हाल ही में एक नए विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर के 300 किलोमीटर के दायरे में स्थित कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से होने वाले लगभग 81% सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) उत्सर्जन उन संयंत्रों से आता है, जिन्हें प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियाँ (Pollution Control Systems) स्थापित करने से छूट दी गई है।
सल्फर युक्त जीवाश्म ईंधनों, विशेषकर कोयले के दहन से सबसे अधिक सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जित होता है। ताप विद्युत उत्पादन इस गैस का सबसे बड़ा औद्योगिक स्रोत है।
तेल शोधन, औद्योगिक निष्कर्षण तथा तांबा, जस्ता और लौह जैसी सल्फर युक्त धात्विक अयस्कों के गलाने (Smelting) की प्रक्रियाओं से भी बड़ी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड निकलती है।
वायुमंडल में उत्सर्जित होने के बाद सल्फर डाइऑक्साइड सैकड़ों किलोमीटर तक यात्रा कर सकती है। इसके बाद यह जलवाष्प, ऑक्सीजन तथा अन्य रासायनिक पदार्थों के साथ अभिक्रिया करके द्वितीयक प्रदूषकों (Secondary Pollutants) का निर्माण करती है।
सल्फर डाइऑक्साइड श्वसन मार्ग (Airways) में जलन उत्पन्न करती है, जिससे खाँसी, साँस लेने में कठिनाई, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस तथा अन्य दीर्घकालिक श्वसन रोग गंभीर हो सकते हैं।
पीएम 2.5 बनने के कारण सल्फर डाइऑक्साइड अप्रत्यक्ष रूप से शरीर में सूजन (Inflammation), हृदय रोग, स्ट्रोक तथा समय से पहले मृत्यु के जोखिम को बढ़ाती है।
ताप विद्युत संयंत्रों में Flue Gas Desulphurisation (FGD) प्रणाली लगाने से चूना (Lime) या चूना पत्थर (Limestone) आधारित स्क्रबरों की सहायता से सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन का लगभग 95% तक नियंत्रण किया जा सकता है।
उत्सर्जन संबंधी आँकड़ों को रियल-टाइम में सार्वजनिक करना पारदर्शिता बढ़ा सकता है, आँकड़ों में हेरफेर रोक सकता है तथा उद्योगों द्वारा पर्यावरणीय नियमों के बेहतर अनुपालन को सुनिश्चित कर सकता है।
चूँकि सल्फर डाइऑक्साइड सैकड़ों किलोमीटर तक फैल सकती है, इसलिए केवल किसी संयंत्र की शहरी क्षेत्रों से दूरी के आधार पर प्रदूषण नियंत्रण से छूट देना उचित नहीं माना जाना चाहिए।
सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा बैटरी भंडारण (Battery Storage) का विस्तार कर कोयले पर निर्भरता कम की जा सकती है, जिससे भारत में सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
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