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पीसीपीएनडीटी एक्ट में सुधार का समय

संदर्भ 

  • असम के एक सुदूर गांव की 45 वर्षीय महिला को अपने स्तन में एक गांठ महसूस होती है। इलाज के लिए निकटतम कैंसर अस्पताल दो घंटे की दूरी पर था, जहाँ जाने से वह मना कर देती है। जब वह अंततः अस्पताल पहुँचती है, तब तक कैंसर अंतिम चरण में पहुँच चुका होता है और छह महीने बाद उसकी मृत्यु हो जाती है। यद्यपि यदि किसी स्थानीय स्वास्थ्य शिविर में एक छोटी सी पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीन होती, तो उसका जीवन बच सकता था। 
  • लेकिन विडंबना देखिए भारतीय कानून के मुताबिक किसी पंजीकृत अस्पताल या केंद्र से बाहर अल्ट्रासाउंड मशीन का उपयोग करना एक गंभीर अपराध है, जिसमें कम से कम तीन महीने की गैर-जमानती जेल की सजा हो सकती है। यह घटना इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे जीवन बचाने वाली तकनीक और पुराने नियमों के बीच एक गहरी खाई बन चुकी है।

पीसीपीएनडीटी (PCPNDT) एक्ट

  • पूर्व-गर्भाधान एवं प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीक (PCPNDT) अधिनियम वर्ष 1994 में भारत में बाल लिंगानुपात में आई गंभीर गिरावट जैसी जनसांख्यिकीय एवं नैतिक चुनौती का सामना करने के उद्देश्य से लागू किया गया था।
  • इस गिरावट का प्रमुख कारण प्रसवपूर्व भ्रूण लिंग निर्धारण के लिए अल्ट्रासोनोग्राफी का दुरुपयोग तथा उसके परिणामस्वरूप कन्या भ्रूणों का चयनात्मक गर्भपात था।
  • 1980 के दशक में इमेजिंग तकनीकों की बढ़ती उपलब्धता के साथ यह समस्या और अधिक गंभीर रूप धारण कर गई।
  • इस प्रकार, यह अधिनियम केवल चिकित्सा क्षेत्र को विनियमित करने वाला कानून नहीं था, बल्कि समाज में गहराई तक व्याप्त लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध एक सशक्त कानूनी हस्तक्षेप भी था।

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान 

  • सभी आनुवंशिक (Genetic) क्लीनिक, अल्ट्रासाउंड केंद्रों तथा प्रयोगशालाओं का जिला प्राधिकरण के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
  • किसी भी परिस्थिति में भ्रूण का लिंग बताना या उससे संबंधित जानकारी साझा करना प्रतिबंधित है।
  • किसी स्वास्थ्य संस्थान के पंजीकरण से पूर्व अल्ट्रासाउंड मशीन की खरीद कानूनन अवैध मानी जाती है।
  • मशीन निर्माता के लिए खरीदार की पात्रता का सत्यापन करना तथा उससे यह लिखित आश्वासन प्राप्त करना अनिवार्य है कि मशीन का उपयोग भ्रूण लिंग निर्धारण हेतु नहीं किया जाएगा।
  • मशीन की स्थापना के बाद उसे केवल स्वीकृत स्थान पर ही स्थायी रूप से रखा जा सकता है। 
  • प्रत्येक अल्ट्रासाउंड परीक्षण के लिए रोगी-स्तर पर विस्तृत अभिलेख (Documentation) बनाए रखना अनिवार्य है।

अधिनियम का प्रभाव : उपलब्धियाँ एवं अनपेक्षित परिणाम 

उपलब्धियाँ:

  • अधिनियम के लागू होने के पश्चात भारत के जन्म के समय लिंगानुपात (Sex Ratio at Birth) में राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे सुधार दर्ज किया गया।
  • इस कानून ने कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध राज्य एवं समाज की प्रतिबद्धता को दर्शाने वाला एक प्रभावी नियामक ढाँचा स्थापित किया।

अनपेक्षित प्रतिकूल प्रभाव:

  • जिन परिवारों की पहली संतान लड़की थी, वे लिंग चयन का विकल्प समाप्त हो जाने के कारण पुत्र प्राप्ति के लिए अधिक संतानें पैदा करने लगे।
  • इसके परिणामस्वरूप पहली संतान के रूप में जन्मी लड़कियों की मृत्यु दर, पहली संतान लड़कों की तुलना में लगभग 25 प्रतिशत अधिक पाई गई। इसका संभावित कारण लड़कियों के स्वास्थ्य एवं पोषण पर अपेक्षाकृत कम निवेश था। 
  • ऐसी परिस्थितियों में परिवारों की प्रजनन दर बढ़ी, जिससे प्रत्येक बच्चे पर उपलब्ध संसाधन घट गए और शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में लैंगिक असमानताएँ और गहरी हो गईं। 

अवैध गतिविधियाँ अब भी जारी 

  • तीन दशक से अधिक समय तक कानूनी प्रतिबंध लागू रहने के बावजूद भ्रूण लिंग चयन की अवैध गतिविधियाँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
  • अक्टूबर 2025 में कर्नाटक में अधिकारियों ने एक संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया, जो पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड उपकरणों और अनौपचारिक सेवा प्रदाताओं के गुप्त नेटवर्क के माध्यम से अवैध रूप से भ्रूण का लिंग निर्धारण कर रहा था।
  • यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। यूनाइटेड किंगडम की विभिन्न रिपोर्टें बताती हैं कि भारतीय मूल के कुछ प्रवासी समुदायों में भी कठोर निगरानी व्यवस्था के बावजूद पुत्र-प्राथमिकता की प्रवृत्ति बनी हुई है।
  • इससे स्पष्ट होता है कि जहाँ लैंगिक पूर्वाग्रह सामाजिक संरचना में गहराई से समाया हुआ हो, वहाँ केवल कानूनी प्रतिबंध सामाजिक परिवर्तन सुनिश्चित नहीं कर सकते।

सुधार की आवश्यकता 

  • आज के समय में आधुनिक पोर्टेबल एवं हैंडहेल्ड अल्ट्रासाउंड उपकरण, जो सामान्यतः स्मार्टफोन या टैबलेट से जुड़े होते हैं, निदान सेवाओं को सीधे रोगियों के घरों और समुदायों तक पहुँचाना तकनीकी रूप से संभव बना चुके हैं।
  • यह सुविधा विशेष रूप से ग्रामीण भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ लगभग 70 प्रतिशत आबादी निवास करती है तथा विशेषज्ञ रेडियोलॉजिस्टों की उपलब्धता बेहद सीमित है। ऐसी तकनीक कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के प्रारंभिक निदान में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
  • हालाँकि, वर्तमान में पीसीपीएनडीटी अधिनियम के अंतर्गत समुदाय स्तर पर इन उपकरणों का उपयोग प्रतिबंधित है। 
  • उच्च-आवृत्ति (High-Frequency) वाले लीनियर प्रोब, जिनका उपयोग स्तन कैंसर जैसी सतही बीमारियों की पहचान के लिए किया जाता है, तकनीकी रूप से भ्रूण का लिंग निर्धारित करने योग्य इमेजिंग करने में सक्षम नहीं होते।
  • इसके बावजूद इन पर वही व्यापक प्रतिबंध लागू हैं, जो पारंपरिक अल्ट्रासाउंड मशीनों पर लागू किए गए हैं। मौजूदा कानून इस तकनीकी अंतर को स्वीकार नहीं करता।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की भूमिका

  • एआई-सक्षम (AI-enabled) अल्ट्रासाउंड तकनीक में हालिया प्रगति ने अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है।
  • एआई आधारित प्रणालियाँ अल्ट्रासाउंड छवियों के अधिग्रहण और उनके विश्लेषण में सहायता कर सकती हैं। कुछ प्रणालियाँ पैटर्न पहचान (Pattern Recognition) के आधार पर पूर्ण छवि को संग्रहित या प्रदर्शित किए बिना स्वतः निदान रिपोर्ट तैयार करने में भी सक्षम हैं।
  • इससे उद्देश्य-विशिष्ट तथा सुरक्षा-सुनिश्चित अल्ट्रासाउंड उपयोग का ऐसा मॉडल विकसित हो सकता है, जिसमें दुरुपयोग की संभावना काफी हद तक कम हो जाती है।
  • एक पायलट अध्ययन में यह पाया गया कि न्यूनतम प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्तियों द्वारा किए गए पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड, जब एआई आधारित विश्लेषण के साथ संयोजित किए गए, तो उन्होंने संदिग्ध स्तन घावों (Breast Lesions) की अत्यधिक सटीकता से पहचान की तथा सभी पुष्ट कैंसर मामलों को सही ढंग से चिन्हित किया।
  • इससे यह संभावना बनती है कि भविष्य में आशा (ASHA) कार्यकर्ता एवं सहायक नर्स एवं प्रसूति कार्यकर्ता (ANM) भी एआई-सहायता प्राप्त अल्ट्रासाउंड का प्रभावी उपयोग कर सकें।

आगे की राह 

  • भारत में कैंसर के बढ़ते बोझ और समुदाय-आधारित कैंसर स्क्रीनिंग की आवश्यकता को देखते हुए नियामक ढाँचे को तकनीकी प्रगति के अनुरूप अद्यतन करना तथा अल्ट्रासाउंड के विभिन्न उपयोगों के बीच स्पष्ट कानूनी भेद स्थापित करना आवश्यक है।
  • पीसीपीएनडीटी अधिनियम में संशोधन कर उच्च-आवृत्ति वाले लीनियर प्रोब के सामुदायिक उपयोग को वैध बनाया जा सकता है, क्योंकि इनका उपयोग भ्रूण का लिंग निर्धारित करने में संभव नहीं है।
  • साथ ही, एआई-सक्षम एवं सुरक्षा-संरक्षित (Safeguarded) यूएसजी प्रणालियों के लिए कानूनी प्रावधान जोड़े जाने चाहिए, ताकि किसी भी परिस्थिति में भ्रूण के लिंग का निर्धारण या उसका प्रकटीकरण तकनीकी रूप से असंभव बनाया जा सके।
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