चर्चा में क्यों ?
- राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने हाल ही में उडुपी जिला प्रशासन और कर्नाटक शहरी जल आपूर्ति एवं जल निकासी बोर्ड (KUWSDB) को निर्देश दिया है कि वे कोल्लूर क्षेत्र में सौपर्णिका नदी में दूषित जल के प्रवाह को रोकने हेतु प्रस्तावित कार्यवाही, अनुमानित लागत तथा समय-सीमा पर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
- यह मामला नदी प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण और जल संसाधन प्रबंधन से जुड़ा हुआ है।

सौपर्णिका नदी : भौगोलिक परिचय
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विशेषता
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विवरण
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नदी का नाम
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सौपर्णिका (Souparnika River)
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राज्य
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कर्नाटक
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नदी का प्रकार
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पश्चिम की ओर बहने वाली नदी (West Flowing River)
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उद्गम स्थल
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कोडाचाद्री पहाड़ियाँ, पश्चिमी घाट
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अपवाह क्षेत्र
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पश्चिमी घाट का घना वन क्षेत्र
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अंतिम संगम
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अरब सागर
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प्रमुख स्थान
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कोल्लूर, मारवंथे (Maravanthe Beach)
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भौगोलिक एवं प्राकृतिक विशेषताएँ
1. पश्चिमी घाट से उद्गम
- सौपर्णिका नदी का उद्गम कोडाचाद्री पर्वतमाला से होता है, जो जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है।
- यह क्षेत्र भारी वर्षा प्राप्त करता है, जिससे नदी बारहमासी बनी रहती है।
2. पश्चिम की ओर बहने वाली नदी
- यह नदी छोटी दूरी तय कर सीधे अरब सागर में गिरती है।
- पश्चिमी घाट की अधिकांश नदियाँ इसी प्रकार तेज ढाल के कारण तीव्र प्रवाह वाली होती हैं।
3. मारवंथे बीच की अनूठी भौगोलिक संरचना
- मारवंथे के पास सौपर्णिका नदी और अरब सागर समानांतर दिशा में बहते दिखाई देते हैं।
- दोनों के बीच केवल एक संकरी भूमि पट्टी (National Highway) स्थित है।
- यह दृश्य भारत के दुर्लभ प्राकृतिक भू-दृश्यों में से एक है।
सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व
- सौपर्णिका नदी का कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर से गहरा धार्मिक संबंध है।
- तीर्थयात्री नदी में स्नान को पवित्र मानते हैं।
- स्थानीय जनजीवन, कृषि और पर्यटन में नदी की महत्वपूर्ण भूमिका है।
पर्यावरणीय चिंता
प्रमुख समस्याएँ:
- शहरी अपशिष्ट जल का नदी में प्रवाह
- पर्यटन दबाव
- ठोस कचरा और सीवेज प्रदूषण
- जैव विविधता पर खतरा
NGT की भूमिका:
- प्रदूषण रोकने हेतु प्रशासन से कार्रवाई योजना की मांग
- समयबद्ध सुधारात्मक उपायों पर जोर
- जल गुणवत्ता संरक्षण सुनिश्चित करना
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal - NGT)

प्रमुख बिंदु :
- यह एक विशेष न्यायिक निकाय है, जिसे पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा से जुड़े मामलों के त्वरित निपटारे के लिए स्थापित किया गया है।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) भारत में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में कार्य करता है |
NGT की स्थापना:-
- स्थापना -18 अक्टूबर 2010 को
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 कानून के तहत
- मुख्यालय – नई दिल्ली
- अन्य स्थान – भोपाल, पुणे, कोलकाता और चेन्नई
- यह भारत NGT स्थापित करने वाला दुनिया का तीसरा देश (और पहला विकासशील देश) है। इससे पहले, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में ही ऐसे न्यायाधिकरण थे।
NGT का उद्देश्य और कार्य
NGT को पर्यावरण से जुड़े विवादों का 6 महीने के भीतर निपटारा करने के लिए बाध्य किया गया है। इसके मुख्य कार्य हैं:
- पर्यावरणीय मामलों की सुनवाई और समाधान करना।
- वनों और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण सुनिश्चित करना।
- "प्रदूषक भुगतान करे" (Polluter Pays) और "एहतियाती सिद्धांत" (Precautionary Principle) लागू करना।
- पर्यावरणीय मंजूरी (Environmental Clearances) से जुड़े विवादों का समाधान।
- नदी प्रदूषण, अपशिष्ट प्रबंधन, वायु प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय मुद्दों पर नियंत्रण।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के सदस्यों की संरचना, योग्यता, नियुक्ति और कार्यकाल
NGT में तीन प्रकार के सदस्य होते हैं:-
एनजीटी के सदस्य
राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अनुसार, एनजीटी में निम्नलिखित सदस्य शामिल होते हैं:
(i) अध्यक्ष (Chairperson)
(ii) न्यायिक सदस्य (Judicial Members)
- न्यूनतम 10 और अधिकतम 20 सदस्य हो सकते हैं।
- न्यायिक सदस्यों की सही संख्या समय-समय पर केन्द्र सरकार द्वारा तय और अधिसूचित की जाती है।
(iii) विशेषज्ञ सदस्य (Expert Members)
- न्यूनतम 10 और अधिकतम 20 सदस्य हो सकते हैं।
- विशेषज्ञ सदस्यों की सही संख्या भी केन्द्र सरकार द्वारा तय और अधिसूचित की जाती है।
(iv) अंशकालिक सदस्य (Part-time Members)
- एनजीटी का अध्यक्ष, यदि आवश्यक समझे, तो किसी विशिष्ट ज्ञान और अनुभव रखने वाले व्यक्तियों को विशेष मामलों में अंशकालिक आधार पर न्यायाधिकरण की सहायता के लिए आमंत्रित कर सकता है।
एनजीटी के सदस्यों की योग्यता
(i) अध्यक्ष
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश इस पद के लिए पात्र होते हैं।
(ii) न्यायिक सदस्य
न्यायिक सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित में से कोई एक योग्य होना आवश्यक है:
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश
- किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
- किसी उच्च न्यायालय का मौजूदा न्यायाधीश
- किसी उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश
(iii) विशेषज्ञ सदस्य
विशेषज्ञ सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ आवश्यक हैं:
- प्रौद्योगिकी में डिग्री हो, और
- किसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर के संस्थान से पर्यावरण और वन के क्षेत्र में कम से कम 5 वर्ष का व्यावहारिक अनुभव हो, तथा
- संबंधित क्षेत्र में कुल 15 वर्ष का अनुभव हो, या
- केंद्र और राज्य सरकारों के साथ कार्य करने का अनुभव हो।
एनजीटी के सदस्यों की नियुक्ति
(i) अध्यक्ष की नियुक्ति
- केंद्र सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के परामर्श से की जाती है।
(ii) न्यायिक और विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति
- केंद्र सरकार द्वारा गठित एक चयन समिति के माध्यम से की जाती है।
एनजीटी के सदस्यों का कार्यकाल
- कार्यकाल – अधिकतम 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक (जो पहले हो)।
- पुनर्नियुक्ति – अध्यक्ष, न्यायिक और विशेषज्ञ सदस्य पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं हैं।
NGT की शक्तियाँ और अधिकारिता
पर्यावरणीय मामलों पर निर्णय
- NGT को पर्यावरण से संबंधित सभी नागरिक मामलों (Civil Cases) पर सुनवाई का अधिकार है।
- अक्टूबर 2021 में, सर्वोच्च न्यायालय ने इसे स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की शक्ति भी दी।
अपील का अधिकार (Appellate Jurisdiction)
- NGT के निर्णयों को केवल सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है।
- आदेश के खिलाफ 90 दिनों के भीतर सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
सजा और जुर्माने के प्रावधान
अगर कोई व्यक्ति NGT के नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसे:
- 3 साल तक की जेल,
- 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना, या
- दोनों दंड एक साथ दिए जा सकते हैं।
NGT के तहत आने वाले प्रमुख कानून
NGT निम्नलिखित कानूनों से जुड़े मामलों की सुनवाई करता है:
- जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974
- वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980
- वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
- जैव विविधता अधिनियम, 2002
हालांकि, NGT को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 से जुड़े मामलों पर अधिकार नहीं दिया गया है।
NGT का महत्व
- पर्यावरण से जुड़े मामलों के शीघ्र समाधान के लिए एक प्रभावी मंच प्रदान करता है।
- उच्च न्यायालयों पर बोझ कम करता है।
- पर्यावरण से जुड़े विवादों को हल करने के लिए कम लागत और तेज़ प्रक्रिया प्रदान करता है।
- यह सरकार और उद्योगों को पर्यावरणीय नियमों का पालन करने के लिए बाध्य करता है।
NGT की चुनौतियाँ:-
- सीमित अधिकार क्षेत्र – वन्यजीव और वन अधिकारों से जुड़े मामलों पर कोई अधिकार नहीं।
- कानूनी अस्पष्टता – कई बार इसके फैसलों को उच्च न्यायालयों में चुनौती दी जाती है।
- संस्थागत चुनौतियाँ – न्यायिक और विशेषज्ञ सदस्यों की कमी से कार्य प्रभावित होता है।
- निर्णय लागू करने में कठिनाई – कई बार सरकारी विभाग NGT के आदेशों को प्रभावी रूप से लागू नहीं कर पाते।