भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था की रीढ़ यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) है, जिसने देश में तेज़, सुरक्षित और निःशुल्क डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा दिया है। इसी बीच केंद्र सरकार ने कराधान एवं अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन का प्रस्ताव रखा है, जिससे यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
हालाँकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह शुल्क केवल व्यापारियों पर लागू होगा, उपभोक्ताओं पर नहीं। फिर भी यह प्रस्ताव केवल डिजिटल भुगतान की लागत का नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल भुगतान नीति, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक व्यापारिक दबावों के बीच संतुलन का भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है।
एमडीआर क्या है?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वह सेवा शुल्क है, जो बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता व्यापारियों से डिजिटल भुगतान के प्रसंस्करण के बदले लेते हैं।
यह शुल्क भुगतान अवसंरचना, सर्वर, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकथाम, लेनदेन निपटान तथा तकनीकी रखरखाव जैसी सेवाओं की लागत को वहन करने के लिए लिया जाता है।
एमडीआर की आवश्यकता क्यों?
जनवरी 2020 से यूपीआई और रुपे लेनदेन पर एमडीआर समाप्त होने के बाद सरकार बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को अनुदान के माध्यम से क्षतिपूर्ति करती रही है। लेकिन यूपीआई लेनदेन में तेज़ वृद्धि के साथ भुगतान अवसंरचना, साइबर सुरक्षा और तकनीकी रखरखाव की लागत भी लगातार बढ़ी है, जबकि सरकारी सहायता पर्याप्त नहीं रही। इसी कारण एमडीआर को पुनः लागू करने पर विचार किया जा रहा है।
प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार 0.3–0.5% एमडीआर केवल ₹2,000 से अधिक के लेनदेन और बड़े कारोबार वाले व्यापारियों पर लागू होगा। छोटे दुकानदार, सामान्य उपभोक्ता तथा व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) लेनदेन इससे प्रभावित नहीं होंगे, इसलिए इसे उपभोक्ताओं पर लगाया गया नया कर नहीं माना जा सकता।
आर्थिक विवशता और भुगतान प्रणाली की स्थिरता
डिजिटल भुगतान प्रणाली का संचालन पूरी तरह निःशुल्क नहीं होता। इसके लिए अत्याधुनिक सर्वर, निरंतर तकनीकी उन्नयन, साइबर सुरक्षा, जोखिम प्रबंधन तथा त्वरित निपटान जैसी व्यवस्थाओं पर भारी निवेश करना पड़ता है। यदि इन सेवाओं की लागत का कोई स्थायी स्रोत नहीं होगा, तो भविष्य में इस विशाल भुगतान तंत्र की गुणवत्ता और विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी संकेत दिया है कि इस पूरी व्यवस्था की लागत अंततः किसी-न-किसी पक्ष अर्थात सरकार, व्यापारी अथवा भविष्य में उपभोक्ता को वहन करनी ही होगी। इसलिए एमडीआर का प्रश्न केवल शुल्क लगाने का नहीं, बल्कि डिजिटल भुगतान प्रणाली की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने का भी है।
अमेरिकी व्यापारिक दबाव
एमडीआर प्रस्ताव को भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताओं के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। मार्च 2026 में संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत की डिजिटल भुगतान नीतियों को अमेरिकी भुगतान कंपनियों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा वाला बताते हुए आपत्ति जताई थी। उसका तर्क था कि यूपीआई, रुपे और शून्य एमडीआर नीति से वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी कंपनियों के हित प्रभावित हुए हैं।
यूएसटीआर ने एनपीसीआई की 30% बाजार हिस्सेदारी सीमा पर भी सवाल उठाए। हालांकि, वर्तमान में अमेरिकी स्वामित्व से जुड़े फोनपे और गूगल पे मिलकर यूपीआई के 80% से अधिक लेनदेन का संचालन करते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि भारतीय डिजिटल भुगतान बाजार में उनकी मजबूत उपस्थिति पहले से ही बनी हुई है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भुगतान प्रणालियों की राजनीति
भारत अकेला ऐसा देश नहीं है, जहाँ घरेलू भुगतान प्रणाली को लेकर अमेरिका ने आपत्तियाँ उठाई हों। ब्राज़ील की Pix, चीन की China UnionPay, वियतनाम की NAPAS, तुर्की की Troy तथा इंडोनेशिया सहित कई देशों की स्थानीय भुगतान व्यवस्थाएँ भी अमेरिकी व्यापारिक आलोचना का विषय रही हैं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि डिजिटल भुगतान अब केवल तकनीकी सुविधा नहीं रह गया है, बल्कि आर्थिक प्रभुत्व, वित्तीय संप्रभुता और वैश्विक व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। जिस देश का भुगतान नेटवर्क जितना अधिक प्रभावी होगा, उसका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी उतना ही व्यापक होगा।
भारत की बदलती व्यापारिक रणनीति
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को सुदृढ़ बनाने के लिए डिजिटल क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। विदेशी कंपनियों को भारत में डेटा सेंटर स्थापित करने पर 2047 तक कर अवकाश प्रदान करना तथा 6 प्रतिशत समानीकरण उपकर (जिसे सामान्यतः 'गूगल टैक्स' कहा जाता था) को समाप्त करना इसी दिशा के महत्वपूर्ण कदम रहे हैं।
ऐसे में यूपीआई पर एमडीआर लागू करने का प्रस्ताव भी कुछ विश्लेषकों को भारत की व्यापक व्यापारिक रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। हालांकि सरकार ने अब तक इसे केवल भुगतान प्रणाली की वित्तीय आवश्यकताओं से जोड़कर ही प्रस्तुत किया है।
निष्कर्ष
यूपीआई पर एमडीआर लागू करने का प्रस्ताव केवल एक तकनीकी या राजकोषीय सुधार नहीं है, बल्कि यह भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था, वित्तीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति तीनों के संगम पर खड़ा एक महत्वपूर्ण विषय है।
एक ओर डिजिटल भुगतान व्यवस्था को दीर्घकाल तक टिकाऊ बनाए रखने के लिए वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर भारत को अपनी डिजिटल संप्रभुता और वैश्विक व्यापारिक प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन भी बनाए रखना होगा।