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भारत में इंजीनियरिंग शिक्षा का बदलता परिदृश्य

संदर्भ 

  • भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर, क्वांटम प्रौद्योगिकी, उन्नत विनिर्माण, स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना चाहता है। इस लक्ष्य की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि देश कितने सक्षम और विश्वस्तरीय इंजीनियर तैयार कर पाता है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस इंजीनियरिंग शिक्षा से इस तकनीकी परिवर्तन को गति मिलने की उम्मीद है, वही आज कई चुनौतियों का सामना कर रही है। 
  • एक ओर आईआईटी और कुछ चुनिंदा सरकारी एवं निजी संस्थान उत्कृष्ट शिक्षा, बेहतर प्लेसमेंट और अनुसंधान के कारण छात्रों की पहली पसंद बने हुए हैं, वहीं अधिकांश इंजीनियरिंग कॉलेज घटते प्रवेश, योग्य शिक्षकों की कमी, पुराने पाठ्यक्रम और कमजोर रोजगार क्षमता जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। यही कारण है कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने शैक्षणिक सत्र 2025-26 में 58 इंजीनियरिंग कॉलेजों को चरणबद्ध तरीके से बंद करने तथा 950 से अधिक तकनीकी पाठ्यक्रम समाप्त करने का निर्णय लिया है।  
  • वस्तुतः समस्या इंजीनियरिंग की प्रासंगिकता में नहीं, बल्कि उद्योगों की जरूरतों और इंजीनियरिंग शिक्षा के बीच बढ़ती दूरी में है। यदि यह अंतर बना रहा, तो भारत के लिए तकनीकी अवसरों का लाभ उठाना कठिन हो जाएगा।  

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) की भूमिका 

  • अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) देश में तकनीकी शिक्षा का सर्वोच्च नियामक संस्थान है। इसकी स्थापना एआईसीटीई अधिनियम, 1987 के तहत हुई, जबकि इसकी शुरुआत 1945 में एक सलाहकार संस्था के रूप में हुई थी। 
  • देश का कोई भी इंजीनियरिंग कॉलेज एआईसीटीई की मंजूरी के बिना संचालित नहीं हो सकता। परिषद बुनियादी ढांचे, शिक्षकों, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालय, प्रशासन और वित्तीय स्थिति जैसे मानकों के आधार पर संस्थानों को अनुमति देती है तथा समय-समय पर उनका मूल्यांकन भी करती है। 
  • वस्तुतः लगातार कम प्रवेश, योग्य शिक्षकों की कमी या निर्धारित मानकों का पालन न करने पर एआईसीटीई प्रोग्रेसिव क्लोजर की प्रक्रिया अपनाती है। इसके तहत नए प्रवेश बंद कर दिए जाते हैं, जबकि पहले से अध्ययनरत छात्रों को पाठ्यक्रम पूरा करने की अनुमति दी जाती है।  

विस्तार से गुणवत्ता की ओर 

  • 1990 के दशक तक इंजीनियरिंग शिक्षा मुख्यतः आईआईटी, क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों (वर्तमान NIT), कुछ सरकारी कॉलेजों और सीमित निजी संस्थानों तक ही सीमित थी। सन् 2000 के दौरान वैश्विक आईटी उद्योग के विस्तार ने इस स्थिति को पूरी तरह बदल दिया। सॉफ्टवेयर पेशेवरों की बढ़ती मांग के कारण देशभर में हजारों नए इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए। 
  • साथ ही केंद्र सरकार ने नए आईआईटी और आईआईआईटी स्थापित किए तथा क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों को एनआईटी का दर्जा प्रदान किया। वर्तमान में देश में 23 आईआईटी, 31 एनआईटी और 25 आईआईआईटी सहित कुल 79 राष्ट्रीय महत्व के तकनीकी संस्थान हैं।
  • जब इंजीनियरिंग शिक्षा का विस्तार हो गया, तब सरकार का ध्यान गुणवत्ता सुधार की ओर गया। इसी उद्देश्य से नेशनल बोर्ड ऑफ एक्रेडिटेशन (NBA) ने परिणाम-आधारित मान्यता प्रणाली लागू की, जिसमें शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन सीखने के परिणामों और उद्योग की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। 

बदलती मांग और संकट 

  • एआई के तेजी से बढ़ते प्रभाव ने इंजीनियरिंग शिक्षा की दिशा बदल दी है। छात्रों का रुझान कंप्यूटर साइंस, एआई और डेटा साइंस जैसे विषयों की ओर बढ़ा है, जबकि मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल जैसी पारंपरिक शाखाओं में प्रवेश लगातार घटे हैं। 
  • इसी स्थिति को देखते हुए एआईसीटीई ने 2020 में नए इंजीनियरिंग कॉलेजों पर अस्थायी रोक लगाई थी, जिसे 2023 में हटा लिया गया। कोविड-19 के बाद परिषद ने नए पाठ्यक्रम शुरू करने और सीटें बढ़ाने के नियम भी सरल किए, जिससे प्रतिष्ठित संस्थानों ने लोकप्रिय शाखाओं में सीटें बढ़ा दीं। 
  • देश में स्नातक स्तर पर इंजीनियरिंग की लगभग 15 लाख सीटें स्वीकृत हैं, लेकिन आज भी कई संस्थानों, यहां तक कि कुछ एनआईटी और आईआईआईटी में भी सीटें खाली रह जाती हैं। पारंपरिक शाखाओं में 20 से 40 प्रतिशत तक सीटें रिक्त रहने से अनेक कॉलेज आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। 

आगे की दिशा 

  • इंजीनियरिंग शिक्षा को अब केवल डिग्री देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पाठ्यक्रमों को एआई, डेटा साइंस, साइबर सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स और सतत विकास जैसे नए क्षेत्रों के अनुरूप बनाया जाना होगा। साथ ही परियोजना आधारित शिक्षण, अनुसंधान, नवाचार, उद्यमिता, इंटर्नशिप और उद्योग-शिक्षा सहयोग को बढ़ावा देना होगा।
  • इसी प्रकार संस्थानों का मूल्यांकन केवल भवन और प्रयोगशालाओं के आधार पर नहीं, बल्कि रोजगार क्षमता, अनुसंधान, पेटेंट, स्टार्टअप और उद्योग से जुड़ाव जैसे परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। 

निष्कर्ष 

  • भारत के पास आईआईटी, एनआईटी और कुछ उत्कृष्ट संस्थानों के रूप में मजबूत आधार मौजूद है। अब आवश्यकता इस मॉडल को व्यापक इंजीनियरिंग शिक्षा प्रणाली तक पहुंचाने और लगातार कमजोर प्रदर्शन करने वाले संस्थानों में सुधार या चरणबद्ध रूप में प्रोग्रेसिव क्लोजर सुनिश्चित करने की है। भारत यदि एआई और उभरती प्रौद्योगिकियों के युग में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना चाहता है, तो उसकी सफलता इंजीनियरों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, कौशल और नवाचार क्षमता से तय होगी।

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