संदर्भ
हाल ही में, इसरो (ISRO) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अध्ययन ने हिमालयी क्षेत्रों में उभरते क्रायोस्फेरिक खतरों पर महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की है। यह शोध नेचर पार्टनर जर्नल्स नेचुरल हैज़र्ड्स (npj Natural Hazards) में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में अगस्त 2025 को धराली गाँव में आई फ्लैश फ्लड (Flash Flood) की घटना का विश्लेषण किया गया है जिसमें छह लोगों की मौत हो गई थी। इस अध्ययन का उद्देश्य इस घटना के कारणों को समझना तथा भविष्य में ऐसी आपदाओं के लिए बेहतर चेतावनी प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता को रेखांकित करना है।
अध्ययन का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
- वैज्ञानिकों के अनुसार, धराली के ऊपर स्थित श्रीकांत ग्लेशियर (Srikanta Glacier) पर एक आइस पैच के ढहने से यह फ्लैश फ्लड उत्पन्न हुई। शोध बताता है कि यह घटना हिमालय में तेजी से हो रहे ग्लेशियरों के पिघलने (Deglaciation) से जुड़ी है। तापमान वृद्धि के कारण ग्लेशियरों की सतह पर मौजूद मौसमी बर्फ एवं फ़र्न (Firn) की परत पतली हो रही है जिसके परिणामस्वरूप कई स्थानों पर अनावृत बर्फ के पैच (Exposed Ice Patches) दिखाई देने लगे हैं।
- ये अनावृत बर्फ के पैच अपेक्षाकृत अस्थिर होते हैं और तापमान या वर्षा में बदलाव के प्रति शीघ्र प्रतिक्रिया देते हैं। ऐसी स्थिति में इनके टूटने या ढहने की संभावना बढ़ जाती है जिससे फ़्लैश फ्लड जैसी आपदाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
निवेशन प्रक्रिया और उसका महत्व
- अध्ययन के अनुसार, यह फ्लैश फ्लड निवेशन (Nivation) क्षेत्र में आइस पैच के अचानक टूटने से शुरू हुई। निवेशन वह प्रक्रिया है जिसमें बर्फ के नीचे और उसके आसपास की भूमि का धीरे-धीरे क्षरण होता है। यह प्रक्रिया मुख्यतः जमने और पिघलने के चक्र (Freezing–thawing) के कारण होती है।
- इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप निवेशन होलो (Nivation Hollow) बनते हैं जो समय के साथ अधिक गहरे हो जाते हैं क्योंकि बर्फ लगातार उसी स्थान पर जमा होती रहती है। ऐसे क्षेत्र भू-आकृतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील होते हैं और अचानक अस्थिरता उत्पन्न होने की संभावना अधिक रहती है।
अध्ययन क्षेत्र और भौगोलिक विशेषताएँ
- यह अध्ययन क्षेत्र उत्तरकाशी जिले में स्थित ऊपरी भागीरथी नदी बेसिन में आता है। यहाँ से निकलने वाली खीर गाड़ (या खीर गंगा) धारा श्रीकांत ग्लेशियर से उत्पन्न होकर धराली गाँव से गुजरती है और आगे जाकर भागीरथी नदी में मिल जाती है।
- यह धारा गांव को दो हिस्सों में विभाजित करती है जिससे यहाँ फ़्लैश फ्लड का जोखिम बढ़ जाता है। धराली लगभग 2650–2700 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील माना जाता है।
क्षेत्र में पूर्व की चरम घटनाएँ
- इस क्षेत्र में पहले भी कई प्राकृतिक आपदाएँ हो चुकी हैं। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2013 की उत्तर भारत में बाढ़ के दौरान बड़े पैमाने पर भूस्खलन और भारी चट्टानों के गिरने की घटनाएँ सामने आई थीं।
- इसी प्रकार 2021 के चमोली आपदा ने भी यह स्पष्ट किया कि ग्लेशियर पिघलने वाले क्षेत्रों में क्रायोस्फेरिक अस्थिरता गंभीर आपदाओं को जन्म दे सकती है। ये घटनाएँ इस बात का संकेत हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तेजी से दिखाई दे रहे हैं।
सैटेलाइट अवलोकन और प्रारंभिक चेतावनी
- अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट चित्रों, उच्च-रिज़ॉल्यूशन स्थलाकृतिक विश्लेषण और दृश्य रिकॉर्ड की सहायता से घटना के पूरे क्रम को पुनर्निर्मित किया। सैटेलाइट चित्रों में घटना से पहले उत्तर एवं उत्तर-पूर्व दिशा की ढलानों पर अनावृत बर्फ के पैच स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे।
- यह संकेत था कि वहाँ मौसमी बर्फ और फ़र्न की परत पतली हो चुकी थी। इस प्रकार के संकेतों की पहचान करके संभावित आपदाओं के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) विकसित किए जा सकते हैं।
ग्लेशियर से जुड़े उभरते खतरे
- अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि हिमालय में ग्लेशियरों से उत्पन्न खतरों के मूल्यांकन में केवल ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) पर ध्यान केंद्रित करना पर्याप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त अनावृत बर्फ के पैच, निवेशन होलो और अन्य छोटी क्रायोस्फेरिक अस्थिरताएँ भी गंभीर खतरे पैदा कर सकती हैं।
- जब ऐसे आइस पैच अचानक टूटते हैं तो बर्फ, पिघला पानी और मलबा तेजी से नीचे की ओर बहता है और फ़्लैश फ्लड जैसी आपदाएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
निष्कर्ष
- अध्ययन के अनुसार निवेशन होलो जैसे भू-आकृतिक क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील होते हैं, जहां क्रायोस्फेरिक अस्थिरता की संभावना अधिक होती है। हिमालय में ऐसे कई स्थान मौजूद हैं, इसलिए इनकी सिस्टमेटिक पहचान, सैटेलाइट आधारित निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों का हिस्सा बनाना आवश्यक है।
- इस प्रकार, धराली फ्लैश फ्लड की घटना यह दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण हिमालय में नए प्रकार के प्राकृतिक खतरे उभर रहे हैं। इन खतरों से निपटने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, सतत निगरानी और प्रभावी आपदा प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं।