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बालिग अविवाहित बेटी उच्च शिक्षा के लिए पिता से आर्थिक सहायता की हकदार

संदर्भ 

  • कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि माता-पिता के बीच घरेलू संबंध तनावपूर्ण हों, तब भी बालिग अविवाहित बेटी घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 20(1)(d) के तहत अपने पिता से उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता की मांग कर सकती है। 
  • इसी सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एक व्यक्ति को अपनी बेटी की पीजी मेडिकल पढ़ाई की वार्षिक फीस के रूप में 16 लाख रुपये अदा करने का निर्देश दिया गया था। 

वयस्क होने से समाप्त नहीं होती माता-पिता की जिम्मेदारी  

  • मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति एच.पी. संदीश ने कहा कि किसी संतान के बालिग होने भर से माता-पिता का यह दायित्व समाप्त नहीं हो जाता कि वे उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यक सुविधाओं का ध्यान रखें। 
  • अदालत ने अपने आदेश में कहा कि समाज में यह व्यापक रूप से स्वीकार की गई नैतिक जिम्मेदारी है कि माता-पिता अपने बच्चों को बुनियादी सुविधाएं, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा उपलब्ध कराएं। इसलिए केवल वयस्कता प्राप्त कर लेने के आधार पर इस जिम्मेदारी से मुक्ति नहीं मिल सकती। 

हाईकोर्ट ने खारिज की पिता की पुनरीक्षण याचिका 

  • यह फैसला मंगलूरु निवासी 53 वर्षीय व्यक्ति द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया गया। याचिकाकर्ता ने दो निचली अदालतों के आदेशों को चुनौती दी थी। 
  • पहला आदेश फरवरी 2026 में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), मंगलूरु ने पारित किया था, जिसमें पिता को बेटी की पीजी मेडिकल शिक्षा के लिए 16 लाख रुपये देने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद अप्रैल 2026 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मंगलूरु ने भी उस आदेश को सही ठहराया था। हाईकोर्ट ने दोनों फैसलों में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए उन्हें बरकरार रखा। 

एमबीबीएस की पढ़ाई का खर्च भी पिता ने ही उठाया था 

  • अदालत ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि जब बेटी एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही थी, तब उसके माता-पिता साथ रहते थे और उस समय उसकी पूरी शिक्षा का खर्च पिता ही वहन कर रहे थे।
  • वर्तमान में पति-पत्नी के बीच मतभेद होने के कारण वे एक ही भवन की अलग-अलग मंजिलों पर रहते हैं। मां और बेटी एक मंजिल पर रहती हैं, जबकि पिता दूसरी मंजिल पर निवास करते हैं। 

रिकॉर्ड से स्पष्ट हुई पिता की आर्थिक स्थिति 

  • हाईकोर्ट ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर माना कि पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं और बेटी की पढ़ाई का खर्च उठा सकते हैं। 
  • अदालत के समक्ष प्रस्तुत आयकर रिटर्न और बैंक दस्तावेजों से पता चला कि वर्ष 2021 में उन्होंने 1.34 करोड़ रुपये मूल्य की अचल संपत्ति अर्जित की थी। इसके अलावा वर्ष 2021 से 2023 के बीच उन्होंने विभिन्न स्रोतों से 1.27 करोड़ रुपये के ऋण भी प्राप्त किए थे। इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने माना कि उनकी वित्तीय स्थिति बेटी की शिक्षा का खर्च वहन करने की अनुमति देती है।

मेरिट के आधार पर मिला पीजी मेडिकल में प्रवेश 

  • अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि बेटी ने ऑल इंडिया रैंक (AIR) 11,722 हासिल कर मेरिट के आधार पर पीजी मेडिकल कोर्स में प्रवेश प्राप्त किया है।
  • कोर्ट ने कहा कि उसे जिस सीट पर प्रवेश मिला है, उसकी वार्षिक फीस 16 लाख रुपये है, जबकि यदि उसे मैनेजमेंट कोटा से दाखिला लेना पड़ता तो फीस लगभग 75 लाख रुपये प्रति वर्ष होती। 

बालिग होने का तर्क अदालत ने नहीं माना  

  • पिता ने अदालत में दलील दी थी कि बेटी के वयस्क हो जाने के बाद वह न तो भरण-पोषण और न ही शिक्षा संबंधी खर्च की हकदार है। 
  • हाईकोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि यदि इस व्याख्या को स्वीकार कर लिया जाए तो घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 20(1)(d) में प्रयुक्त इन एडिशन टू (इसके अतिरिक्त) शब्द निरर्थक हो जाएंगे। इसलिए इस प्रावधान की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती जिससे उसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाए।
  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 20(1):
  • धारा 12 की उप-धारा (1) के तहत आवेदन का निपटारा करते समय, मजिस्ट्रेट व्यथित व्यक्ति और व्यथित व्यक्ति के किसी बच्चे द्वारा घरेलू हिंसा के परिणामस्वरूप किए गए खर्चों और सहे गए नुकसान की भरपाई के लिए प्रत्यर्थी (उत्तरदाता) को मौद्रिक राहत (आर्थिक सहायता) का भुगतान करने का आदेश दे सकता है। 
  • ऐसी राहत में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं, लेकिन यह इन्हीं तक सीमित नहीं है:
    1. आय (कमाई) का नुकसान;
    2. चिकित्सीय व्यय (इलाज का खर्च);
    3. व्यथित व्यक्ति के नियंत्रण से किसी संपत्ति के विनाश, क्षति या हटाए जाने के कारण हुआ नुकसान; तथा
    4. व्यथित व्यक्ति के साथ-साथ उसके बच्चों (यदि कोई हों) का भरण-पोषण, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 125 या उस समय लागू किसी अन्य कानून के तहत भरण-पोषण के आदेश के अतिरिक्त या उसके तहत दिया गया आदेश शामिल है। 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी किया उल्लेख  

  • अपने निर्णय में न्यायमूर्ति संदीश ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि बेटी को अपने माता-पिता से शिक्षा संबंधी खर्च प्राप्त करने का कानूनी रूप से संरक्षित, वैध और पूर्ण रूप से लागू करने योग्य अधिकार प्राप्त है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना है कि यदि माता-पिता के बीच वैवाहिक या पारिवारिक विवाद हो, तब भी उनकी आर्थिक क्षमता के अनुरूप उन्हें बेटी की उच्च शिक्षा के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए बाध्य किया जा सकता है। 
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