सिज़ोफ्रेनिया क्या है? मानसिक बीमारी जो सोच, व्यवहार और शरीर दोनों को प्रभावित करती है
चर्चा में क्यों ?
हाल ही में आधे मिलियन (5 लाख से अधिक) लोगों के मेडिकल डेटा के विश्लेषण से यह सामने आया है कि सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों में सामान्य जनसंख्या की तुलना में हड्डियों के कमजोर होने और फ्रैक्चर का खतरा कहीं अधिक होता है।
यह शोध यह दर्शाता है कि सिज़ोफ्रेनिया केवल मानसिक बीमारी नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर की सेहत को भी प्रभावित करता है।
सिज़ोफ्रेनिया क्या होता है ?
सिज़ोफ्रेनिया एक गंभीर और दीर्घकालिक मानसिक विकार है, जिसमें व्यक्ति की सोचने की क्षमता, वास्तविकता को समझने की शक्ति, भावनात्मक प्रतिक्रिया, व्यवहार और सामाजिक संबंधों में गंभीर गड़बड़ी आ जाती है।
इस रोग में व्यक्ति कल्पना और वास्तविकता के बीच अंतर नहीं कर पाता, जिससे उसका दैनिक जीवन, कामकाज और पारिवारिक संबंध प्रभावित हो जाते हैं।
सिज़ोफ्रेनिया के प्रमुख कारण
सिज़ोफ्रेनिया के पीछे कोई एक कारण नहीं होता, बल्कि कई जैविक और पर्यावरणीय कारक मिलकर इस बीमारी को जन्म देते हैं।
आनुवंशिक कारणों में यदि परिवार के किसी सदस्य को यह बीमारी रही हो तो जोखिम बढ़ जाता है।
मस्तिष्क के रसायनों जैसे डोपामिन और ग्लूटामेट के असंतुलन से भी यह रोग उत्पन्न हो सकता है।
गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, कुपोषण, बचपन का मानसिक आघात, नशीले पदार्थों का सेवन और अत्यधिक जीवन तनाव भी इस बीमारी को बढ़ावा दे सकते हैं।
सिज़ोफ्रेनिया के मुख्य लक्षण
सिज़ोफ्रेनिया के लक्षण तीन प्रमुख श्रेणियों में बाँटे जाते हैं।
सकारात्मक लक्षणों में मतिभ्रम शामिल है, जिसमें व्यक्ति ऐसी आवाज़ें सुनता है या दृश्य देखता है जो वास्तव में मौजूद नहीं होते। भ्रम की स्थिति में व्यक्ति झूठे विश्वास करने लगता है और उसकी सोच अव्यवस्थित हो जाती है।
नकारात्मक लक्षणों में भावनाओं की कमी, बोलने में रुचि कम होना, सामाजिक दूरी बनाना, आत्म-देखभाल में कमी और किसी भी काम के प्रति उत्साह का अभाव शामिल है।
संज्ञानात्मक लक्षणों में याददाश्त कमजोर होना, ध्यान केंद्रित न कर पाना, निर्णय लेने में कठिनाई और सीखने की क्षमता में गिरावट देखी जाती है।
आत्महत्या का बढ़ा हुआ जोखिम
सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों में आत्महत्या के विचार और प्रयास सामान्य लोगों की तुलना में कई गुना अधिक पाए जाते हैं।
इसलिए समय पर पहचान, भावनात्मक सहयोग और निरंतर चिकित्सा बेहद आवश्यक होती है।
बचपन और विकास से जुड़ा पहलू
इस बीमारी के लक्षण आमतौर पर किशोरावस्था के अंतिम चरण या युवावस्था में शुरू होते हैं, लेकिन कई बार इसके संकेत बचपन में ही दिखाई देने लगते हैं।
बच्चों में असामान्य व्यवहार, सामाजिक अलगाव, सीखने में कठिनाई और भावनात्मक अस्थिरता इसके शुरुआती संकेत हो सकते हैं।
यह मस्तिष्क के विकास में व्यवधान और प्रारंभिक जीवन के तनाव से जुड़ा माना जाता है।
नया शोध: सिज़ोफ्रेनिया और कमजोर हड्डियाँ
नवीन शोध में यह पाया गया है कि सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों में हड्डियों का घनत्व कम होता है, जिससे फ्रैक्चर की संभावना बढ़ जाती है।
इसका कारण शारीरिक गतिविधि की कमी, धूप में कम रहना, विटामिन डी की कमी, धूम्रपान, असंतुलित आहार और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव हो सकते हैं।
सिज़ोफ्रेनिया का उपचार और प्रबंधन
सिज़ोफ्रेनिया का पूर्ण इलाज फिलहाल उपलब्ध नहीं है, लेकिन सही उपचार से रोगी सामान्य जीवन जी सकता है।
उपचार में एंटी-साइकोटिक दवाइयाँ, मनोचिकित्सीय परामर्श, व्यवहार चिकित्सा, सामाजिक पुनर्वास और परिवार का सहयोग शामिल होता है।
अधिकांश मामलों में मरीज को जीवनभर इलाज जारी रखना पड़ता है।
सामाजिक चुनौतियाँ और जागरूकता की जरूरत
मानसिक रोगों को लेकर समाज में अभी भी भ्रांतियाँ और कलंक मौजूद हैं, जिससे मरीज इलाज लेने से हिचकिचाते हैं।
सही जानकारी, संवेदनशील व्यवहार और सरकारी स्वास्थ्य नीतियों से इस स्थिति को सुधारा जा सकता है।
निष्कर्ष
सिज़ोफ्रेनिया एक गंभीर लेकिन नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी है।
समय पर निदान, निरंतर इलाज, सकारात्मक सामाजिक वातावरण और स्वस्थ जीवनशैली से मरीज बेहतर जीवन जी सकता है।
नया शोध यह भी बताता है कि मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ शारीरिक स्वास्थ्य की निगरानी भी अत्यंत आवश्यक है।