चर्चा में क्यों ?
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, बढ़ती ऊर्जा कीमतों और उर्वरकों की लागत में वृद्धि ने भारत के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है-क्या केवल उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी या अब उर्वरक उपयोग दक्षता (Fertilizer Use Efficiency) बढ़ाने की दिशा में बढ़ना होगा ?

प्रमुख बिन्दु
- भारत यूरिया की लगभग 80% आवश्यकता घरेलू स्तर पर पूरी करता है, लेकिन उत्पादन अभी भी आयातित ईंधन पर निर्भर है। वहीं फॉस्फेट उर्वरकों के लिए देश आयातित रॉक फॉस्फेट पर काफी हद तक निर्भर है।
- ऐसे में उर्वरकों का कुशल उपयोग केवल आर्थिक नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न बन गया है।
भारत का “उर्वरक जाल” क्या है ?
- विशेषज्ञों के अनुसार भारत में उर्वरकों का अत्यधिक, असंतुलित और अक्षम उपयोग एक “उर्वरक जाल” (Fertilizer Trap) की स्थिति पैदा कर चुका है। इस स्थिति में किसान फसल उत्पादन बनाए रखने के लिए लगातार अधिक मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करते हैं, लेकिन इसके बावजूद मिट्टी की गुणवत्ता और उत्पादकता धीरे-धीरे कम होने लगती है।
- उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा घट जाती है, जिससे मिट्टी की संरचना प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप मिट्टी की जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों को बनाए रखने की क्षमता कम हो जाती है। साथ ही, मिट्टी की उर्वरता में गिरावट आने लगती है।
- इसके अतिरिक्त, उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से जल और वायु प्रदूषण बढ़ता है, जबकि रासायनिक तत्वों का अधिक संचय जैव विविधता को भी प्रभावित करता है। यह प्रक्रिया अंततः ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ाकर जलवायु परिवर्तन में भी योगदान देती है।
- जब मिट्टी की गुणवत्ता और उत्पादकता कम होने लगती है, तो किसान उत्पादन बनाए रखने के लिए और अधिक उर्वरकों का प्रयोग करने लगते हैं। इससे मिट्टी की स्थिति और खराब होती जाती है और एक दुष्चक्र (Vicious Cycle) बन जाता है, जिसे “उर्वरक जाल” कहा जाता है।
भारी सब्सिडी, फिर भी कम दक्षता
- भारत सरकार खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसानों को सस्ती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए उर्वरक क्षेत्र पर प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी प्रदान करती है। इस सब्सिडी का उद्देश्य कृषि उत्पादन बढ़ाना, किसानों की लागत कम करना और खाद्यान्न सुरक्षा बनाए रखना है।
- हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार इस बड़ी सब्सिडी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उर्वरकों के अक्षम उपयोग के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाता है।
- उर्वरकों का अत्यधिक या असंतुलित प्रयोग होने से पोषक तत्वों की हानि (Nutrient Loss) होती है, क्योंकि उर्वरकों का एक हिस्सा फसलों द्वारा उपयोग किए जाने के बजाय मिट्टी, जल या वायुमंडल में नष्ट हो जाता है।
- इसके अलावा, उर्वरकों के बहाव (अपवाह/Runoff) के कारण रासायनिक तत्व जल स्रोतों तक पहुंच जाते हैं, जिससे जल प्रदूषण बढ़ता है। वहीं नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों से निकलने वाली गैसें वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भी योगदान देती हैं।
- इस प्रकार उर्वरक सब्सिडी का एक बड़ा भाग खाद्य उत्पादन में योगदान देने के बजाय अक्षम उपयोग, पोषक तत्व हानि, प्रदूषण और अपवाह के कारण प्रभावी रूप से नष्ट हो जाता है, जिससे आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों चुनौतियां उत्पन्न होती हैं।
मौजूदा नीतियों की सीमाएँ
भारत में उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाने और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार द्वारा कई नीतिगत कदम उठाए गए हैं। हालांकि इन उपायों के बावजूद उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग की समस्या पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सकी है।
1. पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (Nutrient Based Subsidy - NBS)
सरकार ने उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) योजना लागू की थी। इस योजना के तहत फॉस्फेट (P) और पोटाश (K) आधारित उर्वरकों को पोषक तत्वों के आधार पर सब्सिडी प्रदान की जाती है।
हालांकि यह योजना उर्वरक उपयोग दक्षता में अपेक्षित सुधार लाने में सीमित रही, क्योंकि इसमें यूरिया को शामिल नहीं किया गया। परिणामस्वरूप नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों, विशेषकर यूरिया, का उपयोग अधिक बना रहा और उर्वरकों के संतुलित उपयोग का लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त नहीं हो सका।
2. नीम-लेपित यूरिया (Neem-Coated Urea)
यूरिया के दुरुपयोग को कम करने और नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए सरकार ने नीम-लेपित यूरिया को बढ़ावा दिया।
इससे कुछ सकारात्मक परिणाम अवश्य मिले, लेकिन इसकी प्रभावशीलता सीमित रही
क्योंकि यह अमोनिया उत्सर्जन को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सका।
उर्वरक से होने वाली नाइट्रोजन हानि पूरी तरह नहीं रुक पाई।
नाइट्रोजन आधारित गैसों के उत्सर्जन के कारण वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय प्रभाव बने रहे।
इस प्रकार नीम-लेपित यूरिया आंशिक समाधान साबित हुआ, लेकिन समस्या का पूर्ण समाधान नहीं बन पाया।
3. फॉस्फेटिक उर्वरक
फॉस्फेट आधारित उर्वरकों के उपयोग से जुड़ी एक बड़ी चुनौती यह है कि इनका महत्वपूर्ण हिस्सा अपवाह (Runoff) के माध्यम से बहकर नदियों, झीलों और अन्य जल निकायों तक पहुंच जाता है।
इसके परिणामस्वरूप कई पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जैसे-जल प्रदूषण में वृद्धि, यूट्रोफिकेशन (Eutrophication) अर्थात जल निकायों में पोषक तत्वों की अत्यधिक वृद्धि, जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव इससे जल गुणवत्ता प्रभावित होती है तथा जैव विविधता पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।
एमएसपी और खरीद व्यवस्था कैसे बदल रही है कृषि पैटर्न ?
- भारत सरकार किसानों को मूल्य सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से 20 से अधिक फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित करती है। हालांकि व्यवहारिक रूप से सरकारी खरीद व्यवस्था मुख्यतः चावल, गेहूं और कुछ हद तक गन्ना जैसी फसलों तक ही सीमित रहती है।
- इस स्थिति का कृषि पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। चूंकि इन फसलों की खरीद अपेक्षाकृत अधिक सुनिश्चित होती है, इसलिए किसान आर्थिक सुरक्षा और स्थिर आय के लिए इन्हीं फसलों की खेती को प्राथमिकता देते हैं।
- परिणामस्वरूप कृषि प्रणाली धीरे-धीरे उर्वरक-प्रधान फसलों की ओर केंद्रित हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत में दो-तिहाई से अधिक यूरिया की खपत चावल, गेहूं और गन्ना जैसी फसलों में होती है, जिससे उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।
- इस प्रक्रिया ने पारंपरिक फसल चक्र प्रणाली, विशेषकर दलहन और अन्य पोषण आधारित फसलों के महत्व को भी कम किया है, जबकि ये फसलें मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायक होती हैं।
खाद्य अधिशेष लेकिन संसाधनों पर बढ़ता दबाव
- भारत वर्तमान में कई प्रमुख कृषि उत्पादों का अधिशेष उत्पादन कर रहा है।
- उदाहरण के लिए
- भारत के कुल चावल उत्पादन का लगभग 40% हिस्सा निर्यात किया जाता है।
- लगभग 9% अनाज का उपयोग बायोएथेनॉल उत्पादन में किया जा रहा है।
- इसके अतिरिक्त गेहूं और गन्ने का उत्पादन भी घरेलू आवश्यकता से अधिक हो रहा है।
- हालांकि अधिशेष उत्पादन आर्थिक दृष्टि से लाभकारी माना जा सकता है, लेकिन इससे कृषि संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव भी बढ़ रहा है।
- इन फसलों के बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण -
- भूमि उपयोग पर दबाव बढ़ता है,
- सिंचाई हेतु जल की मांग बढ़ती है,
- उर्वरकों की खपत अधिक होती है,तथा सरकारी सब्सिडी का बोझ भी बढ़ता है।
- इसके परिणामस्वरूप भोजन और ईंधन उत्पादन के बीच संसाधनों की प्रतिस्पर्धा उत्पन्न हो रही है, जो दीर्घकाल में कृषि और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है।
क्यों महत्वपूर्ण हैं दलहन ?
- विशेषज्ञों के अनुसार भारत में उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में दलहन (Pulses) अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। दलहन फसलें केवल पोषण सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये कृषि प्रणाली की स्थिरता और उर्वरक निर्भरता कम करने में भी योगदान देती हैं।
प्राकृतिक नाइट्रोजन स्थिरीकरण
- दलहन फसलों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर (Nitrogen Fixation) करने की क्षमता रखती हैं।
- इन फसलों की जड़ों में उपस्थित सूक्ष्मजीव वातावरण से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में उपलब्ध कराते हैं, जिससे-
- रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया की आवश्यकता कम हो जाती है,
- मिट्टी की उर्वरता और जैविक गुणवत्ता में सुधार होता है,
- तथा कृषि प्रणाली अधिक टिकाऊ बनती है।
- इसी कारण पारंपरिक दलहन–अनाज फसल चक्र सदियों तक भारतीय कृषि का आधार रहा और इसने बिना अधिक रासायनिक उर्वरकों के भी उत्पादन बनाए रखा।
पोषण और जलवायु लाभ
- दलहन फसलें केवल कृषि दृष्टि से ही नहीं बल्कि पोषण और जलवायु अनुकूलता के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हैं।
- दलहन :
- सूखा प्रभावित और जल-संकट वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं।
- वर्षा आधारित कृषि प्रणालियों में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं।
- प्रोटीन सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- भारत की बड़ी शाकाहारी आबादी के लिए प्रमुख प्रोटीन स्रोत हैं।
- इसके अतिरिक्त, कमजोर मानसून वाले वर्षों में भी दलहन अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
दलहन उत्पादन में गिरावट
- हाल के वर्षों में अनाज केंद्रित कृषि नीतियों और MSP आधारित खरीद व्यवस्था के कारण दलहन क्षेत्र प्रभावित हुआ है।
- इसके परिणामस्वरूप दलहन उत्पादन और क्षेत्रफल में गिरावट देखी गई है।
मुख्य तथ्य :
- भारत अपनी कुल दाल आवश्यकता का लगभग 20% आयात करता है।
- तेलंगाना राज्य गठन के बाद दलहन उत्पादन लगभग आधा हो गया है।
- वर्ष 2026 में दलहन क्षेत्र में वृद्धि केवल 1.26% दर्ज की गई, जो अपेक्षाकृत बहुत कम है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कृषि प्रणाली में पुनः दलहन आधारित फसल चक्र को बढ़ावा दिया जाए, तो इससे उर्वरक उपयोग घटाने, मिट्टी सुधारने और पोषण सुरक्षा बढ़ाने में महत्वपूर्ण सहायता मिल सकती है।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन: प्रगति धीमी
भारत में दालों के उत्पादन को बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से सरकार ने दलहन आत्मनिर्भरता मिशन (2025) शुरू किया। इस मिशन का उद्देश्य देश को दाल उत्पादन में अधिक आत्मनिर्भर बनाना तथा किसानों को दलहन खेती के लिए प्रोत्साहित करना है।
इस मिशन के तहत सरकार ने :
- ₹11,440 करोड़ का वित्तीय आवंटन किया है।
- अगले पाँच वर्षों में दलहन उत्पादन को बढ़ाकर 350 लाख टन प्रति वर्ष तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
- साथ ही प्रमुख दालों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीद को मजबूत करने की बात भी कही गई थी।
- हालांकि मिशन के आरंभ के बाद भी अब तक अपेक्षित प्रगति नहीं देखी गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार :
- दलहन क्षेत्र का विस्तार सीमित रहा है और खेती का रकबा अपेक्षानुसार नहीं बढ़ पाया है।
- नीतियों का क्रियान्वयन कमजोर रहा है, जिससे जमीनी स्तर पर प्रभाव सीमित दिखाई देता है।
- MSP आधारित खरीद व्यवस्था अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ पाई, जिसके कारण किसानों को दलहन खेती की ओर पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिल सका।
- इस स्थिति से स्पष्ट होता है कि केवल वित्तीय आवंटन पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभावी कार्यान्वयन, सुनिश्चित खरीद व्यवस्था और संस्थागत समर्थन भी आवश्यक है, ताकि दलहन उत्पादन में वास्तविक वृद्धि हो सके और आयात निर्भरता कम की जा सके।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन: प्रगति धीमी
- सरकार ने दलहन आत्मनिर्भरता मिशन (2025) के तहत ₹11,440 करोड़ आवंटित किए।
- 5 वर्षों में उत्पादन 350 लाख टन तक ले जाने का लक्ष्य रखा।
- लेकिन अभी तक क्षेत्र विस्तार सीमित रहा,क्रियान्वयन कमजोर रहा और MSP खरीद अपेक्षानुसार नहीं बढ़ी।
उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाने के उपाय
जैविक विकल्पों का विस्तार
- रासायनिक उर्वरकों की निर्भरता कम करने के लिए:
- खाद (Manure)
- कम्पोस्ट
- बायोचार
- बायोगैस अवशेष का उपयोग बढ़ाना होगा।
उर्वरक उपयोग पद्धति बदलना
- विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि पहले जैविक स्रोतों से पोषण दिया जाए और रासायनिक उर्वरकों का उपयोग केवल पूरक के रूप में हो।
बेहतर फसल किस्में विकसित करना
- भारत के शोध बताते हैं कि चावल जर्मप्लाज्म में नाइट्रोजन उपयोग दक्षता को दोगुना करने की क्षमता मौजूद है।
- इसलिए निवेश को महंगी तकनीकों के बजाय कुशल फसल किस्मों पर केंद्रित करना चाहिए।
संस्थागत समन्वय
- विशेषज्ञों का सुझाव है कि केंद्र सरकार अंतर-मंत्रालयी राष्ट्रीय नाइट्रोजन संचालन समिति को पुनर्जीवित करे ताकि कृषि, पर्यावरण और उर्वरक नीति में समन्वय हो सके।
आगे की राह
भारत की खाद्य सुरक्षा केवल अधिक उर्वरक उपयोग पर नहीं, बल्कि दलहन आधारित कृषि, जैविक इनपुट, कुशल फसल किस्मों, बेहतर MSP एवं खरीद प्रणाली तथा दीर्घकालिक कृषि सुधारों पर आधारित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय “अधिक उर्वरक” से “बेहतर उर्वरक उपयोग” की ओर बढ़ने का है।