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आस्था और पर्यावरण का क्षरण

संदर्भ  

  • हाल ही में सीहोर जिले के पातालेश्वर महादेव मंदिर में आयोजित 21 दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का समापन 8 अप्रैल को एक विवाद के साथ हुआ। यहाँ संत शिवानंद महाराज के सानिध्य में श्रद्धा के नाम पर 11,000 लीटर दूध नर्मदा नदी में प्रवाहित कर दिया गया। आयोजकों ने इसे नदी शुद्धिकरण और परिक्रमा वासियों के आशीर्वाद के लिए किया गया अर्पण बताया, लेकिन नदी में दूध बहाते टैंकरों के दृश्यों ने धार्मिक विश्वास और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। 

सामाजिक और पोषण संबंधी विरोधाभास 

यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब मध्य प्रदेश कुपोषण जैसी गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। सरकार ने बच्चों के पोषण के लिए 700 करोड़ की यशोदा दुग्ध आपूर्ति योजना (2026-27) शुरू की है। 

  • विशेषज्ञों का तर्क: नर्मदा में बहाए गए 11,000 लीटर दूध से 44,000 गिलास दूध तैयार किया जा सकता था। यह मात्रा 2,200 बच्चों को 20 दिनों तक या 10,000 बच्चों को एक सप्ताह तक पूरक आहार प्रदान करने के लिए पर्याप्त थी।

ये भी जाने 

यशोदा दुग्ध आपूर्ति योजना (2026-27) के बारे में  

  • मध्य प्रदेश ने बाल कुपोषण से निपटने और राज्य भर के बच्चों के स्वस्थ और मजबूत विकास में सहायता करने के लिए बजट 2026-27 में यशोदा दुग्ध प्रदत्त योजना शुरू की है। 
  • इस योजना के तहत, सरकार आंगनवाड़ियों में बच्चों और सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में कक्षा 8 तक के छात्रों को टेट्रा पैक दूध उपलब्ध कराती है, जिससे उन्हें मजबूत हड्डियों, बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता और समग्र शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए आवश्यक दैनिक पोषण प्राप्त होता है।
  • इस योजना का लक्ष्य स्पष्ट है कि सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले किसी भी बच्चे को उचित पोषण से वंचित नहीं रहना चाहिए, और इस पहल का उद्देश्य इसे साकार करना है। 

योजना का लक्ष्य 

  • वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए, इस योजना का लक्ष्य मध्य प्रदेश भर में लगभग 80 लाख बच्चों तक पहुंचना है। सरकार ने पांच वर्षों में कुल 6,600 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जिसमें से अकेले चालू बजट में 700 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। 

जलीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव 

सांस्कृतिक रूप से दूध को शुद्ध माना जाता है, परंतु विज्ञान के अनुसार जलीय वातावरण में इसका प्रभाव घरेलू सीवेज से भी अधिक घातक हो सकता है। 

  • बीओडी (BOD) में वृद्धि : डेयरी अपशिष्ट में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) का स्तर बहुत अधिक होता है। जब भारी मात्रा में जैविक पदार्थ नदी में मिलते हैं, तो सूक्ष्मजीव उन्हें तोड़ने के लिए पानी की ऑक्सीजन का तेजी से उपयोग करते हैं। 
  • जलीय जीवन पर संकट : घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) कम होने से मछलियाँ और अन्य जलीय जीव दम घुटने के कारण मरने लगते हैं। 
  • पोषक तत्वों की अधिकता : दूध और तेल जैसे पदार्थों से पानी में पोषक तत्वों की मात्रा अनियंत्रित हो जाती है, जिससे एल्गल ब्लूम (Algal Bloom) यानी शैवाल का अत्यधिक प्रसार होता है, जो जल की गुणवत्ता को पूरी तरह नष्ट कर देता है। 

राष्ट्रीय नदी प्रदूषण की स्थिति 

सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के 2025 के आंकड़े चिंताजनक हैं : 

  • देश की 271 नदियों के 296 खंड अत्यधिक प्रदूषित हैं।
  • दिल्ली में यमुना का बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) स्तर 83 मिलीग्राम/लीटर तक पहुंच गया है, जो सुरक्षित सीमा (3 मिलीग्राम/लीटर) से लगभग 27 गुना अधिक है। नदी के ये हिस्से अब जैविक रूप से मृत माने जाते हैं। 
  • कुंभ, छठ और विसर्जन जैसे आयोजनों के बाद भारी धातुओं और ठोस अपशिष्ट में अस्वीकार्य वृद्धि दर्ज की गई है।  

कानूनी प्रावधान और संवैधानिक संतुलन 

भारतीय न्यायपालिका ने हमेशा स्पष्ट किया है कि पर्यावरण संरक्षण एक बाध्यकारी दायित्व है।

  • संवैधानिक आधार : संविधान का अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार) और जल अधिनियम, 1974 प्रदूषण फैलाने वाली किसी भी गतिविधि को प्रतिबंधित करते हैं।
  • धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा : अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। इसे जनस्वास्थ्य और नैतिकता के आधार पर विनियमित किया जा सकता है।  
  • न्यायिक सिद्धांत : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे (Polluter Pays Principle) और एहतियाती सिद्धांत के आधार पर काम करता है। हालांकि, दूध या तेल जैसे दैनिक अर्पणों को स्पष्ट रूप से विनियमित करने के लिए अभी भी ठोस राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का अभाव है।  

समाधान 

  • विशेषज्ञों का तर्क है कि वाराणसी जैसे तीर्थस्थलों पर यदि प्रत्येक व्यक्ति मात्र 5 मिलीलीटर दूध भी चढ़ाता है, तो प्रतिदिन 1,250 लीटर दूध नदी में मिल जाता है। व्यस्त दिनों में यह मात्रा 3,500 लीटर तक पहुँच जाती है।
  • वस्तुतः केवल प्रति व्यक्ति सीमा तय करना प्रभावी नहीं होगा। इसके लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है :
    • नदियों के बजाय विशेष कुंडों या पात्रों में अर्पण की व्यवस्था।
    • चढ़ाए गए फूलों और जैविक कचरे के खाद बनाने की प्रक्रिया।
    • यह समझाना आवश्यक है कि आस्था का प्रदर्शन उन नदियों के विनाश की कीमत पर नहीं होना चाहिए जिन्हें हम मां का दर्जा देते हैं।

वस्तुतः यह बहस आस्था को रोकने के बारे में नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं को पारिस्थितिक सीमाओं के भीतर पुनः परिभाषित करने के बारे में है।

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