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पश्चिमी घाट पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र विवाद

संदर्भ 

  • भारत में पर्यावरणीय शासन से जुड़े सबसे जटिल और लंबे समय से चले आ रहे विवादों में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए) का प्रश्न प्रमुख है। जुलाई 2026 तक प्रभावी वर्तमान ईएसए अधिसूचना के बावजूद छह राज्यों और केंद्र सरकार के बीच अंतिम सीमांकन को लेकर सहमति नहीं बन सकी है। 
  • इस बीच, एक नई विशेषज्ञ समिति समाधान तलाशने में जुटी हुई है। यह पूरा विवाद केवल भूमि के सीमांकन का मुद्दा नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की व्यापक राष्ट्रीय चुनौती को भी प्रतिबिंबित करता है।

पश्चिमी घाट: भारत की पारिस्थितिकीय धरोहर 

  • भारत के पश्चिमी तट के समानांतर लगभग 1,500 किलोमीटर तक फैली पश्चिमी घाट पर्वतमाला देश की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक परिसंपत्तियों में से एक है। पारिस्थितिकीय दृष्टि से इसका महत्व हिमालय के बाद दूसरे स्थान पर माना जाता है। विश्व के आठ सर्वाधिक समृद्ध जैव-विविधता हॉटस्पॉट्स में शामिल यह क्षेत्र अनेक दुर्लभ और स्थानिक वनस्पति एवं जीव प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है। 
  • पश्चिमी घाट की भूमिका केवल जैव विविधता तक सीमित नहीं है। यह मानसूनी हवाओं को प्रभावित कर भारी वर्षा सुनिश्चित करता है तथा गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और पेरियार जैसी महत्वपूर्ण नदियों को जल उपलब्ध कराता है। परिणामस्वरूप, दक्षिण भारत की कृषि, पेयजल व्यवस्था और करोड़ों लोगों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस क्षेत्र पर निर्भर करती है।
  • विशेष तथ्य यह है कि यह क्षेत्र केवल प्राकृतिक संपदा से भरपूर ही नहीं, बल्कि मानव गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र है। काली मिर्च, इलायची, दालचीनी, कॉफी, आम और कटहल जैसी नकदी फसलों की खेती यहां बड़े पैमाने पर की जाती है। 
  • गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में फैला यह क्षेत्र पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता और मानवीय बसावट के अनूठे सह-अस्तित्व का उदाहरण है। यही विशेषता ईएसए विवाद को और अधिक जटिल बनाती है। 

ईएसए की अवधारणा और उसका उद्देश्य 

  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत केंद्र सरकार को ऐसे क्षेत्रों को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का अधिकार प्राप्त है, जहां प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता की रक्षा के लिए विशेष नियामक उपाय आवश्यक हों। 
  • ईएसए घोषित क्षेत्रों में खनन, पत्थर खनन, अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों की स्थापना, तापीय विद्युत संयंत्रों तथा बड़े निर्माण एवं टाउनशिप परियोजनाओं जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध या कड़ा नियमन लागू किया जाता है। 
  • इसका उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि पारिस्थितिकीय रूप से नाजुक क्षेत्रों को अपरिवर्तनीय क्षति से बचाना है। 

गाडगिल और कस्तूरीरंगन: दो दृष्टिकोण, एक उद्देश्य

पश्चिमी घाट संरक्षण के प्रश्न पर दो प्रमुख समितियों की सिफारिशें चर्चा के केंद्र में रही हैं।

गाडगिल समिति का दृष्टिकोण:

  • 2011 में पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाली पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। समिति ने पश्चिमी घाट के पूरे 1,29,037 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिकीय संवेदनशील घोषित करने तथा विकास गतिविधियों पर व्यापक नियंत्रण की अनुशंसा की। 
  • हालांकि, राज्य सरकारों और स्थानीय समुदायों ने इसे अत्यधिक कठोर और विकास-विरोधी बताते हुए व्यापक विरोध किया। उनका तर्क था कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। 

कस्तूरीरंगन समिति का संतुलित मॉडल:

  • गाडगिल रिपोर्ट पर उत्पन्न राजनीतिक और सामाजिक असहमति के बाद केंद्र सरकार ने के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कार्य समूह का गठन किया। इस समिति ने संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया। 
  • समिति ने पश्चिमी घाट के कुल 1,64,280 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का अध्ययन करते हुए पाया कि इसका लगभग 60 प्रतिशत भाग मानव उपयोग के अधीन है, जिसे उसने सांस्कृतिक परिदृश्य की संज्ञा दी। शेष 40 प्रतिशत क्षेत्र को प्राकृतिक परिदृश्य के रूप में वर्गीकृत किया गया, जो जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।  
  • समिति ने सुझाव दिया कि केवल लगभग 60,000 वर्ग किलोमीटर प्राकृतिक क्षेत्र को ईएसए घोषित किया जाए तथा सर्वाधिक पर्यावरण-हानिकारक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जाए। दिसंबर 2013 में केंद्र सरकार ने इस दृष्टिकोण को सिद्धांततः स्वीकार कर लिया।

एक दशक से जारी गतिरोध 

  • मार्च 2014 में पहली मसौदा ईएसए अधिसूचना जारी की गई, जिसमें प्रस्तावित क्षेत्रफल को घटाकर 56,825.7 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया। इसके बाद से मसौदा अधिसूचना कई बार संशोधित की जा चुकी है, किंतु अंतिम सहमति अब भी नहीं बन सकी है।
  • 31 जुलाई 2024 को जारी नवीनतम अधिसूचना जुलाई 2026 तक प्रभावी रहेगी। उल्लेखनीय है कि इस अधिसूचना में पहली बार राज्यवार और चरणबद्ध तरीके से ईएसए को अंतिम रूप देने का प्रावधान जोड़ा गया, जिससे उन राज्यों में प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके जहां सहमति बनने की संभावना अधिक है। 

राज्यों की आपत्तियां: संरक्षण से अधिक आजीविका की चिंता 

  • राज्यों का मुख्य तर्क आर्थिक गतिविधियों पर संभावित प्रतिबंधों को लेकर है। उन्हें आशंका है कि ईएसए लागू होने से उद्योग, खनन, निर्माण और अन्य विकास परियोजनाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। 
  • कर्नाटक ने कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों को लगभग पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है और वह सबसे अधिक विरोध करने वाले राज्यों में शामिल है। 
  • केरल अपने प्रस्तावित ईएसए क्षेत्र में और कटौती चाहता है। विशेष रूप से इडुक्की जिले तथा कार्डमम हिल्स क्षेत्र को बाहर रखने की मांग की जा रही है, क्योंकि वहाँ बागान और कृषि गतिविधियाँ बड़े पैमाने पर संचालित होती हैं।  
  • महाराष्ट्र ने भी सैकड़ों गांवों को ईएसए से बाहर रखने का प्रस्ताव रखा है। राज्य का तर्क है कि इनमें से कई गांव औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े हैं या प्रस्तावित संवेदनशील क्षेत्रों से भौगोलिक रूप से अलग स्थित हैं। 
  • गोवा, गुजरात और तमिलनाडु ने भी अपनी-अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं, हालांकि विवाद का केंद्र मुख्य रूप से केरल और कर्नाटक बने हुए हैं। 

नई विशेषज्ञ समिति और समाधान की संभावनाएं 

  • वर्ष 2022 में केंद्र सरकार ने पूर्व वन महानिदेशक संजय कुमार की अध्यक्षता में एक नई विशेषज्ञ समिति गठित की। इस समिति का कार्य राज्यों की आपत्तियों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए संरक्षण और विकास के बीच व्यवहारिक समाधान खोजना है।   
  • समिति राजस्व अभिलेखों, ग्राम-स्तरीय आंकड़ों तथा उपग्रह चित्रों के आधार पर वास्तविक स्थिति का आकलन कर रही है। साथ ही, यह उन राज्यों को वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन देने की संभावनाओं पर भी विचार कर रही है जो पश्चिमी घाट के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाएंगे। 
  • इसी संदर्भ में पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए भुगतान की अवधारणा भी महत्वपूर्ण हो गई है। इसके अंतर्गत राज्यों को उनके वनों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली पारिस्थितिकीय सेवाओं जैसे- स्वच्छ जल, कार्बन अवशोषण और जैव विविधता संरक्षण के लिए आर्थिक प्रतिपूर्ति प्रदान की जा सकती है।

निष्कर्ष 

  • पश्चिमी घाट ईएसए विवाद भारत के समक्ष उपस्थित उस व्यापक प्रश्न का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें आर्थिक विकास की आवश्यकताओं और पर्यावरणीय संरक्षण की अनिवार्यता के बीच संतुलन स्थापित करना है। 
  • हाल के वर्षों में भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाओं, विशेषकर 2018 और 2019 की केरल बाढ़, ने यह संकेत दिया है कि पारिस्थितिकीय क्षरण के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। दूसरी ओर, स्थानीय समुदाय अपनी आजीविका और विकास संबंधी चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहते।  
  • इस प्रकार पश्चिमी घाट का प्रश्न केवल पर्यावरणीय नीति का विषय नहीं है, बल्कि भारत की जलवायु रणनीति, आपदा प्रबंधन, जल सुरक्षा और सतत विकास की दिशा में उसकी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की भी परीक्षा है। 
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