संदर्भ
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने वित्त वर्ष 2026–27 के लिए टाटा संस लिमिटेड को अपर लेयर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी-यूएल) के रूप में वर्गीकृत किया है। साथ ही, आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि एनबीएफसी के रूप में पंजीकरण निरस्त (डी-रजिस्ट्रेशन) कराने के लिए टाटा संस द्वारा दायर आवेदन अभी विचाराधीन है। इस निर्णय के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या स्केल बेस्ड रेगुलेशन (एसबीआर) के तहत टाटा संस को अनिवार्य रूप से शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना पड़ेगा।
एनबीएफसी-यूएल क्या है?
- अपर लेयर गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी-यूएल) वह श्रेणी है, जिसमें आरबीआई उन बड़े और प्रणालीगत दृष्टि से महत्वपूर्ण गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को शामिल करता है, जिनकी वित्तीय अस्थिरता पूरे वित्तीय तंत्र को प्रभावित कर सकती है।
- वर्तमान मानदंडों के अनुसार, जिन स्वतंत्र गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की कुल परिसंपत्तियां 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक होती हैं, उन्हें अपर लेयर श्रेणी में रखा जाता है। एक बार किसी संस्था को एनबीएफसी-यूएल घोषित कर दिया जाता है, तो परिसंपत्तियों में बाद में कमी आने पर भी वह कम-से-कम पांच वर्षों तक इसी श्रेणी के नियामकीय प्रावधानों के अधीन रहती है।
एनबीएफसी-यूएल पर लागू प्रमुख नियामकीय प्रावधान
एनबीएफसी-यूएल श्रेणी में आने वाली संस्थाओं पर सामान्य एनबीएफसी की तुलना में अधिक कठोर नियम लागू होते हैं। इनमें -
- उच्च पूंजी पर्याप्तता अनुपात बनाए रखना।
- कॉमन इक्विटी टियर-1 (सीईटी-1) पूंजी संबंधी मानकों का पालन करना।
- मजबूत कॉर्पोरेट प्रशासन व्यवस्था सुनिश्चित करना।
- निदेशक मंडल की अनिवार्य समितियों का गठन करना।
- अधिक प्रावधान आवश्यकताओं को पूरा करना।
- जोखिम आधारित पारिश्रमिक नीति अपनाना।
- अधिक नियामकीय प्रकटीकरण और पारदर्शिता बनाए रखना।
इसके अलावा, निजी क्षेत्र की एनबीएफसी-यूएल संस्थाओं को सामान्यतः वर्गीकरण के तीन वर्षों के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना आवश्यक होता है।
आरबीआई का निर्णय
- आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026–27 के लिए कुल 17 गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को अपर लेयर श्रेणी में शामिल किया है। इनमें टाटा कैपिटल, बजाज फाइनेंस, आदित्य बिड़ला कैपिटल, श्रीराम फाइनेंस, महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंशियल सर्विसेज, एलएंडटी फाइनेंस, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस और हुडको जैसी प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं।
- टाटा संस को भी एनबीएफसी-यूएल श्रेणी में शामिल किया गया है, हालांकि इसका अंतिम प्रभाव उसके पंजीकरण निरस्तीकरण आवेदन के निर्णय पर निर्भर करेगा।
- यदि आरबीआई टाटा संस के आवेदन को स्वीकार कर लेता है, तो कंपनी को अनिवार्य सूचीबद्धता से छूट मिल सकती है। वहीं, आवेदन अस्वीकार होने की स्थिति में उसे एनबीएफसी-यूएल के सभी नियामकीय नियमों का पालन करना होगा और निर्धारित समयसीमा में शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना पड़ेगा।
स्केल बेस्ड रेगुलेशन (एसबीआर) ढांचा
भारतीय रिज़र्व बैंक ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के आकार, जटिलता और प्रणालीगत महत्व के आधार पर उनके नियमन के लिए स्केल बेस्ड रेगुलेशन (एसबीआर) ढांचा लागू किया है। इसके अंतर्गत एनबीएफसी को चार स्तरों में बांटा गया है -
- बेस लेयर (एनबीएफसी-बीएल): छोटे एनबीएफसी, जिन पर सामान्य नियामकीय प्रावधान लागू होते हैं।
- मिडिल लेयर (एनबीएफसी-एमएल): बड़े और महत्वपूर्ण एनबीएफसी।
- अपर लेयर (एनबीएफसी-यूएल): प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण एनबीएफसी, जिन पर बैंक जैसे कठोर नियम लागू होते हैं।
- टॉप लेयर (एनबीएफसी-टीएल): अत्यधिक प्रणालीगत जोखिम वाले एनबीएफसी के लिए आरक्षित श्रेणी।
वर्ष 2026–27 के लिए आरबीआई ने वर्गीकरण मानदंड को सरल बनाते हुए 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक परिसंपत्तियों वाले एनबीएफसी को अपर लेयर श्रेणी में शामिल करने का प्रावधान किया है।
टाटा संस की सूचीबद्धता को लेकर विवाद
टाटा संस ने वर्ष 2024 में अपनी सार्वजनिक उधारियां चुका दी थीं, लेकिन आरबीआई अभी भी इसे अप्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक निधियों से जुड़ी संस्था मानता है। इसके प्रमुख कारण हैं -
- टाटा स्टील, टाटा पावर और टाटा केमिकल्स जैसी सूचीबद्ध कंपनियों की टाटा संस में हिस्सेदारी।
- कंपनी की परिसंपत्तियों का 1 लाख करोड़ रुपये की सीमा से अधिक होना।
- टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी के रूप में इसकी भूमिका।
सूचीबद्धता के विरोध में तर्क
कुछ ट्रस्टी, जिनमें नोएल टाटा भी शामिल हैं, का मानना है कि -
- टाटा ट्रस्ट्स का नियंत्रण और प्रभाव बनाए रखा जाना चाहिए।
- शेयर बाजार में सूचीबद्धता से पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
- वर्तमान प्रवर्तक नियंत्रण में बदलाव नहीं होना चाहिए।
सूचीबद्धता के समर्थन में तर्क
कुछ ट्रस्टी तथा लगभग 18 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पालोनजी समूह सूचीबद्धता का समर्थन करता है। उनके अनुसार -
- इससे अल्पांश शेयरधारकों के लिए मूल्य सृजन होगा।
- पारदर्शिता और कॉर्पोरेट प्रशासन में सुधार आएगा।
- भविष्य में पूंजी जुटाना आसान होगा।
- नियामकीय निगरानी और बाजार अनुशासन मजबूत होगा।
एनबीएफसी-यूएल वर्गीकरण का महत्व
- एनबीएफसी-यूएल व्यवस्था भारतीय वित्तीय प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे बड़े और प्रणालीगत रूप से महत्वपूर्ण गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों की निगरानी मजबूत होती है तथा उनसे उत्पन्न होने वाले वित्तीय जोखिमों को कम करने में सहायता मिलती है।
- यह व्यवस्था कॉर्पोरेट प्रशासन, पारदर्शिता और निवेशकों के विश्वास को बढ़ावा देती है। साथ ही, यह आरबीआई के जोखिम आधारित नियमन को दर्शाती है, जिसमें संस्थाओं का नियमन उनके आकार, जोखिम और वित्तीय महत्व के आधार पर किया जाता है।
- भारत के वित्तीय क्षेत्र में एनबीएफसी की बढ़ती भूमिका को देखते हुए यह ढांचा ऋण वितरण व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।