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प्रशिक्षुता प्रणाली (Revitalizing Apprenticeship Ecosystem) को पुनर्जीवित करने पर नीति आयोग की रिपोर्ट

संदर्भ 

  • हाल ही में नीति आयोग  ने “Revitalizing Apprenticeship Ecosystem: Insights, Challenges, Recommendations and Best Practices” शीर्षक से एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत दस्तावेज जारी किया है।
  • इस रिपोर्ट का उद्देश्य प्रशिक्षुता प्रणाली को भारत की मानव पूंजी सुदृढ़ीकरण प्रक्रिया तथा विकसित भारत @2047 के लक्ष्य का एक केंद्रीय आधार बनाना है। 

रिपोर्ट का सार: 'विकसित भारत @2047' की ओर एक कदम 

  • नीति आयोग की यह रिपोर्ट प्रशिक्षुता (Apprenticeship) को केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम न मानकर, इसे भारत के मानव पूंजी विकास का एक अनिवार्य स्तंभ घोषित करती है। 
  • इसका मुख्य ध्येय भारतीय युवाओं को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना और 'सीखते हुए कमाने' (Earn while you Learn) की संस्कृति को बढ़ावा देना है।  

रिपोर्ट की संरचना और पंच-मुखी रणनीति 

  • इस रिपोर्ट में पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए पाँच मुख्य स्तंभों पर आधारित 20 क्रियान्वयन योग्य अनुशंसाएँ दी गई हैं:
    • नियामक ढाँचे को सरल और उद्योग-अनुकूल बनाना।
    • संस्थागत क्षमताओं का विस्तार।
    • राज्य और जिला स्तर पर सक्रिय भागीदारी।
    • निजी क्षेत्र और MSMEs को प्रोत्साहित करना।
    • छात्रों के लिए वजीफा और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना। 
    • रिपोर्ट में राज्यों के प्रदर्शन के आकलन के लिए एक "Apprenticeship Engagement Index" प्रस्तावित किया गया है, जो प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा देगा। 

सांख्यिकीय अंतर्दृष्टि: क्षेत्रीय विषमताएँ और संभावनाएँ 

रिपोर्ट भारत के प्रशिक्षुता मानचित्र में मौजूद असंतुलन को रेखांकित करती है:

  • औद्योगिक संकेंद्रण: वित्त वर्ष 2024-25 के आँकड़ों के अनुसार, गुजरात (24.18%) के साथ शीर्ष पर है। महाराष्ट्र, हरियाणा, तमिलनाडु और कर्नाटक मिलकर देश के अधिकांश अवसरों का सृजन करते हैं। 
  • क्षेत्रीय अंतर: कई राज्यों का योगदान 0.001% से भी कम है, जो समावेशी विकास के मार्ग में एक बड़ी बाधा है। 
  • ऊर्जा और ग्रामीण विकास: रिपोर्ट एक दिलचस्प तथ्य प्रस्तुत करती है कि बायो-ऊर्जा क्षेत्र में कृषि अवशेषों के उपयोग से सालाना 18,000 मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है, जिसे ग्रामीण प्रशिक्षुता कार्यक्रमों से जोड़कर रोज़गार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। 

प्रशिक्षुता पारिस्थितिकी तंत्र का बहुआयामी महत्व 

  • कौशल सेतु: यह किताबी ज्ञान और व्यावहारिक औद्योगिक मांग के बीच की दूरी को कम करता है, जैसा कि NEP 2020 में परिकल्पित है। 
  • रोजगार क्षमता: प्रत्यक्ष कार्य-अनुभव युवाओं के आत्मविश्वास और कार्य-कुशलता में वृद्धि करता है। 
  • MSME क्लस्टर मॉडल: लघु उद्योगों के लिए साझा प्रशिक्षण केंद्र लागत कम करते हैं और नवाचार को प्रोत्साहित करते हैं।
  • वैश्विक मानक: प्रमाणपत्रों की अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता भारतीय कार्यबल के लिए विदेशों में भी द्वार खोलती है। 

मार्ग की प्रमुख बाधाएं (चुनौतियां) 

  • मानसिकता का अभाव: समाज में पारंपरिक डिग्री को व्यावसायिक प्रशिक्षण की तुलना में अधिक प्रतिष्ठा दी जाती है। 
  • जटिल नियम: NAPS और NATS जैसे विभिन्न पोर्टल्स और कागजी कार्रवाई छोटे उद्यमियों (MSMEs) को दूर रखती है। 
  • तकनीकी अंतराल: एआई (AI) और डिजिटल बदलाव की तुलना में आईटीआई (ITI) पाठ्यक्रमों का अपग्रेडेशन धीमी गति से हो रहा है।
  • बुनियादी ढांचा: सुदूरवर्ती क्षेत्रों में आधुनिक प्रशिक्षण केंद्रों और जिला कौशल समितियों (DSCs) के पास संसाधनों की कमी है। 

भविष्य की राह: रणनीतिक सिफारिशें 

  • एकीकृत डिजिटल पोर्टल: पंजीकरण से लेकर प्रमाणन तक की प्रक्रिया के लिए एक एकल मंच।
  • प्रोत्साहन: MSMEs के लिए विशेष वित्तीय और क्लस्टर-आधारित सहायता।
  • जागरूकता: व्यावसायिक शिक्षा को एक 'सम्मानजनक करियर विकल्प' के रूप में ब्रांड करना। 
  • मानकीकरण: भारतीय प्रशिक्षुता प्रमाणपत्रों को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना। 

निष्कर्ष 

नीति आयोग की यह रिपोर्ट केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) को वास्तविकता में बदलने का एक सशक्त माध्यम है। यदि इन सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो भारत 2047 तक न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि दुनिया के लिए एक 'स्किलिंग हब' के रूप में उभरेगा।  

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