भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने 7 अप्रैल से नौ-न्यायाधीशों की एक बड़ी संविधान पीठ के समक्ष उन पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करने का निर्णय लिया है, जो 2018 के ऐतिहासिक फैसले को चुनौती देती हैं। वस्तुतः 2018 में न्यायालय ने सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी, जिसके बाद केरल में व्यापक सामाजिक और राजनीतिक हलचल देखी गई थी।
न्यायिक यात्रा: 1990 से अब तक
1. केरल उच्च न्यायालय का रुख (1991)
प्रवेश प्रतिबंध को पहली बार 1990 में चुनौती दी गई थी। 1991 में केरल उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यह प्रतिबंध एक दीर्घकालीन परंपरा है और यह संविधान के उल्लंघन के दायरे में नहीं आता। न्यायालय ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड को इस परंपरा को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया था।
2. सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती (2006)
'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन' ने अनुच्छेद 32 के तहत एक याचिका दायर कर केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल नियम, 1965 के नियम 3(बी) को चुनौती दी। उनके मुख्य तर्क थे:
यह अनुच्छेद 14 और 15 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
यह अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के विरुद्ध है।
यह महिलाओं की गरिमा के विरुद्ध प्रथाओं को त्यागने के मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A) का अपमान है।
3. ऐतिहासिक 2018 का निर्णय (4:1 बहुमत)
सितंबर 2018 में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाया कि "कोई भी परंपरा मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती।" न्यायालय ने आयु के आधार पर महिलाओं के बहिष्कार को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
नोट:इस फैसले के बाद केरल में भारी विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके परिणामस्वरूप दर्जनों पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।
वर्तमान स्थिति: नौ-न्यायाधीशों की पीठ और संवैधानिक प्रश्न
2019: व्यापक प्रश्न बड़ी पीठ को भेजे गए
2019 की तीर्थयात्रा से पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि उसका 2018 का निर्णय अन्य धार्मिक परंपराओं पर भी प्रभाव डाल सकता है।
इसी कारण न्यायालय ने व्यापक संवैधानिक प्रश्नों को कम से कम सात न्यायाधीशों की बड़ी पीठ को संदर्भित कर दिया, हालांकि मूल निर्णय पर रोक लगाने से इनकार किया।
2020: पुनर्विचार याचिकाओं को स्वीकार्यता
वर्ष 2020 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एस. ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने माना कि पुनर्विचार याचिकाएँ विचारणीय हैं।
पीठ ने सात प्रमुख संवैधानिक प्रश्न निर्धारित किए, जिन्हें संविधान पीठ के समक्ष विचारार्थ रखा गया। इस प्रकार, इस संवेदनशील विवाद के आगे के न्यायिक परीक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
सबरीमला मंदिर के बारे में
केरल के पेरियार टाइगर रिजर्व की पहाड़ियों में स्थित यह मंदिर दक्षिण भारत के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है।
मुख्य देवता:यह मंदिर भगवान अय्यप्पा को समर्पित है, जिन्हें शिव और मोहिनी का पुत्र माना जाता है।
नैष्ठिक ब्रह्मचर्य: यहाँ भगवान अय्यप्पा 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' रूप में विराजमान हैं। इसी मान्यता के कारण पारंपरिक रूप से 10 से 50 वर्ष की आयु (प्रजनन आयु) की महिलाओं का प्रवेश वर्जित रहा है।
कठोर व्रत: श्रद्धालु दर्शन से पहले 41 दिनों का 'व्रतम' रखते हैं, जिसमें सात्विक जीवन और आध्यात्मिक अनुशासन का पालन अनिवार्य है।
निष्कर्ष
2018 के फैसले के बाद केरल में हुई व्यापक सामाजिक हलचल यह दर्शाती है कि कानून केवल कागजों पर नहीं, बल्कि समाज की स्वीकृति के साथ प्रभावी होता है। अब नौ-न्यायाधीशों की बड़ी पीठ के पास यह जिम्मेदारी है कि वह 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) और 'धार्मिक स्वायत्तता' के बीच एक ऐसा संतुलन बनाए, जो आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को भी सुरक्षित रखे और आस्था का सम्मान भी करे।