सल्फर डाइऑक्साइड (SO2)

चर्चा में क्यों ?

  • हाल ही में एक नए विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर के 300 किलोमीटर के दायरे में स्थित कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से होने वाले लगभग 81% सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) उत्सर्जन उन संयंत्रों से आता है, जिन्हें प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियाँ (Pollution Control Systems) स्थापित करने से छूट दी गई है। 

सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) के बारे में 

  • सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) एक भारी, रंगहीन, विषैली गैस है, जिसकी गंध तीखी और दम घोंटने वाली होती है।  
  • यह एक अत्यधिक अभिक्रियाशील अकार्बनिक यौगिक (Inorganic Compound) है तथा वैश्विक स्तर पर वायु गुणवत्ता मानकों के अंतर्गत नियंत्रित किए जाने वाले प्रमुख वायु प्रदूषकों में से एक है। 

प्रमुख स्रोत (Major Sources):

1. कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र 

  • सल्फर युक्त जीवाश्म ईंधनों, विशेषकर कोयले के दहन से सबसे अधिक सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जित होता है। ताप विद्युत उत्पादन इस गैस का सबसे बड़ा औद्योगिक स्रोत है।  

2. पेट्रोलियम शोधन एवं धातु गलाना 

  • तेल शोधन, औद्योगिक निष्कर्षण तथा तांबा, जस्ता और लौह जैसी सल्फर युक्त धात्विक अयस्कों के गलाने (Smelting) की प्रक्रियाओं से भी बड़ी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड  निकलती है। 

3. प्राकृतिक स्रोत

  • ज्वालामुखी विस्फोट
  • भू-तापीय (Geothermal) गर्म जल स्रोत
  • आर्द्रभूमियों (Wetlands) में जैविक पदार्थों का अपघटन भी वायुमंडल में प्राकृतिक रूप से सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा में योगदान देते हैं।   

वायुमंडल में उपस्थिति एवं परिवर्तन:

वायुमंडल में उत्सर्जित होने के बाद सल्फर डाइऑक्साइड  सैकड़ों किलोमीटर तक यात्रा कर सकती है। इसके बाद यह जलवाष्प, ऑक्सीजन तथा अन्य रासायनिक पदार्थों के साथ अभिक्रिया करके द्वितीयक प्रदूषकों (Secondary Pollutants) का निर्माण करती है।

  • सूक्ष्म कण (पीएम2.5) : सल्फर डाइऑक्साइड ऑक्सीकृत (Oxidation) होकर सल्फेट एरोसोल बनाती है, जो पीएम 2.5 का प्रमुख घटक है। यह अत्यंत खतरनाक सूक्ष्म कण प्रदूषण का कारण बनता है। 
  • अम्ल वर्षा (Acid Rain) : सल्फर डाइऑक्साइड बादलों की जल बूंदों में आसानी से घुलकर सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) बनाती है जिसके परिणामस्वरूप अम्ल वर्षा होती है, परिणामस्वरूप; 
    • वनों को क्षति पहुँचती है,
    • मिट्टी की उर्वरता घटती है तथा 
    • जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।

जनस्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय प्रभाव: 

1. श्वसन संबंधी रोग (Respiratory Illnesses) : 

  • सल्फर डाइऑक्साइड श्वसन मार्ग (Airways) में जलन उत्पन्न करती है, जिससे खाँसी, साँस लेने में कठिनाई, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस तथा अन्य दीर्घकालिक श्वसन रोग गंभीर हो सकते हैं। 

2. हृदय एवं रक्तवाहिका संबंधी जोखिम (Cardiovascular Risks) :

  • पीएम 2.5 बनने के कारण सल्फर डाइऑक्साइड अप्रत्यक्ष रूप से शरीर में सूजन (Inflammation), हृदय रोग, स्ट्रोक तथा समय से पहले मृत्यु के जोखिम को बढ़ाती है। 

3. पारिस्थितिकी तंत्र एवं फसलों को नुकसान (Ecosystem and Crop Damage) :

  • सल्फर डाइऑक्साइड की अधिक मात्रा ; 
    • पौधों की कोशिकाओं एवं ऊतकों को क्षति पहुँचाती है।
    • प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) को बाधित करती है।
    • अम्ल वर्षा के माध्यम से मिट्टी के पोषक तत्वों को कम करती है। 
    • जलीय जीवों एवं पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाती है। 

समाधान एवं नियामक उपाय: 

1. फ्लू गैस डी-सल्फराइजेशन (FGD) प्रणाली की अनिवार्य स्थापना 

  • ताप विद्युत संयंत्रों में Flue Gas Desulphurisation (FGD) प्रणाली लगाने से चूना (Lime) या चूना पत्थर (Limestone) आधारित स्क्रबरों की सहायता से सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन का लगभग 95% तक नियंत्रण किया जा सकता है।  

2. सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (Continuous Emission Monitoring System – CEMS) 

  • उत्सर्जन संबंधी आँकड़ों को रियल-टाइम में सार्वजनिक करना पारदर्शिता बढ़ा सकता है, आँकड़ों में हेरफेर रोक सकता है तथा उद्योगों द्वारा पर्यावरणीय नियमों के बेहतर अनुपालन को सुनिश्चित कर सकता है।

3. श्रेणी–C (Category C) संयंत्रों को दी गई छूट समाप्त करना

  • चूँकि सल्फर डाइऑक्साइड सैकड़ों किलोमीटर तक फैल सकती है, इसलिए केवल किसी संयंत्र की शहरी क्षेत्रों से दूरी के आधार पर प्रदूषण नियंत्रण से छूट देना उचित नहीं माना जाना चाहिए।

4. स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण (Transition to Cleaner Energy)

  • सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा बैटरी भंडारण (Battery Storage) का विस्तार कर कोयले पर निर्भरता कम की जा सकती है, जिससे भारत में सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

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