चर्चा में क्यों ?
- हाल ही में, विशेषकर वेनेजुएला के संदर्भ में अमेरिका द्वारा की गई एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों ने अंतर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन तथा संयुक्त राष्ट्र-नेतृत्व वाली बहुपक्षीय व्यवस्था के क्षरण को लेकर वैश्विक बहस को पुनः तेज कर दिया है।
- इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली प्रभावी बनी रह पाई है या नहीं।

आज के लेख में
- अंतर्राष्ट्रीय कानून की पृष्ठभूमि
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर और बल प्रयोग पर प्रतिबंध
- एकतरफा सैन्य कार्रवाइयाँ और कानूनी चुनौतियाँ
- शक्ति संतुलन के सिद्धांत का क्षरण
- पूर्व-निवारक (Pre-emptive) सैन्य सिद्धांत
- वैश्विक व्यवस्था पर प्रभाव
- भारत की विदेश नीति पर निहितार्थ
अंतर्राष्ट्रीय कानून और बल का प्रयोग
अंतर्राष्ट्रीय कानून की नींव दो प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है—
- राज्यों की संप्रभु समानता, और
- अंतर-राज्यीय संबंधों में बल प्रयोग पर प्रतिबंध
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, इन सिद्धांतों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के माध्यम से संहिताबद्ध किया गया ताकि एकतरफा सैन्य आक्रामकता को रोका जा सके और स्थायी वैश्विक शांति सुनिश्चित की जा सके।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रावधान
- अनुच्छेद 2(4):-किसी भी राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल के प्रयोग या उसकी धमकी पर पूर्ण प्रतिबंध।
- केवल दो मान्य अपवाद:
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा अधिकृत बल प्रयोग,
- अनुच्छेद 51 के अंतर्गत आत्मरक्षा का अधिकार, वह भी केवल सशस्त्र हमले की स्थिति में।
इसके बावजूद, शक्तिशाली देशों द्वारा इन सीमाओं से बाहर जाकर सैन्य हस्तक्षेपों को उचित ठहराया जाना अंतर्राष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था के क्षरण का संकेत देता है।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर ढांचे का उल्लंघन: वेनेजुएला मामला
वेनेजुएला के विरुद्ध हालिया अमेरिकी सैन्य कार्रवाई:
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना की गई,
- आत्मरक्षा (अनुच्छेद 51) की कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करती,
- इस प्रकार अनुच्छेद 2(4) का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
यह कदम-
- आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत को कमजोर करता है,
- बहुपक्षीय संस्थानों की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाता है,और वैश्विक सुरक्षा को एकतरफा निर्णयों के अधीन कर देता है।
शक्ति संतुलन के सिद्धांत का विघटन
शीत युद्ध काल (Bipolar World)
- अमेरिका और सोवियत संघ के बीच द्विध्रुवीय संरचना,
- एक-दूसरे को संतुलित करने वाली व्यवस्था,
- किसी एक शक्ति के बेलगाम प्रयोग पर अंकुश।
ऐतिहासिक उदाहरण
- 1971 बांग्लादेश मुक्ति युद्ध: सोवियत संघ की जवाबी तैनाती ने अमेरिकी सातवें बेड़े के प्रभाव को निष्प्रभावी किया।
- 1973 योम किप्पुर युद्ध: सोवियत चेतावनी और अमेरिकी DEFCON-3 ने संघर्ष के विस्तार को रोका।
शीत युद्ध के बाद (Unipolar Moment)
- 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद,
- अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा,
- बाहरी प्रतिबंधों के अभाव में सैन्य हस्तक्षेपों में वृद्धि हुई (इराक, लीबिया, सीरिया आदि)।
पूर्व-निवारक सैन्य सिद्धांत (Pre-emptive Doctrine)
समकालीन अमेरिकी विदेश नीति में:
- आतंकवाद,
- हथियारों के प्रसार,
- अंतरराष्ट्रीय अपराध
जैसे व्यापक और अस्पष्ट कारणों के आधार पर पूर्व-निवारक कार्रवाई को उचित ठहराया गया।
वेनेजुएला संदर्भ
- “नारको-आतंकवाद” का तर्क कानूनी रूप से कमजोर,फेंटानिल संकट का मुख्य स्रोत वेनेजुएला नहीं,इसके विपरीत, वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार रणनीतिक आकर्षण का केंद्र।
- यह स्थिति सैन्य कार्रवाई की आनुपातिकता और आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न उठाती है।
वैश्विक व्यवस्था पर प्रभाव
अंतर्राष्ट्रीय कानून की निरंतर अनदेखी के परिणाम-
- संयुक्त राष्ट्र की साख में गिरावट,
- एकतरफावाद का सामान्यीकरण,
- अन्य शक्तियों के लिए खतरनाक मिसाल।
उभरता परिदृश्य
- चीन को संभावित प्रतिसंतुलन के रूप में देखा जा रहा है,
- रूस-चीन सहयोग सीमित लेकिन महत्वपूर्ण,
- फिर भी निकट भविष्य में स्थिर बहुध्रुवीय व्यवस्था अनिश्चित।
भारत की विदेश नीति पर निहितार्थ
भारत के लिए यह परिदृश्य कई महत्वपूर्ण संकेत देता है-
- कमजोर नियम-आधारित व्यवस्था में संप्रभुता संबंधी जोखिम,
- अंतर्राष्ट्रीय कानून और बहुपक्षवाद पर पारंपरिक निर्भरता की सीमाएँ,
- रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करने की आवश्यकता।
आगे की राह
- रक्षा-औद्योगिक आधार में निवेश,
- विविध रणनीतिक साझेदारियाँ,
- विश्वसनीय सैन्य और आर्थिक क्षमता का निर्माण।
तेजी से एकतरफा होती वैश्विक व्यवस्था में, केवल नैतिक अपील नहीं बल्कि व्यावहारिक शक्ति ही राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकती है।