संदर्भ
- हाल ही में जम्मू स्थित राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत ने पहलगाम आतंकी हमले की जांच के क्रम में प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के पाकिस्तान स्थित सरगना हाफिज सईद के विरुद्ध गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया है।
- चूँकि अभियुक्त के भारतीय न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने की संभावना अत्यंत न्यूनतम है, इसलिए एनआईए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 356 के अंतर्गत उसकी अनुपस्थिति में मुकदमा (Trial in Absentia) चलाने का अनुरोध कर सकती है। यह प्रावधान पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 की तुलना में एक महत्त्वपूर्ण विधिक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है।
प्रमुख बिंदु
- यह आदेश एनआईए द्वारा दायर पूरक आरोपपत्र के आधार पर पारित किया गया। आरोपपत्र में हाफिज सईद को न केवल लश्कर-ए-तैयबा, बल्कि उसके सहयोगी संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) का प्रमुख बताते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 तथा गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत अभियुक्त बनाया गया है।
- आरोपों में भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने, सीमा-पार आतंकवादी षड्यंत्र रचने तथा आतंकी गतिविधियों के संचालन से संबंधित अपराध भी सम्मिलित हैं।
अनुपस्थिति में मुकदमा (Trial in Absentia) क्या है ?
- अनुपस्थिति में मुकदमा वह आपराधिक न्यायिक प्रक्रिया है, जिसमें अभियुक्त की शारीरिक उपस्थिति के बिना न्यायालय मुकदमे की कार्यवाही संचालित करता है तथा साक्ष्यों के आधार पर निर्णय प्रदान करता है।
- बीएनएसएस की धारा 356 के तहत यदि किसी व्यक्ति को घोषित अपराधी (Proclaimed Offender) घोषित किया जा चुका है और वह न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिए फरार हो जाता है तथा उसकी शीघ्र गिरफ्तारी की संभावना नहीं होती, तो न्यायालय उसकी अनुपस्थिति को न्यायालय में उपस्थित होने के अधिकार का त्याग मान सकता है।
- ऐसी स्थिति में न्यायालय अपने कारण लिखित रूप में दर्ज करते हुए अभियुक्त की अनुपस्थिति में ही जांच, मुकदमा और अंतिम निर्णय की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।
पूर्ववर्ती व्यवस्था: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की सीमाएँ
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 में अभियुक्त की अनुपस्थिति से संबंधित कुछ प्रावधान अवश्य थे, किंतु वे पूर्ण अनुपस्थिति में विचारण की अनुमति नहीं देते थे।
- धारा 82 के अंतर्गत फरार अभियुक्त के विरुद्ध उद्घोषणा जारी की जा सकती थी तथा उसे घोषित अपराधी घोषित किया जा सकता था।
- धारा 83 के अंतर्गत उसकी संपत्ति कुर्क की जा सकती थी।
- धारा 299 न्यायालय को फरार अभियुक्त की अनुपस्थिति में अभियोजन पक्ष के साक्ष्य दर्ज करने का अधिकार प्रदान करती थी, यदि उसकी शीघ्र गिरफ्तारी की संभावना न हो।
- धारा 317 के अंतर्गत न्यायालय कुछ परिस्थितियों में अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट प्रदान कर सकता था।
हालाँकि इन प्रावधानों के बावजूद संपूर्ण मुकदमे का संचालन अभियुक्त की अनुपस्थिति में संभव नहीं था। फलस्वरूप अनेक गंभीर आपराधिक मामलों में न्यायिक प्रक्रिया वर्षों तक लंबित रहती थी और अभियुक्त की गिरफ्तारी तक अंतिम निर्णय नहीं दिया जा सकता था। बीएनएसएस की धारा 356 इसी विधिक रिक्ति (Legal Vacuum) को दूर करने का प्रयास करती है।
यह प्रावधान किन मामलों में लागू होता है ?
- अनुपस्थिति में मुकदमे का प्रावधान प्रत्येक अभियुक्त पर लागू नहीं होता। यह केवल उन व्यक्तियों पर लागू होता है जिन्हें बीएनएसएस की धारा 84 के अंतर्गत घोषित अपराधी घोषित किया गया हो।
- धारा 84(4) के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध ऐसा अपराध आरोपित है, जो भारतीय न्याय संहिता अथवा किसी अन्य विधि के अधीन 10 वर्ष या उससे अधिक के कारावास, आजीवन कारावास अथवा मृत्युदंड से दंडनीय है, और उद्घोषणा जारी होने के बावजूद वह न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता, तो आवश्यक जांच के उपरांत न्यायालय उसे घोषित अपराधी घोषित कर सकता है।
- अतः अनुपस्थिति में मुकदमा केवल गंभीर प्रकृति के अपराधों तक सीमित है तथा सामान्य आपराधिक मामलों में इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता।
धारा 356 के अंतर्गत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय
- बीएनएसएस यह सुनिश्चित करता है कि अनुपस्थिति में मुकदमे की व्यवस्था अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार का अतिक्रमण न करे। इसके लिए अनेक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय निर्धारित किए गए हैं।
- सबसे पहले, अभियुक्त के विरुद्ध कम-से-कम 30 दिनों के अंतराल पर दो लगातार गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने आवश्यक हैं। इसके अतिरिक्त, अभियुक्त को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए कम-से-कम 30 दिन का समय देते हुए स्थानीय अथवा राष्ट्रीय समाचार पत्र में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित की जाती है। इस सूचना को अभियुक्त के अंतिम ज्ञात निवास स्थान पर भी चस्पा किया जाता है तथा उसके किसी निकट संबंधी या मित्र को भी मुकदमे की जानकारी दी जाती है।
- इसके अतिरिक्त, आरोप तय होने की तिथि से 90 दिन पूर्ण होने से पूर्व विचारण प्रारंभ नहीं किया जा सकता, ताकि अभियुक्त को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का पर्याप्त अवसर उपलब्ध हो।
- यदि अभियुक्त का कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं है, तो न्यायालय राज्य के व्यय पर उसके लिए विधिक सहायता अधिवक्ता (Legal Aid Counsel) नियुक्त करेगा। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की रक्षा करता है।
- मुकदमे के प्रारंभ से पूर्व दर्ज किए गए अभियोजन पक्ष के साक्ष्य अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जा सकते हैं। तथापि यदि अभियुक्त बाद में गिरफ्तार हो जाता है अथवा न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है, तो न्यायालय न्यायहित में गवाहों से पुनः जिरह (Cross-examination) की अनुमति प्रदान कर सकता है।
- इसके अतिरिक्त, जहाँ तक संभव हो, गवाहों के बयान तथा न्यायिक कार्यवाही का ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग के माध्यम से अभिलेखीकरण किया जाएगा। इसका उद्देश्य पारदर्शिता, साक्ष्य की विश्वसनीयता तथा भविष्य में न्यायिक पुनरीक्षण (Judicial Review) अथवा अपील की स्थिति में रिकॉर्ड की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
महत्त्व एवं चुनौतियाँ
- अनुपस्थिति में मुकदमे का प्रावधान उन मामलों में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जहाँ आतंकवाद, संगठित अपराध अथवा सीमा-पार अपराधों के अभियुक्त विदेशी क्षेत्राधिकार में शरण लेकर न्यायिक प्रक्रिया से बचते रहे हैं। यह व्यवस्था न्यायिक प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक लंबित रहने से रोकती है तथा दण्डहीनता (Impunity) की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने में सहायक हो सकती है।
- हालाँकि, इस व्यवस्था के समक्ष कुछ संवैधानिक एवं मानवाधिकार संबंधी प्रश्न भी उपस्थित होते हैं। अभियुक्त की अनुपस्थिति में विचारण के दौरान निष्पक्ष सुनवाई, प्रभावी विधिक प्रतिनिधित्व तथा साक्ष्यों की समुचित परीक्षा सुनिश्चित करना न्यायपालिका के लिए एक महत्त्वपूर्ण दायित्व रहेगा। इसलिए धारा 356 का प्रयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में तथा विधि द्वारा निर्धारित सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का कठोरता से पालन करते हुए ही किया जाना अपेक्षित है।
निष्कर्ष
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भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 356 भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रियात्मक सुधार का प्रतीक है। यह प्रावधान विशेष रूप से आतंकवाद, सीमा-पार अपराधों तथा संगठित अपराधों के उन मामलों में प्रभावी सिद्ध हो सकता है, जहाँ अभियुक्त न्यायालय की पहुँच से बाहर रहते हैं। साथ ही, विधि द्वारा निर्धारित सुरक्षा उपाय यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि न्याय की त्वरित प्राप्ति और अभियुक्त के मौलिक अधिकारों के बीच आवश्यक संतुलन बना रहे।