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जॉन डो निषेधाज्ञा (John Doe Injunction)क्या है ?

चर्चा में क्यों ?

दिल्ली की साकेत जिला अदालत के जज सचिन मित्तल ने 24 जनवरी को एक YouTube चैनल द्वारा अपलोड किए गए वीडियो पर रोक लगा दी।

  • यह वीडियो स्वर्गीय आध्यात्मिक गुरु निर्मल सिंह महाराज (छतरपुर वाले गुरुजी) पर आरोप लगाता था।
  • वीडियो का शीर्षक था: “Jai Guruji — Fraud Baba”।
  • वीडियो में “फ्रॉड”, “ठगी”, “लूट” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।
  • गुरुजी आश्रम ट्रस्ट ने इसे मानहानिकारक (Defamatory) बताया।

ट्रस्ट ने कोर्ट से मांग की कि इस वीडियो को तुरंत हटाया जाए और आगे कोई भी इसे अपलोड या शेयर न कर सके। कोर्ट ने बिना दूसरी पार्टी की सुनवाई किए अस्थायी रोक (Ad-Interim Ex-Parte Injunction) लगाई 

प्रमुख बिन्दु :-

  • डिजिटल युग में इंटरनेट, सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म्स के कारण सूचना बहुत तेज़ी से फैलती है। 
  • जहाँ एक ओर यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूत करता है, वहीं दूसरी ओर कॉपीराइट उल्लंघन, मानहानि, फेक न्यूज और अवैध कंटेंट की समस्या भी बढ़ी है।
  • कई बार ऐसा होता है कि नुकसान पहुँचाने वाला व्यक्ति कौन है, यह पता ही नहीं चलता। ऐसे मामलों में अदालत जिस विशेष आदेश का उपयोग करती है, उसे जॉन डो निषेधाज्ञा (John Doe Injunction) कहा जाता है।

जॉन डो निषेधाज्ञा John Doe Injunction क्या होता है ?

जॉन डो निषेधाज्ञा John Doe Injunction एक ऐसा न्यायिक आदेश (Court Order) है जो:

  • ज्ञात व्यक्ति (Known Person)और अज्ञात व्यक्ति (Unknown Person)दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
  • जब अदालत को यह पता नहीं होता कि अपराध करने वाला व्यक्ति कौन है, तब वह “John Doe” (काल्पनिक नाम) के खिलाफ आदेश जारी करती है।
  • अतः जब दोषी की पहचान स्पष्ट न हो, लेकिन नुकसान निश्चित या संभावित हो तब अदालत अज्ञात लोगों के खिलाफ भी रोक लगा सकती है। इसे जॉन डो निषेधाज्ञा John Doe Injunction कहते हैं। 
  • भारत में इसे कई बार “Ashok Kumar Order” अशोक कुमार ऑर्डर  भी कहा जाता है।

जॉन डो John Doe Injunction का उद्देश्य

इस आदेश का मुख्य उद्देश्य होता है:

  • कॉपीराइट चोरी रोकना
  • मानहानिकारक कंटेंट को फैलने से रोकना
  •  फेक न्यूज और अफवाहों पर नियंत्रण
  • डिजिटल पायरेसी रोकना
  •  भविष्य में होने वाले नुकसान से पहले ही सुरक्षा

यह आदेश कब लगाया जाता है ?

John Doe Injunction तब लगाया जाता है जब:

  • अपराध करने वाले व्यक्ति की पहचान ज्ञात नहीं होती।
  • नुकसान तेजी से फैल सकता है (इंटरनेट, टीवी, सोशल मीडिया)।
  • बाद में नुकसान की भरपाई संभव नहीं होती।
  • तुरंत कार्रवाई आवश्यक होती है।

यह कैसे काम करता है ?

जब कोई व्यक्ति, संस्था या कंपनी कोर्ट में याचिका दायर करती है कि:

  • उनका अधिकार उल्लंघन हो रहा है
  • या उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच रहा है
  • और अपराधी की पहचान अज्ञात है

तो कोर्ट:

  • इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (ISP)
  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म
  • वेबसाइट्स
  • केबल ऑपरेटर्स

को आदेश देती है कि वे उस सामग्री को हटाएँ, ब्लॉक करें या प्रसारण रोकें।

उदाहरण से समझिए

उदाहरण 1: फिल्म पायरेसी

कोई फिल्म रिलीज होने वाली है। निर्माता को आशंका है कि फिल्म पायरेट वेबसाइट पर लीक हो सकती है। निर्माता कोर्ट से John Doe Injunction ले लेता है।

नतीजा:

  • सभी संदिग्ध वेबसाइट ब्लॉक हो जाती हैं।
  • कोई भी अज्ञात व्यक्ति फिल्म अपलोड नहीं कर सकता।

उदाहरण 2: मानहानि

किसी व्यक्ति के खिलाफ झूठा वीडियो वायरल होने लगता है। अपलोड करने वाला पता नहीं चलता। कोर्ट John Doe Injunction जारी कर देती है।

नतीजा:

  • वीडियो हर प्लेटफॉर्म से हटाया जाता है।
  • दोबारा अपलोड करना गैरकानूनी हो जाता है।

भारत में John Doe Injunction

भारत में इसका उपयोग विशेष रूप से:

  • फिल्मों की पायरेसी
  • IPL लाइव स्ट्रीमिंग
  • वेब सीरीज़ लीक
  • मानहानिकारक सोशल मीडिया कंटेंट में किया गया है।

प्रसिद्ध केस:

  • Singham
  • PK
  • Baahubali
  • IPL Broadcast Rights

कानूनी आधार

भारत में John Doe Injunction निम्न कानूनों पर आधारित है:

  • कॉपीराइट अधिनियम, 1957
  • सिविल प्रोसीजर कोड (CPC)
  • हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियाँ

फायदे

  • नुकसान होने से पहले रोक
  •  तेज़ और प्रभावी न्याय
  • कंटेंट क्रिएटर की सुरक्षा
  • डिजिटल अपराधों पर नियंत्रण

आलोचना और चुनौतियाँ

  • कई बार वैध वेबसाइट भी ब्लॉक हो जाती हैं।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
  •  ओवर-ब्लॉकिंग का खतरा रहता है।
  • पारदर्शिता की कमी की आलोचना होती है।

इसलिए अदालतें अब सीमित और संतुलित उपयोग पर ज़ोर देती हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जॉन डो निषेधाज्ञा (John Doe Injunction)

भारतीय संविधान:

  •  अनुच्छेद 19(1)(a) – बोलने की स्वतंत्रता
  • अनुच्छेद 19(2) – उचित प्रतिबंध

मानहानि, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता जैसे मामलों में अदालत रोक लगा सकती है।बोलने की आज़ादी है, लेकिन किसी की प्रतिष्ठा या अधिकार को नुकसान पहुँचाने की आज़ादी नहीं।

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