संदर्भ
- हाल ही में नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन (NCF) और बैट कंजर्वेशन इंटरनेशनल (BCI) के संयुक्त तत्वावधान में भारत का पहला व्यापक राष्ट्रीय मूल्यांकन, स्टेट ऑफ इंडियाज बैट्स 2024-25 जारी किया गया। इस मूल्यांकन मुख्य लक्ष्य चमगादड़ों की विविधता और वितरण का सटीक विवरण तैयार करना है ताकि ठोस पर्यावरण नीतियां बनाई जा सकें।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
देश में स्तनधारियों का सबसे बड़ा समूह होने के बावजूद, यह रिपोर्ट चमगादड़ों की घटती संख्या और उनके संरक्षण के प्रति बरती जा रही वैज्ञानिक उदासीनता की ओर ध्यान आकर्षित करती है। जो इन बिन्दुओं के आधार पर सही प्रतीत होता है।
- सर्वाधिक विविधता वाले राज्य : भारत में चमगादड़ों की प्रजातियों के मामले में पश्चिम बंगाल (68 प्रजातियां) और मेघालय (66 प्रजातियां) शीर्ष स्थान पर हैं।
- वैज्ञानिक अनुसंधान का अभाव : शोध की दृष्टि से यह क्षेत्र अब भी उपेक्षित है। लगभग 35 ऐसी प्रजातियां हैं जिनका या तो मूल्यांकन ही नहीं हुआ है या उनसे संबंधित आंकड़े अपर्याप्त हैं।
- आवास में बदलाव : प्राकृतिक रूप से गुफाओं और पेड़ों पर निर्भर रहने वाले चमगादड़ अब अस्तित्व बचाने के लिए पुरानी इमारतों और ऐतिहासिक स्मारकों जैसी मानवीय संरचनाओं को अपना बसेरा बना रहे हैं।
- पारिस्थितिक महत्व : यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि चमगादड़ केवल जीव नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के सेवक हैं। परागण, बीजों के प्रसार और कीटों के नियंत्रण के माध्यम से ये कृषि उत्पादकता बनाए रखने में अपरिहार्य भूमिका निभाते हैं।
भारत में चमगादड़ की प्रजातियाँ
भारत वर्तमान में चमगादड़ों की 135 प्रजातियों का घर है, जिनमें से 16 स्थानिक (Endemic) और 7 गंभीर संकट में हैं।
- गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) : कोलार लीफ-नोज्ड बैट (यह केवल कर्नाटक की एक विशिष्ट गुफा तक सीमित है)।
- विलुप्ति की कगार पर (Endangered) : निकोबार फ्लाइंग फॉक्स, सलीम अली फ्रूट बैट और अंडमान हॉर्सशू बैट।
चमगादड़ के बारे में
- चमगादड़ पृथ्वी पर 5 करोड़ (50 मिलियन) वर्षों से अधिक समय से मौजूद हैं।
- 1,500 से अधिक प्रजातियों के साथ, वे स्तनधारियों का दूसरा सबसे बड़ा समूह हैं और छह महाद्वीपों में व्यापक रूप से पाए जाते हैं।
- वैश्विक स्तर पर, चमगादड़ कीटों के भक्षण, पौधों के परागण और बीजों के प्रसार के माध्यम से महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करते हैं, जिससे वे वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक बन जाते हैं।
ये भी जाने
- चमगादड़ अपनी अल्ट्रासोनिक ध्वनियों की गूंज सुनकर रास्ता खोजते और शिकार करते हैं, जिसे इकोलोकेशन कहा जाता है।
- कुछ चमगादड़ों के चेहरे बेहद विचित्र और जटिल होते हैं, जिनमें नाक के आसपास विशेष प्रकार की त्वचा की संरचनाएँ (नोजलीव्स) होती हैं। ये संरचनाएँ उन्हें अलग-अलग तरीकों से अपनी ध्वनि तरंगों का उपयोग करके अंधेरे में देखने में मदद करती हैं।
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संरक्षण स्थिति (Conservation Status)
- 23 चमगादड़ प्रजातियाँ अत्यंत संकटग्रस्त हैं (अर्थात वे विलुप्ति के तात्कालिक खतरे का सामना कर रही हैं)।
- 85 प्रजातियाँ संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में आती हैं।
- 113 प्रजातियाँ संवेदनशील (Vulnerable) मानी जाती हैं।
- 236 प्रजातियाँ डेटा अपर्याप्त (Data Deficient) श्रेणी में रखी गई हैं, जो इस बात का संकेत है कि इनके संरक्षण के लिए और अधिक अध्ययन तथा ध्यान की आवश्यकता है।