सब्सिडी अब कुल राज्य व्यय का लगभग 9% हिस्सा बन गई है, जो राज्य बजट में इसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। राजस्व व्यय में इसका हिस्सा बढ़कर 10.2% हो गया है, जिससे राज्यों पर नियमित वित्तीय दायित्व बढ़ रहे हैं। यह वृद्धि कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार को दिखाती है, लेकिन विकास कार्यों के लिए वित्तीय लचीलापन कम करती है।
ऊर्जा क्षेत्र सबसे बड़ा सब्सिडी प्राप्तकर्ता है, जो कुल सब्सिडी का 43.4% (लगभग ₹1.9 लाख करोड़) है।
यह मुख्य रूप से घरेलू उपभोक्ताओं और किसानों को सस्ती बिजली देने तथा बिजली वितरण कंपनियों के घाटे की भरपाई के लिए दिया जाता है।
कृषि क्षेत्र दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है, जिसे ₹1.30 लाख करोड़ की सब्सिडी मिलती है, जिसमें सिंचाई, उर्वरक और कृषि इनपुट शामिल हैं।
कुछ राज्यों में सब्सिडी पर निर्भरता अधिक है, जिससे अलग-अलग राज्यों में वित्तीय तनाव असमान रूप से बढ़ रहा है। कर्नाटक का सब्सिडी बोझ सबसे अधिक 14.01% है। राजस्थान ऊर्जा सब्सिडी में सबसे आगे है (₹32,572 करोड़)। मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्य भी उच्च सब्सिडी व्यय वाले राज्यों में शामिल हैं।
राज्यों का कुल कर्ज 2015-16 में ₹23.92 लाख करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹75.52 लाख करोड़ हो गया है।
यह पिछले 10 वर्षों में 216% की वृद्धि है, जिसका मुख्य कारण राजस्व व्यय के लिए उधारी लेना है।
कई राज्यों में कर्ज अब उनकी राजस्व प्राप्तियों के 186% से अधिक हो गया है, जो दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता पर चिंता बढ़ाता है।
राज्य बजट का बड़ा हिस्सा निश्चित खर्चों में लॉक हो गया है जैसे वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान।
ये अनिवार्य खर्च नए विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधनों को कम कर देते हैं।
राजस्व व्यय अब कुल खर्च का 83% से अधिक है, जिससे पूंजीगत निवेश के लिए बहुत कम जगह बचती है। इसके कारण बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य उत्पादक क्षेत्रों में निवेश अपेक्षाकृत धीमा है।
यह स्थिति कल्याण और दीर्घकालिक विकास के बीच संरचनात्मक असंतुलन को दर्शाती है।
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