संदर्भ
- सौरमंडल के रहस्यों को सुलझाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए माइनर प्लैनेट सेंटर (Minor Planet Centre: MPC) ने हाल ही में 15 नए चंद्रमाओं की खोज की पुष्टि की है। इनमें से 4 चंद्रमा सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति की परिक्रमा कर रहे हैं जबकि शेष 11 चंद्रमा शनि ग्रह प्रणाली का हिस्सा बने हैं।
- बृहस्पति के इन नए उपग्रहों को खोजने का श्रेय अमेरिकी वैज्ञानिक स्कॉट शेपर्ड और डेविड थोलेन को जाता है जबकि शनि के चंद्रमाओं की खोज एडवर्ड एश्टन के नेतृत्व वाली ताइवानी टीम ने की है।
क्या है माइनर प्लैनेट सेंटर (MPC)
मैसाचुसेट्स के कैम्ब्रिज में स्थित एम.पी.सी. सौरमंडल के ‘छोटे खगोलीय पिंडों’ का विश्व का सबसे बड़ा और विश्वसनीय डेटा बैंक है। स्मिथसोनियन एस्ट्रोफिजिकल ऑब्जर्वेटरी में स्थित यह केंद्र अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) के तत्वावधान में कार्य करता है। इसका मुख्य उत्तरदायित्व क्षुद्रग्रहों (Asteroids), धूमकेतुओं (Comets) एवं ग्रहों के दूरस्थ चंद्रमाओं की निगरानी करना है।
खोज से सत्यापन तक की प्रक्रिया
जब भी कोई खगोलविद अंतरिक्ष में किसी अज्ञात पिंड को देखता है तो उसका डेटा सत्यापन के लिए एम.पी.सी. को भेजा जाता है। यहाँ विशेषज्ञ निम्नलिखित चरणों का पालन करते हैं -
- सत्यापन : प्राप्त आंकड़ों की सूक्ष्मता से जांच की जाती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पिंड वास्तव में नया है।
- कक्षा निर्धारण : उस पिंड के परिक्रमा मार्ग या कक्षा (Orbit) की सटीक गणना की जाती है।
- नामांकन : पुष्टि होने के बाद एम.पी.सी. उस पिंड को एक आधिकारिक पहचान या ‘डेजिग्नेशन’ प्रदान करता है। इससे वैज्ञानिक समुदाय को उसकी गति एवं स्थिति को ट्रैक करने में आसानी होती है।
पृथ्वी की सुरक्षा: ‘प्लेनेटरी डिफेंस’ में भूमिका
- एम.पी.सी. का कार्य केवल सूची बनाना ही नहीं है बल्कि पृथ्वी की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है। यह पृथ्वी के निकट वस्तुओं (Near-Earth Objects: NEOs) पर पैनी नजर रखता है।
- सहयोग : यह केंद्र नासा के ‘प्लेनेटरी डिफेंस कोऑर्डिनेशन ऑफिस’ के साथ मिलकर काम करता है।
- जोखिम का आकलन : एक विशाल डेटाबेस के माध्यम से यह अनुमान लगाया जाता है कि कोई अंतरक्षीय चट्टान पृथ्वी के कितने करीब से गुजरेगी और क्या उससे भविष्य में कोई खतरा हो सकता है।
वैश्विक समन्वय का केंद्र
- खगोलीय घटनाओं की जानकारी साझा करने के लिए एम.पी.सी. एक संचार सेतु का कार्य करता है।
- यह नियमित रूप से इलेक्ट्रॉनिक सर्कुलर्स जारी करता है जिससे दुनिया भर की वेधशालाओं को नई खोजों की तत्काल सूचना मिलती है।
- इस त्वरित संचार प्रणाली के कारण ही विभिन्न देशों के वैज्ञानिक आपसी तालमेल बिठाकर किसी भी खगोलीय घटना का गहराई से अध्ययन कर पाते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) के बारे में
- अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) की स्थापना 1919 में हुई थी। इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से अनुसंधान, संचार, शिक्षा एवं विकास सहित खगोल विज्ञान के सभी पहलुओं को बढ़ावा देना और उसकी रक्षा करना है।
- इसके सदस्य प्रभागों, आयोगों एवं कार्य समूहों में संरचित हैं जो विश्व भर के पेशेवर खगोलविद हैं और खगोल विज्ञान में पेशेवर अनुसंधान, शिक्षा एवं प्रचार-प्रसार में सक्रिय हैं।
कार्य
- अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ की प्रमुख गतिविधि वैज्ञानिक सम्मेलनों का आयोजन है। प्रत्येक वर्ष आई.ए.यू. 9 अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों का प्रायोजन करता है। आई.ए.यू. संगोष्ठी कार्यवाही श्रृंखला आई.ए.यू. प्रकाशनों की प्रमुख श्रृंखला है।
- प्रत्येक तीन वर्ष में आई.ए.यू. एक आम सभा आयोजित करता है जिसमें 6 संगोष्ठियाँ, लगभग 15 फोकस बैठकें और प्रभागों, आयोगों, कार्य समूहों व कार्यालयों की व्यक्तिगत व्यावसायिक एवं वैज्ञानिक बैठकें शामिल होती हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) के अन्य कार्यों में मौलिक खगोलीय और भौतिक स्थिरांकों का निर्धारण, स्पष्ट खगोलीय नामकरण एवं भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर सुविधाओं की संभावनाओं पर अनौपचारिक चर्चा शामिल हैं।
- इसके अतिरिक्त आई.ए.यू. खगोलीय पिंडों और उन पर मौजूद सतही विशेषताओं को नाम देने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है।