अनुपस्थिति के लिए दंडित करते हैं जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय मानकों के विपरीत, भारतीय खेल प्रणाली में मातृत्व अवकाश लेने वाली एथलीटों के लिए रैंकिंग की सुरक्षा या वैकल्पिक वापसी का कोई पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ मार्ग नहीं है।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार, भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) और भारतीय ओलंपिक संघ को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है, और मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर के लिए तय की है।
निष्कर्ष
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज और कानून अब मातृत्व अवकाश को केवल एक सामाजिक लाभ के रूप में नहीं, बल्कि महिलाओं के समानता, गरिमा और व्यावसायिक विकास के मूलभूत अधिकार के रूप में देख रहे हैं। चाहे वह कॉर्पोरेट क्षेत्र हो या खेल का मैदान, मातृत्व के कारण किसी भी महिला की पेशेवर प्रगति बाधित न हो, यह आज के समय की एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।