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जलकुंभी आक्रमण: एकजुट कार्रवाई की आवश्यकता

(प्रारंभिक परीक्षा: पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ

प्रत्येक मानसून में भारत की नदियों, झीलों एवं बैकवाटर (पश्चजल) में एक खतरा उभरता है, जो जलकुंभी के रूप में जाना जाता है। यह सुंदर दिखने वाला जलीय पौधा अपनी विनाशकारी प्रभाव के कारण भारत के जलाशयों और आजीविका को प्रभावित कर रहा है। केरल, विशेष रूप से वेम्बनाड झील और कुट्टनाड क्षेत्र, इस आक्रामक पौधे से सर्वाधिक प्रभावित है।

जलकुंभी (Hyacinth) के बारे में

  • उत्पत्ति : जलकुंभी को औपनिवेशिक काल में सजावटी पौधे के रूप में भारत लाया गया था।
  • वैज्ञानिक नाम : आइकोर्निया क्रैसिपेस (Eichhornia crassipes)
  • विशेषताएँ : इसमें कोमल बैंगनी पुष्प होते हैं और यह तेजी से बढ़ता है तथा जलाशयों को घेर लेता है।
  • प्रसार : यह पानी की सतह पर तैरता है और तेजी से फैलता है, जिससे जल प्रवाह एवं जैव-विविधता प्रभावित होती है।

हालिया मुद्दे के बारे में 

  • जलकुंभी, एक आक्रामक जलीय पौधे के रूप में भारत के जलाशयों को घेरकर पारिस्थितिकी तंत्र एवं आजीविका को नष्ट कर रहा है।
  • यह पौधा नदियों, झीलों एवं बैकवाटर को हरे रेगिस्तान में बदल देता है, जिससे मछुआरों, किसानों व पर्यटन पर निर्भर समुदायों को भारी नुकसान होता है।
  • अनुमान है कि देश भर में 2,00,000 हेक्टेयर से अधिक जलाशय इस पौधे से प्रभावित हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव

  • जैव विविधता पर प्रभाव: जलकुंभी सूर्य के प्रकाश और ऑक्सीजन को पानी की सतह तक पहुंचने से रोकता है, जिससे जलीय जीव-जंतु एवं वनस्पति नष्ट हो जाते हैं।
  • मत्स्य पालन : मछली की नर्सरी और मछलियों की प्रजातियां प्रभावित होती हैं, जिससे मछुआरों की आजीविका खतरे में पड़ती है।
  • कृषि: कुट्टनाड जैसे क्षेत्रों में सिंचाई चैनलों में अवरोध होने से धान की खेती प्रभावित होती है।
  • पर्यावरणीय खतरा: यह पौधा मीथेन गैस उत्सर्जित करता है जो कार्बन डाइऑक्साइड से 25 गुना अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
  • पर्यटन पर प्रभाव: वेम्बनाड झील जैसे पर्यटन स्थल प्रभावित हो रहे हैं, जिससे अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है।

सरकारी प्रयास

  • स्थानीय पहल: ओडिशा में महिला स्वयं सहायता समूह जलकुंभी से हस्तशिल्प, टोकरियां और फर्नीचर बना रहे हैं।
  • प्रयोग: असम और पश्चिम बंगाल में जलकुंभी से कागज व बायोगैस का उत्पादन किया जा रहा है।
  • जैन विश्वविद्यालय की पहल: कोच्चि में जैन विश्वविद्यालय ने ‘फ्यूचर केरल मिशन’ के तहत एक कार्यशाला आयोजित की, जिसमें जलकुंभी को टिकाऊ आजीविका के स्रोत के रूप में उपयोग करने पर चर्चा हुई।
  • जागरूकता अभियान: विश्वविद्यालय ने जागरूकता अभियान शुरू किया और एक चर्चा पत्र जारी करने की योजना बनाई है।

चुनौतियाँ

  • नीति की कमी: जलकुंभी प्रबंधन के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय नीति का अभाव है।
  • विभागीय समन्वय: कृषि, मत्स्य पालन, पर्यावरण और सिंचाई विभागों के बीच समन्वय की कमी से प्रयास बिखरे हुए हैं।
  • सीमित पैमाना: स्थानीय स्तर पर प्रयोग सफल हैं किंतु इन्हें बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए संसाधन और नीतिगत समर्थन की कमी है।
  • श्रम और तकनीक: केरल जैसे क्षेत्रों में श्रम की कमी के कारण यंत्रीकरण एवं वैज्ञानिक विधियों की आवश्यकता है।
  • जागरूकता का अभाव: स्थानीय समुदायों में जलकुंभी के खतरों और इसके उपयोग के बारे में जागरूकता की कमी है।

आगे की राह

  • राष्ट्रीय नीति: जलकुंभी प्रबंधन के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय नीति और क्षेत्र-विशिष्ट कार्यान्वयन रणनीतियों की आवश्यकता 
  • वैज्ञानिक विधि: वैज्ञानिक विधियों और यंत्रीकरण के माध्यम से जलकुंभी को हटाने के लिए समन्वित अभियान चलाना 
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी: मूल्य संवर्धन के लिए निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी को बढ़ावा देना
  • अनुसंधान और नवाचार: जलकुंभी से हस्तशिल्प, बायोफ्यूल और कम्पोस्ट जैसे उत्पादों पर शोध को बढ़ावा देना
  • जागरूकता अभियान: समुदायों को जलकुंभी के प्रबंधन और इसके उपयोग के लिए शिक्षित करना
  • पर्यावरण संरक्षण: जलवायु लचीलापन और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए नीतियां लागू करना
  • एकीकृत दृष्टिकोण: सरकार, समुदाय, उद्यमियों एवं शोधकर्ताओं के बीच एकजुट कार्रवाई की आवश्यकता
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