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कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) क्या है ? उद्देश्य, भारत पर प्रभाव एवं चिंताएँ ,आलोचना और चुनौतियाँ

चर्चा में क्यों ?

  • यूरोपीय संघ (European Union – EU) ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के अपने “ग्रीन डील” (Green Deal) के तहत कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लागू करना शुरू किया है।
  • यह नीति उन देशों पर प्रभाव डालती है जो यूरोप को उच्च कार्बन उत्सर्जन वाले उत्पाद निर्यात करते हैं — जिनमें भारत भी शामिल है।

CBAM क्या है ?

  • CBAM एक कार्बन टैक्स जैसी व्यवस्था है, जो यूरोपीय संघ में आयात होने वाले उत्पादों पर लगाया जाएगा, ताकि उनके उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन की भरपाई की जा सके।
  • सरल शब्दों में — “यदि कोई वस्तु किसी देश में अधिक कार्बन उत्सर्जन के साथ तैयार हुई है, तो जब वह यूरोप में प्रवेश करेगी, उस पर अतिरिक्त शुल्क (कार्बन टैक्स) लगाया जाएगा।”

CBAM का उद्देश्य

  1. कार्बन लीक (Carbon Leakage) को रोकना — ताकि कंपनियाँ कम पर्यावरण मानकों वाले देशों में उत्पादन न ले जाएँ।
  2. न्यायपूर्ण प्रतिस्पर्धा (Fair Competition) यूरोप के उद्योग जो पहले से ही EU के सख्त “Emission Trading System (ETS)” का पालन करते हैं, उन्हें समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा मिले।
  3. वैश्विक हरित परिवर्तन को प्रोत्साहन — ताकि अन्य देश भी अपनी उत्पादन प्रक्रियाओं में कार्बन उत्सर्जन घटाएँ।

CBAM के तहत कौन से उत्पाद कवर हैं ?

प्रारंभिक चरण में (2023-2025 तक) निम्नलिखित क्षेत्रों को शामिल किया गया है:

  • इस्पात (Iron & Steel)
  • सीमेंट (Cement)
  • एल्यूमिनियम (Aluminium)
  • उर्वरक (Fertilizers)
  • बिजली (Electricity)
  • हाइड्रोजन (Hydrogen)

आगे चलकर अन्य उत्पादों (जैसे – रासायनिक, प्लास्टिक आदि) को भी शामिल किया जा सकता है।

CBAM का कार्यान्वयन चरण

चरण

अवधि

मुख्य बिंदु

संक्रमण काल (Transitional Phase)

अक्टूबर 2023 – दिसंबर 2025

केवल रिपोर्टिंग आवश्यक — निर्यातकों को अपने उत्पाद के कार्बन उत्सर्जन की जानकारी देनी होगी।

पूर्ण कार्यान्वयन (Full Phase)

1 जनवरी 2026 से

वास्तविक कार्बन शुल्क लगाया जाएगा; निर्यातक को CBAM सर्टिफिकेट खरीदना होगा।

भारत पर प्रभाव

1. निर्यात पर प्रभाव

  • भारत यूरोप को इस्पात, एल्युमिनियम और सीमेंट जैसे उत्पादों का बड़ा निर्यातक है।
  • CBAM लागू होने से भारतीय निर्यात महंगा हो जाएगा, जिससे प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है।

2. औद्योगिक दबाव

  • भारत के उद्योगों को अपने कार्बन उत्सर्जन घटाने और ग्रीन तकनीक अपनाने का दबाव बढ़ेगा।

3. निवेश के अवसर

  • ग्रीन एनर्जी, कार्बन-कैप्चर और रिन्यूएबल टेक्नोलॉजी में निवेश के नए अवसर खुलेंगे।

भारत की चिंताएँ

  1. विकासशील देशों पर असमान भार — CBAM जैसे कदम “जलवायु न्याय” (Climate Justice) के सिद्धांत के खिलाफ हैं, क्योंकि विकासशील देश अब भी औद्योगिकरण के चरण में हैं।
  2. डब्ल्यूटीओ (WTO) के नियमों का उल्लंघन — यह टैरिफ बैरियर (Trade Barrier) की तरह काम करता है और “मुक्त व्यापार” के सिद्धांतों के विपरीत है।
  3. प्रशासनिक जटिलता — उत्सर्जन की गणना, रिपोर्टिंग और सत्यापन जैसी प्रक्रियाएँ जटिल हैं।

भारत की तैयारी और प्रतिक्रिया

  • भारत सरकार ने "कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS)" शुरू की है (2023), ताकि घरेलू उद्योगों को कार्बन दक्षता में सुधार के लिए प्रोत्साहन मिले।
  • “ग्रीन हाइड्रोजन मिशन” और “ऊर्जा संक्रमण योजना” के ज़रिए भारत अपने उद्योगों को डी-कार्बोनाइज करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
  • अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत समानता और जलवायु न्याय की मांग उठा रहा है।

वैश्विक दृष्टिकोण

  • अमेरिका भी “Carbon Border Tax” पर विचार कर रहा है।
  • कनाडा, जापान और यूके जैसे देश भी इसी प्रकार के उपायों की योजना बना रहे हैं।
  • इससे वैश्विक व्यापार में कार्बन की लागत (Cost of Carbon) एक प्रमुख आर्थिक कारक बन जाएगी।

आलोचना और चुनौतियाँ

  1. प्रोटेक्शनिज़्म (Protectionism) के रूप में देखा जा रहा है।
  2. गैर-EU देशों की प्रतिस्पर्धा घटेगी।
  3. विकासशील देशों के लिए ‘ग्रीन टेक्नोलॉजी’ का वित्तपोषण कठिन है।
  4. जटिल मॉनिटरिंग और रिपोर्टिंग तंत्र।
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